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ग़ज़ल
बुतों का साथ दिया बुत-शिकन का साथ दिया
फ़रेब-ए-इश्क़ ने हर हुस्न-ए-ज़न का साथ दिया
वफ़ा मलिकपुरी
ग़ज़ल
जब ख़ुदी का है ये 'आलम तो ख़ुदा दूर नहीं
बुत-शिकन महफ़िल-ए-असनाम तक आ पहुँचे हैं
सय्यद सफ़दर हुसैन
ग़ज़ल
ग़ज़नवी तो बुत-शिकन ठहरा मगर 'ख़ातिर' ये क्या
तेरे मस्लक में उसे सज्दा रवा कैसे हुआ
ख़ातिर ग़ज़नवी
ग़ज़ल
आया तो दिल में बैठ गया बन के देवता
उट्ठे नहीं हैं 'इश्क़-ए-दिल-ए-बुत-शिकन के पाँव