aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "aashiq"
ये रुपहली छाँव ये आकाश पर तारों का जालजैसे सूफ़ी का तसव्वुर जैसे आशिक़ का ख़यालआह लेकिन कौन जाने कौन समझे जी का हालऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
गुलशन-ए-याद में गर आज दम-ए-बाद-ए-सबाफिर से चाहे कि गुल-अफ़शाँ हो तो हो जाने दोउम्र-ए-रफ़्ता के किसी ताक़ पे बिसरा हुआ दर्दफिर से चाहे कि फ़रोज़ाँ हो तो हो जाने दोजैसे बेगाने से अब मिलते हो वैसे ही सहीआओ दो चार घड़ी मेरे मुक़ाबिल बैठोगरचे मिल-बैठेंगे हम तुम तो मुलाक़ात के बा'दअपना एहसास-ए-ज़ियाँ और ज़ियादा होगाहम-सुख़न होंगे जो हम दोनों तो हर बात के बीचअन-कही बात का मौहूम सा पर्दा होगाकोई इक़रार न मैं याद दिलाऊँगा न तुमकोई मज़मून वफ़ा का न जफ़ा का होगागर्द-ए-अय्याम की तहरीर को धोने के लिएतुम से गोया हों दम-ए-दीद जो मेरी पलकेंतुम जो चाहो तो सुनो और जो न चाहो न सुनोऔर जो हर्फ़ करें मुझ से गुरेज़ाँ आँखेंतुम जो चाहो तो कहो और जो न चाहो न कहो
ज़माना आया है बे-हिजाबी का आम दीदार-ए-यार होगासुकूत था पर्दा-दार जिस का वो राज़ अब आश्कार होगागुज़र गया अब वो दौर-ए-साक़ी कि छुप के पीते थे पीने वालेबनेगा सारा जहान मय-ख़ाना हर कोई बादा-ख़्वार होगाकभी जो आवारा-ए-जुनूँ थे वो बस्तियों में फिर आ बसेंगेबरहना-पाई वही रहेगी मगर नया ख़ारज़ार होगासुना दिया गोश-ए-मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामुशी ने आख़िरजो अहद सहराइयों से बाँधा गया था फिर उस्तुवार होगानिकल के सहरा से जिस ने रूमा की सल्तनत को उलट दिया थासुना है ये क़ुदसियों से मैं ने वो शेर फिर होशियार होगाकिया मिरा तज़्किरा जो साक़ी ने बादा-ख़्वारों की अंजुमन मेंतो पीर-ए-मय-ख़ाना सुन के कहने लगा कि मुँह-फट है ख़्वार होगादयार-ए-मग़रिब के रहने वालो ख़ुदा की बस्ती दुकाँ नहीं हैखरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र-ए-कम-अयार होगातुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही ख़ुद-कुशी करेगीजो शाख़-ए-नाज़ुक पे आशियाना बनेगा ना-पाएदार होगासफ़ीना-ए-बर्ग-ए-गुल बना लेगा क़ाफ़िला मोर-ए-ना-तावाँ काहज़ार मौजों की हो कशाकश मगर ये दरिया से पार होगाचमन में लाला दिखाता फिरता है दाग़ अपना कली कली कोये जानता है कि इस दिखावे से दिल-जलों में शुमार होगाजो एक था ऐ निगाह तू ने हज़ार कर के हमें दिखायायही अगर कैफ़ियत है तेरी तो फिर किसे ए'तिबार होगाकहा जो क़ुमरी से मैं ने इक दिन यहाँ के आज़ाद पा-ब-गिल हैंतू ग़ुंचे कहने लगे हमारे चमन का ये राज़दार होगाख़ुदा के आशिक़ तो हैं हज़ारों बनों में फिरते हैं मारे मारेमैं उस का बंदा बनूँगा जिस को ख़ुदा के बंदों से प्यार होगाये रस्म-ए-बज़्म-ए-फ़ना है ऐ दिल गुनाह है जुम्बिश-ए-नज़र भीरहेगी क्या आबरू हमारी जो तू यहाँ बे-क़रार होगामैं ज़ुल्मत-ए-शब में ले के निकलूँगा अपने दर-माँदा कारवाँ कोशरर-फ़िशाँ होगी आह मेरी नफ़स मिरा शोला-बार होगानहीं है ग़ैर-अज़-नुमूद कुछ भी जो मुद्दआ तेरी ज़िंदगी कातू इक नफ़स में जहाँ से मिटना तुझे मिसाल-ए-शरार होगान पूछ 'इक़बाल' का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस कीकहीं सर-ए-राहगुज़ार बैठा सितम-कश-ए-इंतिज़ार होगा
