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नज़्म
इन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर छलकेगा
साहिर लुधियानवी
नज़्म
चाँद को उतरे देखा हम ने चाँद भी कैसा पूरा चाँद
'इंशा' जी इन चाहने वाली देखने वाली आँखों ने
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
खेल-खिलौनों का हर-सू है इक रंगीं गुलज़ार खिला
वो इक बालक जिस को घर से इक दिरहम भी नहीं मिला
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
कल-जुग में भी मरती है सत-जुग में भी मरती थी
ये बुढ़िया इस दुनिया में सदा ही फ़ाक़े करती थी