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नज़्म
सरवरी ज़ेबा फ़क़त उस ज़ात-ए-बे-हम्ता को है
हुक्मराँ है इक वही बाक़ी बुतान-ए-आज़री
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
धर्म क्या उन का था, क्या ज़ात थी, ये जानता कौन
घर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
हुज़ूर मुस्कुरा रहे हैं मेरी बात बात पर
हुज़ूर को न जाने क्या गुमाँ है मेरी ज़ात पर
अहमद फ़राज़
नज़्म
'आलम ये था क़रीब कि आँखें हों अश्क-रेज़
लेकिन हज़ार ज़ब्त से रोने से की गुरेज़