याद की राहगुज़र जिस पे इसी सूरत सेमुद्दतें बीत गई हैं तुम्हें चलते चलतेख़त्म हो जाए जो दो चार क़दम और चलोमोड़ पड़ता है जहाँ दश्त-ए-फ़रामोशी काजिस से आगे न कोई मैं हूँ न कोई तुम होसाँस थामे हैं निगाहें कि न जाने किस दमतुम पलट आओ गुज़र जाओ या मुड़ कर देखोगरचे वाक़िफ़ हैं निगाहें कि ये सब धोका हैगर कहीं तुम से हम-आग़ोश हुई फिर से नज़रफूट निकलेगी वहाँ और कोई राहगुज़रफिर इसी तरह जहाँ होगा मुक़ाबिल पैहमसाया-ए-ज़ुल्फ़ का और जुम्बिश-ए-बाज़ू का सफ़र
जब आदमी के हाल पे आती है मुफ़्लिसीकिस किस तरह से उस को सताती है मुफ़्लिसीप्यासा तमाम रोज़ बिड़ाती है मुफ़्लिसीभूका तमाम रात सुलाती है मुफ़्लिसीये दुख वो जाने जिस पे कि आती है मुफ़्लिसीकहिए तो अब हकीम की सब से बड़ी है शाँतअ'ज़ीम जिस की करते हैं तो अब और ख़ाँमुफ़्लिस हुए तो हज़रत-ए-लुक़्माँ किया है याँईसा भी हो तो कोई नहीं पूछता मियाँहिकमत हकीम की भी ढुबाती है मुफ़्लिसीजो अहल-ए-फ़ज़्ल आलिम ओ फ़ाज़िल कहाते हैंमुफ़्लिस हुए तो कलमा तलक भूल जाते हैंवो जो ग़रीब-ग़ुरबा के लड़के पढ़ाते हैंउन की तो उम्र भर नहीं जाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस करे जो आन के महफ़िल के बीच हालसब जानें रोटियों का ये डाला है इस ने जालगिर गिर पड़े तो कोई न लिए उसे सँभालमुफ़्लिस में होवें लाख अगर इल्म और कमालसब ख़ाक बेच आ के मिलाती है मुफ़्लिसीजब रोटियों के बटने का आ कर पड़े शुमारमुफ़्लिस को देवें एक तवंगर को चार चारगर और माँगे वो तो उसे झिड़कें बार बारमुफ़्लिस का हाल आह बयाँ क्या करूँ मैं यारमुफ़्लिस को इस जगह भी चबाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस की कुछ नज़र नहीं रहती है आन परदेता है अपनी जान वो एक एक नान परहर आन टूट पड़ता है रोटी के ख़्वान परजिस तरह कुत्ते लड़ते हैं इक उस्तुख़्वान परवैसा ही मुफ़लिसों को लड़ाती है मुफ़्लिसीकरता नहीं हया से जो कोई वो काम आहमुफ़्लिस करे है उस के तईं इंसिराम आहसमझे न कुछ हलाल न जाने हराम आहकहते हैं जिस को शर्म-ओ-हया नंग-ओ-नाम आहवो सब हया-ओ-शर्म उड़ाती है मुफ़्लिसीये मुफ़्लिसी वो शय है कि जिस घर में भर गईफिर जितने घर थे सब में उसी घर के दर गईज़न बच्चे रोते हैं गोया नानी गुज़र गईहम-साया पूछते हैं कि क्या दादी मर गईबिन मुर्दे घर में शोर मचाती है मुफ़्लिसीलाज़िम है गर ग़मी में कोई शोर-ग़ुल मचाएमुफ़्लिस बग़ैर ग़म के ही करता है हाए हाएमर जावे गर कोई तो कहाँ से उसे उठाएइस मुफ़्लिसी की ख़्वारियाँ क्या क्या कहूँ मैं हाएमुर्दे को बे कफ़न के गड़ाती है मुफ़्लिसीक्या क्या मुफ़्लिसी की कहूँ ख़्वारी फकड़ियाँझाड़ू बग़ैर घर में बिखरती हैं झकड़ियाँकोने में जाले लपटे हैं छप्पर में मकड़ियाँपैसा न होवे जिन के जलाने को लकड़ियाँदरिया में उन के मुर्दे बहाती है मुफ़्लिसीबीबी की नथ न लड़कों के हाथों कड़े रहेकपड़े मियाँ के बनिए के घर में पड़े रहेजब कड़ियाँ बिक गईं तो खंडर में पड़े रहेज़ंजीर ने किवाड़ न पत्थर गड़े रहेआख़िर को ईंट ईंट खुदाती है मुफ़्लिसीनक़्क़ाश पर भी ज़ोर जब आ मुफ़्लिसी करेसब रंग दम में कर दे मुसव्विर के किर्किरेसूरत भी उस की देख के मुँह खिंच रहे परेतस्वीर और नक़्श में क्या रंग वो भरेउस के तो मुँह का रंग उड़ाती है मुफ़्लिसीजब ख़ूब-रू पे आन के पड़ता है दिन सियाहफिरता है बोसे देता है हर इक को ख़्वाह-मख़ाहहरगिज़ किसी के दिल को नहीं होती उस की चाहगर हुस्न हो हज़ार रूपे का तो उस को आहक्या कौड़ियों के मोल बिकाती है मुफ़्लिसीउस ख़ूब-रू को कौन दे अब दाम और दिरमजो कौड़ी कौड़ी बोसे को राज़ी हो दम-ब-दमटोपी पुरानी दो तो वो जाने कुलाह-ए-जिस्मक्यूँकर न जी को उस चमन-ए-हुस्न के हो ग़मजिस की बहार मुफ़्त लुटाती है मुफ़्लिसीआशिक़ के हाल पर भी जब आ मुफ़्लिसी पड़ेमाशूक़ अपने पास न दे उस को बैठनेआवे जो रात को तो निकाले वहीं उसेइस डर से या'नी रात ओ धन्ना कहीं न देतोहमत ये आशिक़ों को लगाती है मुफ़्लिसीकैसे ही धूम-धाम की रंडी हो ख़ुश-जमालजब मुफ़्लिसी हो कान पड़े सर पे उस के जालदेते हैं उस के नाच को ढट्ढे के बीच डालनाचे है वो तो फ़र्श के ऊपर क़दम सँभालऔर उस को उँगलियों पे नचाती है मुफ़्लिसीउस का तो दिल ठिकाने नहीं भाव क्या बताएजब हो फटा दुपट्टा तो काहे से मुँह छुपाएले शाम से वो सुब्ह तलक गो कि नाचे गाएऔरों को आठ सात तो वो दो टके ही पाएइस लाज से इसे भी लजाती है मुफ़्लिसीजिस कसबी रंडी का हो हलाकत से दिल हज़ींरखता है उस को जब कोई आ कर तमाश-बींइक पौन पैसे तक भी वो करती नहीं नहींये दुख उसी से पूछिए अब आह जिस के तईंसोहबत में सारी रात जगाती है मुफ़्लिसीवो तो ये समझे दिल में कि ढेला जो पाऊँगीदमड़ी के पान दमड़ी के मिस्सी मँगाऊँगीबाक़ी रही छदाम सो पानी भराऊँगीफिर दिल में सोचती है कि क्या ख़ाक खाऊँगीआख़िर चबीना उस का भुनाती है मुफ़्लिसीजब मुफ़्लिसी से होवे कलावंत का दिल उदासफिरता है ले तम्बूरे को हर घर के आस-पासइक पाव सेर आने की दिल में लगा के आसगोरी का वक़्त होवे तो गाता है वो बभासयाँ तक हवास उस के उड़ाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस बियाह बेटी का करता है बोल बोलपैसा कहाँ जो जा के वो लावे जहेज़ मोलजोरू का वो गला कि फूटा हो जैसे ढोलघर की हलाल-ख़ोरी तलक करती है ढिढोलहैबत तमाम उस की उठाती है मुफ़्लिसीबेटे का बियाह हो तो न ब्याही न साथी हैने रौशनी न बाजे की आवाज़ आती हैमाँ पीछे एक मैली चदर ओढ़े जाती हैबेटा बना है दूल्हा तो बावा बराती हैमुफ़्लिस की ये बरात चढ़ाती है मुफ़्लिसीगर ब्याह कर चला है सहर को तो ये बलाशहदार नाना हीजड़ा और भाट मंड-चढ़ाखींचे हुए उसे चले जाते हैं जा-ब-जावो आगे आगे लड़ता हुआ जाता है चलाऔर पीछे थपड़ियों को बजाती है मुफ़्लिसीदरवाज़े पर ज़नाने बजाते हैं तालियाँऔर घर में बैठी डोमनी देती हैं गालियाँमालन गले की हार हो दौड़ी ले डालियाँसक़्क़ा खड़ा सुनाता है बातें रज़ालियाँये ख़्वारी ये ख़राबी दिखाती है मुफ़्लिसीकोई शूम बे-हया कोई बोला निखट्टू हैबेटी ने जाना बाप तो मेरा निखट्टू हैबेटे पुकारते हैं कि बाबा निखट्टू हैबीबी ये दिल मैं कहती है अच्छा निखट्टू हैआख़िर निखट्टू नाम धराती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस का दर्द दिल में कोई ढानता नहींमुफ़्लिस की बात को भी कोई मानता नहींज़ात और हसब-नसब को कोई जानता नहींसूरत भी उस की फिर कोई पहचानता नहींयाँ तक नज़र से उस को गिराती है मुफ़्लिसीजिस वक़्त मुफ़्लिसी से ये आ कर हुआ तबाहफिर कोई इस के हाल प करता नहीं निगाहदालीदरी कहे कोई ठहरा दे रू-सियाहजो बातें उम्र भर न सुनी होवें उस ने आहवो बातें उस को आ के सुनाती हैं मुफ़्लिसीचूल्हा तवाना पानी के मटके में आबी हैपीने को कुछ न खाने को और ने रकाबी हैमुफ़्लिस के साथ सब के तईं बे-हिजाबी हैमुफ़्लिस की जोरू सच है कि याँ सब की भाबी हैइज़्ज़त सब उस के दिल की गंवाती है मुफ़्लिसीकैसा ही आदमी हो पर इफ़्लास के तुफ़ैलकोई गधा कहे उसे ठहरा दे कोई बैलकपड़े फटे तमाम बढ़े बाल फैल फैलमुँह ख़ुश्क दाँत ज़र्द बदन पर जमा है मैलसब शक्ल क़ैदियों की बनाती है मुफ़्लिसीहर आन दोस्तों की मोहब्बत घटाती हैजो आश्ना हैं उन की तो उल्फ़त घटाती हैअपने की मेहर ग़ैर की चाहत घटाती हैशर्म-ओ-हया ओ इज़्ज़त-ओ-हुर्मत घटाती हैहाँ नाख़ुन और बाल बढ़ाती है मुफ़्लिसीजब मुफ़्लिसी हुई तो शराफ़त कहाँ रहीवो क़द्र ज़ात की वो नजाबत कहाँ रहीकपड़े फटे तो लोगों में इज़्ज़त कहाँ रहीतअ'ज़ीम और तवाज़ो' की बाबत कहाँ रहीमज्लिस की जूतियों पे बिड़ाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस किसी का लड़का जो ले प्यार से उठाबाप उस का देखे हाथ का और पाँव का कड़ाकहता है कोई जूती न लेवे कहीं चुरानट-खट उचक्का चोर दग़ाबाज़ गठ-कटासौ सौ तरह के ऐब लगाती है मुफ़्लिसीरखती नहीं किसी की ये ग़ैरत की आन कोसब ख़ाक में मिलाती है हुर्मत की शान कोसौ मेहनतों में उस की खपाती है जान कोचोरी पे आ के डाले ही मुफ़्लिस के ध्यान कोआख़िर नदान भीक मंगाती है मुफ़्लिसीदुनिया में ले के शाह से ऐ यार ता-फ़क़ीरख़ालिक़ न मुफ़्लिसी में किसी को करे असीरअशराफ़ को बनाती है इक आन में फ़क़ीरक्या क्या मैं मुफ़्लिसी की ख़राबी कहूँ 'नज़ीर'वो जाने जिस के दिल को जलाती है मुफ़्लिसी
जिस को सदमा शब-ए-तन्हाई के अय्याम का हैऐसे आशिक़ के लिए नेट बहुत काम का है
देर तक देखती रह जाती हैमेरे इस झोंपड़े में कुछ भी नहींखेल इक सादा मोहब्बत काशब ओ रोज़ के इस बढ़ते हुए खोखले-पन में जो कभी खेलते हैंकभी रो लेते हैं मिल कर कभी गा लेते हैंऔर मिल कर कभी हँस लेते हैंदिल के जीने के बहाने के सिवा और नहींहर्फ़ सरहद हैं जहाँ-ज़ाद मआनी सरहदइश्क़ सरहद है जवानी सरहददिल के जीने के बहाने के सिवा और नहींदर्द-ए-महरूमी कीतन्हाई की सरहद भी कहीं है कि नहीं?
लेकिन मैं यहाँ फिर आऊँगाबच्चों के दहन से बोलूँगाचिड़ियों की ज़बाँ से गाऊँगाजब बीज हँसेंगे धरती मेंऔर कोंपलें अपनी उँगली सेमिट्टी की तहों को छेड़ेंगीमैं पत्ती पत्ती कली कलीअपनी आँखें फिर खोलूँगासरसब्ज़ हथेली पर ले करशबनम के क़तरे तौलूँगामैं रंग-ए-हिना आहंग-ए-ग़ज़लअंदाज़-ए-सुख़न बन जाऊँगारुख़्सार-ए-उरूस-ए-नौ की तरहहर आँचल से छन जाऊँगाजाड़ों की हवाएँ दामन मेंजब फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ को लाएँगीरह-रौ के जवाँ क़दमों के तलेसूखे हुए पत्तों से मेरेहँसने की सदाएँ आएँगीधरती की सुनहरी सब नदियाँआकाश की नीली सब झीलेंहस्ती से मिरी भर जाएँगीऔर सारा ज़माना देखेगाहर क़िस्सा मिरा अफ़्साना हैहर आशिक़ है 'सरदार' यहाँहर माशूक़ा 'सुल्ताना' है
ऐ सिपहर-ए-बरीं के सय्यारोऐ फ़ज़ा-ए-ज़मीं के गुल-ज़ारोऐ पहाड़ों की दिल-फ़रेब फ़ज़ाऐ लब-ए-जू की ठंडी ठंडी हवाऐ अनादिल के नग़मा-ए-सहरीऐ शब-ए-माहताब तारों भरीऐ नसीम-ए-बहार के झोंकोदहर-ए-ना-पाएदार के धोकोतुम हर इक हाल में हो यूँ तो अज़ीज़थे वतन में मगर कुछ और ही चीज़जब वतन में हमारा था रमनातुम से दिल बाग़ बाग़ था अपनातुम मिरी दिल-लगी के सामाँ थेतुम मिरे दर्द-ए-दिल के दरमाँ थेतुम से कटता था रंज-ए-तन्हाईतुम से पाता था दिल शकेबाईआन इक इक तुम्हारी भाती थीजो अदा थी वो जी लुभाती थीकरते थे जब तुम अपनी ग़म-ख़्वारीधोई जाती थीं कुलफ़तें सारीजब हवा खाने बाग़ जाते थेहो के ख़ुश-हाल घर में आते थेबैठ जाते थे जब कभी लब-ए-आबधो के उठते थे दिल के दाग़ शिताबकोह ओ सहरा ओ आसमान ओ ज़मींसब मिरी दिल-लगी की शक्लें थींपर छुटा जिस से अपना मुल्क ओ दयारजी हुआ तुम से ख़ुद-ब-ख़ुद बेज़ारन गुलों की अदा ख़ुश आती हैन सदा बुलबुलों की भाती हैसैर-ए-गुलशन है जी का इक जंजालशब-ए-महताब जान को है वबालकोह ओ सहरा से ता लब-ए-दरियाजिस तरफ़ जाएँ जी नहीं लगताक्या हुए वो दिन और वो रातेंतुम में अगली सी अब नहीं बातेंहम ही ग़ुर्बत में हो गए कुछ औरया तुम्हारे बदल गए कुछ तौरगो वही हम हैं और वही दुनियापर नहीं हम को लुत्फ़ दुनिया काऐ वतन ऐ मिरे बहिश्त-ए-बरीँक्या हुए तेरे आसमान ओ ज़मींरात और दिन का वो समाँ न रहावो ज़मीं और वो आसमाँ न रहातेरी दूरी है मोरिद-ए-आलामतेरे छुटने से छुट गया आरामकाटे खाता है बाग़ बिन तेरेगुल हैं नज़रों में दाग़ बिन तेरेमिट गया नक़्श कामरानी कातुझ से था लुत्फ़ ज़िंदगानी काजो कि रहते हैं तुझ से दूर सदाइन को क्या होगा ज़िंदगी का मज़ाहो गया याँ तो दो ही दिन में ये हालतुझ बिन एक एक पल है इक इक सालसच बता तो सभी को भाता हैया कि मुझ से ही तेरा नाता हैमैं ही करता हूँ तुझ पे जान निसारया कि दुनिया है तेरी आशिक़-ए-ज़ारक्या ज़माने को तू अज़ीज़ नहींऐ वतन तू तो ऐसी चीज़ नहींजिन ओ इंसान की हयात है तूमुर्ग़ ओ माही की काएनात है तूहै नबातात का नुमू तुझ सेरूख तुझ बिन हरे नहीं होतेसब को होता है तुझ से नश्व-ओ-नुमासब को भाती है तेरी आब-ओ-हवातेरी इक मुश्त-ए-ख़ाक के बदलेलूँ न हरगिज़ अगर बहिश्त मिलेजान जब तक न हो बदन से जुदाकोई दुश्मन न हो वतन से हवा
दिल दर्द की शिद्दत से ख़ूँ-गश्ता ओ सी-पाराइस शहर में फिरता है इक वहशी-ओ-आवाराशायर है कि आशिक़ है, जोगी है कि बंजारादरवाज़ा खुला रखना
जिन दिलबरों के तन पर हैं गर्मी दाने आलेकहते हैं उन को आशिक़ यूँ प्यार से बुला लेक्या मेंह बरस रहा है प्यारे ज़रा नहा लेछाती नहीं तो प्यारे टुक पीठ ही मिला लेक्या क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें
तेरी ही गर्दन-ए-रंगीं में हैं बाँहें अपनीतेरे ही इश्क़ में हैं सुब्ह की आहें अपनीतेरे ही हुस्न से रौशन हैं निगाहें अपनीकज हुईं तेरी ही महफ़िल में कुलाहें अपनीबाँकपन सीख लिया इश्क़ की उफ़्तादों सेदिल लगाया भी तो तेरे ही परी-ज़ादों से
दर्द-ओ-ग़म-ए-हयात का दरमाँ चला गयावो ख़िज़्र-ए-अस्र-ओ-ईसा-ए-दौराँ चला गयाहिन्दू चला गया न मुसलमाँ चला गयाइंसाँ की जुस्तुजू में इक इंसाँ चला गयारक़्साँ चला गया न ग़ज़ल-ख़्वाँ चला गयासोज़-ओ-गुदाज़ ओ दर्द में ग़लताँ चला गयाबरहम है ज़ुल्फ़-ए-कुफ़्र तो ईमाँ है सर-निगूँवो फ़ख़्र-ए-कुफ़्र-ओ-नाज़िश-ए-ईमाँ चला गयाबीमार ज़िंदगी की करे कौन दिल-दहीनब्बाज़ ओ चारासाज़-ए-मरीज़ाँ चला गयाकिस की नज़र पड़ेगी अब 'इस्याँ पे लुत्फ़ कीवो महरम-ए-नज़ाकत-ए-इस्याँ चला गयावो राज़-दार-ए-महफ़िल-ए-याराँ नहीं रहावो ग़म-गुसार-ए-बज़्म-ए-अरीफ़ाँ चला गयाअब काफ़िरी में रस्म-ओ-राह-ए-दिलबरी नहींईमाँ की बात ये है कि ईमाँ चला गयाइक बे-खु़द-ए-सुरूर-ए-दिल-ओ-जाँ नहीं रहाइक आशिक़-ए-सदाक़त-ए-पिन्हाँ चला गयाबा-चश्म-ए-नम है आज ज़ुलेख़ा-ए-काएनातज़िंदाँ-शिकन वो यूसुफ़-ए-ज़िंदाँ चला गयाऐ आरज़ू वो चश्मा-ए-हैवाँ न कर तलाशज़ुल्मात से वो चश्मा-ए-हैवाँ चला गयाअब संग-ओ-ख़िश्त ओ ख़ाक ओ ख़ज़फ़ सर-बुलंद हैंताज-ए-वतन का लाल-ए-दरख़्शाँ चला गयाअब अहरमन के हाथ में है तेग़-ए-ख़ूँ-चकाँख़ुश है कि दस्त-ओ-बाज़ू-ए-यज़्दाँ चला गयादेव-ए-बदी से मार्का-ए-सख़्त ही सहीये तो नहीं कि ज़ोर-ए-जवानाँ चला गयाक्या अहल-ए-दिल में जज़्बा-ए-ग़ैरत नहीं रहाक्या अज़्म-ए-सर-फ़रोशी-ए-मर्दां चला गयाक्या बाग़ियों की आतिश-ए-दिल सर्द हो गईक्या सरकशों का जज़्बा-ए-पिनहां चला गयाक्या वो जुनून-ओ-जज़्बा-ए-बेदार मर गयाक्या वो शबाब-ए-हश्र-बदामाँ चला गयाख़ुश है बदी जो दाम ये नेकी पे डाल केरख देंगे हम बदी का कलेजा निकाल के
ऐ मिरी उम्मीद मेरी जाँ-नवाज़ऐ मिरी दिल-सोज़ मेरी कारसाज़मेरी सिपर और मिरे दिल की पनाहदर्द-ओ-मुसीबत में मिरी तकिया-गाहऐश में और रंज मैं मेरी शफ़ीक़कोह में और दश्त में मेरी रफ़ीक़काटने वाली ग़म-ए-अय्याम कीथामने वाली दिल-ए-नाकाम कीदिल प पड़ा आन के जब कोई दुखतेरे दिलासे से मिला हम को सुखतू ने न छोड़ा कभी ग़ुर्बत में साथतू ने उठाया न कभी सर से हाथजी को हो कभी अगर उसरत का रंजखोल दिए तू नय क़नाअ'त के गंजतुझ से है मोहताज का दिल बे-हिरासतुझ से है बीमार को जीने की आसख़ातिर-ए-रंजूर का दरमाँ है तूआशिक़-ए-महजूर का ईमाँ है तूनूह की कश्ती का सहारा थी तूचाह में यूसुफ़ की दिल-आरा थी तूराम के हम-राह चढ़ी रन में तूपांडव के भी साथ फिरी बन में तूतू ने सदा क़ैस का बहलाया दिलथाम लिया जब कभी घबराया दिलहो गया फ़रहाद का क़िस्सा तमामपर तिरे फ़िक़्रों पे रहा ख़ुश मुदामतू ने ही राँझे की ये बंधवाई आसहीर थी फ़ुर्क़त में भी गोया कि पासहोती है तू पुश्त पे हिम्मत की जबमुश्किलें आसाँ नज़र आती हैं सबहाथ में जब आ के लिया तू ने हातसात समुंदर से गुज़रना है बातसाथ मिला जिस को तिरा दो क़दमकहता है वो ये है अरब और अजमघोड़े की ली अपने जहाँ तू ने बागसामने है तेरे गया और परागअज़्म को जब देती है तू मेल जस्तगुम्बद-ए-गर्दूं नज़र आता है पस्ततू ने दिया आ के उभारा जहाँसमझे कि मुट्ठी में है सारा जहाँज़र्रे को ख़ुर्शीद में दे खपाबंदे को अल्लाह से दे तू मिलादोनों जहाँ की है बंधी तुझ से लड़दीन की तू अस्ल है दुनिया की जड़नेकियों की तुझ से है क़ाएम असासतू न हो तो जाएँ न नेकी के पासदीन की तुझ बिन कहीं पुर्सिश न होतू न हो तो हक़ की परस्तिश न होख़ुश्क था बिन तेरे दरख़्त-ए-अमलतू ने लगाए हैं ये सब फूल फलदिल को लुभाती है कभी बन के हूरगाह दिखाती है शराब-ए-तहूरनाम है सिदरा कभी तूबा तिरारोज़ निराला है तमाशा तिराकौसर ओ तसनीम है या सलसबीलजल्वे हैं सब तेरे ये बे-क़ाल-ओ-क़ीलरूप हैं हर पंथ में तेरे अलगहै कहीं फ़िरदौस कहीं है स्वर्गछूट गए सारे क़रीब और बईदएक न छूटी तो न छूटी उमीदतेरे ही दम से कटे जो दिन थे सख़्ततेरे ही सदक़े से मिला ताज-ओ-तख़्तख़ाकियों की तुझ से है हिम्मत बुलंदतू न हो तो काम हों दुनिया के बंदतुझ से ही आबाद है कौन-ओ-मकाँतू न हो तो है भी बरहम जहाँकोई पड़ता फिरता है बहर-ए-मआशहै कोई इक्सीर को करता तलाशइक तमन्ना में है औलाद कीएक को दिल-दार की है लौ लगीएक को है धन जो कुछ हाथ आएधूम से औलाद की शादी रचाएएक को कुछ आज अगर मिल गयाकल की है ये फ़िक्र कि खाएँगे क्याक़ौम की बहबूद का भूका है एकजिन में हो उन के लिए अंजाम-ए-नेकएक को है तिशनगी-ए-क़ुर्ब-ए-हक़जिस ने किया दिल से जिगर तक है शक़जो है ग़रज़ उस की नई जुस्तुजूलाख अगर दिल हैं तो लाख आरज़ूतुझ से हैं दिल सब के मगर बाग़ बाग़गुल कोई होने नहीं पाता चराग़सब ये समझते हैं कि पाई मुरादकहती है जब तू कि अब आई मुरादवा'दा तिरा रास्त हो या हो दरोग़तू ने दिए हैं उसे क्या क्या फ़रोग़वा'दे वफ़ा करती है गो चंद तूरखती है हर एक को ख़ुरसंद तूभाती है सब को तिरी लैत-ओ-लअ'लतू ने कहाँ सीखी है ये आज कलतल्ख़ को तू चाहे तो शीरीं करेबज़्म-ए-अज़ा को तरब-आगीं करेआने न दे रंज को मुफ़्लिस के पासरखे ग़नी उस को रहे जिस के पासयास का पाती है जो तू कुछ लगावसैकड़ों करती है उतार और चढ़ाओआने नहीं देती दिलों पर हिरासटूटने देती नहीं तालिब की आसजिन को मयस्सर न हो कमली फटीख़ुश हैं तवक़्क़ो पे वो ज़र-बफ़्त कीचटनी से रोटी का है जिन की बनावबैठे पकाते हैं ख़याली पोलावपाँव में जूती नहीं पर है ये ज़ौक़घोड़ा जो सब्ज़ा हो तो नीला हो तौक़फ़ैज़ के खोले हैं जहाँ तू ने बाबदेखते हैं झोंपड़े महलों के ख़्वाबतेरे करिश्मे हैं ग़ज़ब दिल-फ़रेबदिल में नहीं छोड़ते सब्र-ओ-शकेबतुझ से मुहव्विस ने जो शूरा लियाफूँक दिया कान में क्या जाने क्यादिल से भुलाया ज़न ओ फ़रज़ंद कोलग गया घुन नख़्ल-ए-बरोमँद कोखाने से पीने से हुआ सर्द जीऐसी कुछ इक्सीर की है लौ लगीदीन की है फ़िक्र न दुनिया से कामधुन है यही रात दिन और सुब्ह शामधोंकनी है बैठ के जब धोंकनाशह को समझता है इक अदना गदापैसे को जब ताव पे देता है तावपूछता यारों से है सोने का भावकहता है जब हँसते हैं सब देख कररह गई इक आँच की बाक़ी कसरहै इसी धुँद में वो आसूदा-हालतू ने दिया अक़्ल पे पर्दा सा डालतोल कर गर देखिए उस की ख़ुशीकोई ख़ुशी इस को न पहुँचे कभीफिरते हैं मोहताज कई तीरा-बख़्तजन के पैरों में था कभी ताज-ओ-तख़्तआज जो बर्तन हैं तो कल घर करोमलती है मुश्किल से इन्हें नान-ए-जौतैरे सिवा ख़ाक नहीं इन के पाससारी ख़ुदाई में है ले दे के आसफूले समाते नहीं इस आस परसाहिब-ए-आलम उन्हें कहिए अगरखाते हैं इस आस प क़स्में अजीबझूटे को हो तख़्त न या-रब नसीबहोता है नाैमीदियों का जब हुजूमआती है हसरत की घटा झूम झूमलगती है हिम्मत की कमर टूटनेहौसला का लगता है जी छूटनेहोती है बे-सब्री ओ ताक़त में जंगअर्सा-ए-आलम नज़र आता है तंगजी में ये आता है कि सम खाइएफाड़ के या कपड़े निकल जाइएबैठने लगता है दिल आवे की तरहयास डराती है छलावे की तरहहोता है शिकवा कभी तक़दीर काउड़ता है ख़ाका कभी तदबीर काठनती है गर्दूं से लड़ाई कभीहोती है क़िस्मत की हँसाई कभीजाता है क़ाबू से आख़िर दिल निकलकरती है इन मुश्किलों को तू ही हलकान में पहुँची तिरी आहट जो हैंरख़्त-ए-सफ़र यास नय बाँधा वहींसाथ गई यास के पज़मुर्दगीहो गई काफ़ूर सब अफ़्सुर्दगीतुझ में छुपा राहत-ए-जाँ का है भेदछोड़ियो 'हाली' का न साथ ऐ उमीद
ऐ वतन ऐ मिरे बहिश्त-ए-बरीँक्या हुए तेरे आसमान ज़मींरात और दिन का वो समाँ न रहावो ज़मीं और वो आसमाँ न रहासच बता तू सभी को भाता हैया कि मुझ से ही तेरा नाता हैमैं ही करता हूँ तुझ पे जान-निसारया कि दुनिया है तेरी आशिक़-ए-ज़ारक्या ज़माने को तू अज़ीज़ नहींऐ वतन तू तो ऐसी चीज़ नहींजिन्न-ओ-इंसान की हयात है तूमुर्ग़-ओ-माही की काएनात है तूहै नबातात का नुमू तुझ सेरूख तुझ बिन हरे नहीं होतेसब को होता है तुझ से नशो-ओ-नुमासब को भाती है तेरी आब-ओ-हवातेरी इक मुश्त-ए-ख़ाक के बदलेलूँ न हरगिज़ अगर बहिश्त मिलेजान जब तक न हो बदन से जुदाकोई दुश्मन न हो वतन से जुदा
आसमाँ पर रवाँ सुरमई बादलोहाँ तुम्हीं क्या उड़ो और ऊँचे उड़ोबाग़-ए-आलम के ताज़ा शगुफ़्ता गुलूबे-नियाज़ाना महका करो ख़ुश रहोलेकिन इतना भी सोचा, कभी ज़ालिमो!हम भी हैं आशिक़-ए-रंग-ओ-बू शहर में
अगर क़ब्रिस्तान मेंअलग अलग कत्बे न होंतो हर क़ब्र मेंएक ही ग़म सोया हुआ रहता हैकिसी माँ का बेटाकिसी भाई की बहनकिसी आशिक़ की महबूबातुम!किसी क़ब्र पर भी फ़ातिहा पढ़ के चले जाओ
शायर है तो अदना है, आशिक़ है तो रुस्वा हैकिस बात में अच्छा है किस वस्फ़ में आली है
चाहतों का जहान है उर्दूराहतों का निशान है उर्दूइश्क़ का ए'तिबार और वक़ारहुस्न की आन-बान है उर्दूदिल-फ़ज़ा ज़ौ-कदा सबाहत काऔर मलाहत की कान है उर्दूनस्र का है ख़िराम-ए-ख़ुश-हंगामशाइरी की उड़ान है उर्दूज़िंदा है अपना ज़ौक़-ओ-शौक़ इस सेआरज़ूओं की जान है उर्दूलुत्फ़ हस्ती का रंग मस्ती काख़ुशनुमा कारवान है उर्दूज़िक्र-ए-आराइश-ए-ख़म-ए-काकुलकैफ़-ए-हिन्दोस्तान है उर्दूदफ़्तर-ए-इत्तिहाद-ओ-यक-जेहतीप्यार की दास्तान है उर्दूएकता है अनेकता में भीदोस्त-दारी का मान है उर्दू'ग़ालिब'-ओ-'मीर' इस के शैदा थेजिन की रूह-ए-रवान है उर्दू'आतिश' ओ 'मोमिन' ओ 'नज़ीर' ओ 'जिगर'जिन की रंगीं ज़बान है उर्दूइस के आशिक़ 'नसीम' और चकबस्तजिन के जज़्बों की शान शान है उर्दूदोस्त इस के 'सुरूर' और 'सरशार'इस लिए शादमान है उर्दूदर्द-मंद इस के 'प्रेमचंद' रहेजिन के बाइ'स जवान है उर्दूइस के मुश्ताक़ 'मुल्ला' और 'फ़िराक़'जिन के दिल का बयान है उर्दूनारा-ज़न 'जोश' का ख़रोश इस मेंजोश की तर्जुमान है उर्दू'फ़ैज़' ओ 'इक़बाल' ओ कृष्ण-चंदर सेवुसअत-ए-बे-करान है उर्दूधूम 'महरूम' की हुई इस मेंऔर 'मुनव्वर' की आन है उर्दू'राशिद' ओ 'मीरा-जी' की अलबेलीशोख़-अदा राज़दान है उर्दूफ़ितनत-ओ-फ़न की दौलत-ए-बेदार'कृष्ण-मोहन' की जान है उर्दू
मज़हब कुछ हो हिन्दी हैं हम सारे भाई भाई हैंहिन्दू हैं या मुस्लिम हैं या सिख हैं या ईसाई हैंप्रेम ने सब को एक किया है प्रेम के हम शैदाई हैंभारत नाम के आशिक़ हैं हम भारत के सौदाई हैंभारत प्यारा देश हमारा सब देशों से न्यारा है
Devoted to the preservation & promotion of Urdu
A Trilingual Treasure of Urdu Words
Online Treasure of Sufi and Sant Poetry
World of Hindi language and literature
The best way to learn Urdu online
Best of Urdu & Hindi Books