aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "alam-bardaar"
किशवर-ए-मग़रिब अलम-बरदार-ए-तहज़ीब-ए-जदीदआ दिखा दूँ मैं तुझे अनवार-ए-तहज़ीब-ए-जदीदतू समझता है जिसे अपनी तरक़्क़ी का कमालख़त्म होती है यहीं पर आख़िरी हद्द-ए-ज़वालतू ने ऐ ग़ाफ़िल समझ रखा है जिस को बाम-ए-औजहै ये तूफ़ान-ए-हलाकत-आफ़रीं की एक मौजतू तरक़्क़ी कह रहा है जिस को दुनिया के ग़ुलामहै ये तेरी पस्ती-ए-अख़्लाक़ का इक और नाममैं ने माना है अनासिर पर हुकूमत तेरी आजतेरी हैबत ले रही है बादशाहों से ख़िराजरौशनी साइंस की गो तेरे ऐवानों में हैनूर-ए-ईमानी भी लेकिन दिल के काशानों में हैअक़्ल की शम्ओं' से गो रौशन हैं फ़ानूस-ए-दिमाग़दिल की ज़ुल्मत में जलाया भी कभी तू ने चराग़शौकत-ए-किसरा ओ शान-ए-जम तो दरबारों में हैजिंस-ए-नायाब-ए-वफ़ा भी तेरे बाज़ारों में हैअक्स-ए-ईसार-ओ-सदाक़त भी रुख़-ए-रौशन में हैमेहर-ओ-उल्फ़त का भी कोई फूल इस गुलशन में हैसाज़-ओ-सामान-ए-तरब सब कुछ तिरी महफ़िल में हैदर्द-ए-इंसानी का भी जल्वा किसी के दिल में हैमाद्दियत के नशे से मस्त है तेरा ग़ुरूरक्या मगर दिल को तिरे हासिल है रूहानी सुरूरये नहीं तो फ़ख़्र इस तहज़ीब पर बे-कार हैनंग-ए-इंसाँ ये तमद्दुन मौजिब-ए-सद-आर है
जंग-ए-आज़ादी का इक सच्चा अलम-बरदार भीमर्द-ए-कामिल था वो गोया फूल भी तलवार भी
मैं शाइ'र हूँ मुझे अहल-ए-हुनर फ़नकार कहते हैंमुझे रम्ज़-आश्ना-ए-निकहत-ए-गुलज़ार कहते हैंख़ुलूस-ओ-उन्स का मुझ को अलम-बरदार कहते हैंजो बाक़ी हैं मुझे इक बंदा-ए-बेकार कहते हैंज़बूँ-हाली की ज़द में है बयाँ मेरा ज़बाँ मेरीनहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शुनीदन दास्तान मेरी
नन्ही मुन्नी दूध की ख़ुशबू लुंढाती गुढ्लियों चलती मोहब्बत बाँटतीतुत्लाहटों का क़ाफ़िला-सालार है वोरस से भारी होंट चंदन सी महकती ज़ुल्फ़ अमृत से भरेउल्टे कटोरों लजलजी लज़्ज़त से बोझल टहनियों का ख़ंदक़ों क़ोसोंतिकोनों का अलम-बरदार है वोझुकती कमरों बर्फ़ से बालों बदन के दुखते जोड़ों जन्नती पैरोंकी ख़ातिर सूरत-ए-दस्तार है वोसुब्ह-ए-तख़्लीक़-ओ-तसव्वुर है जवानी की दो-पहरीविसाल-ए-ज़ीस्त का त्यौहार है वोप्यार है वो
कहो हिन्दोस्ताँ की जयकहो हिन्दोस्ताँ की जयवो हिन्दी नौजवाँ यानी अलम-बरदार-ए-आज़ादीवतन की पासबाँ वो तेग़-ए-जौहर-दार-ए-आज़ादीवो पाकीज़ा शरारा बिजलियों ने जिस को धोया हैवो अँगारा कि जिस में ज़ीस्त ने ख़ुद को समोया हैवो शम्-ए-ज़िंदगानी आँधियों ने जिस को पाला हैइक ऐसी नाव तूफ़ानों ने ख़ुद जिस को सँभाला हैवो ठोकर जिस से गीती लर्ज़ा-बर-अंदाम रहती हैवो धारा जिस के सीने पर अमल की नाव बहती हैछुपी ख़ामोश आहें शोर-ए-महशर बन के निकली हैंदबी चिंगारियाँ ख़ुर्शीद-ए-ख़ावर बन के निकली हैंबदल दी नौजवान-ए-हिन्द ने तक़दीर ज़िंदाँ कीमुजाहिद की नज़र से कट गई ज़ंजीर ज़िंदाँ कीकहो हिन्दोस्ताँ की जयकहो हिन्दोस्ताँ की जयकहो हिन्दोस्ताँ की जय......
मुल्क की हालत पे सीनों से धुआँ उठता नहींसाज़-ए-दिल ख़ामोश हैं शोर-ए-फ़ुग़ाँ उठता नहींकिस लिए आँखों से तूफ़ान-ए-निहाँ उठता नहींफूल रौंदे जा रहे हैं बाग़बाँ उठता नहींबे-हिसी की इंतिहा है होश में आते नहींज़िल्लतों पर ज़िल्लतें होती हैं शरमाते नहींशो'ला-ए-एहसास बुझता है हवा दे दो उसेक़ौमीयत दम तोड़ती है कुछ दवा दे दो उसेमुल्क मिटने को है पैग़ाम-ए-बक़ा दे दो उसेमुतमइन बैठे हो दिल सीने में घबराता नहींक़ौम के दम तोड़ने पर भी तरस आता नहींसाँस ले कर इस फ़ज़ा में रूह घबराती नहींजौहर-ए-एहसास-ए-ख़ुद्दारी को शर्म आती नहींतुम को नादारी वतन की ख़ाक तड़पाती नहींये ग़ुलामी की बला हैरत है खा जाती नहींज़िंदगी को दावत-ए-सद-मर्ग देना चाहिएमौत की आग़ोश में आराम लेना चाहिएछोड़ दो नाकामी-ए-क़िस्मत के शिकवे छोड़ दोकुछ भी हिम्मत है तो ये तौक़-ओ-सलासिल तोड़ दोऔज की जानिब निगाह-ए-शर्मगीं को मोड़ दोरिफ़अत-ए-माज़ी से फिर तक़दीर-ए-फ़र्दा जोड़ दोसच तो ये है क़ौम के बस तुम अलम-बरदार होता-ब-कै ये ख़्वाब-ए-ग़फ़लत सो चुके बेदार हो
एक फ़क़ीरएक इंसाँ पैकर-ए-इख़्लास रूह-ए-रास्तीइक फ़क़ीर-ए-बे-नवा ईसार जिस की ज़िंदगीजिस के हर क़ौल-ओ-अमल में अम्न का पैग़ाम थाजिस का हर इक़दाम गोया आफ़ियत-अंजाम थाजिस की दुनिया बंदगी भगती सुरूर-ए-जावेदाँजिस की दुनिया कैफ़-ओ-सरमस्ती की हासिल बे-गुमाँआश्ती थी जिस की फ़ितरत जिस का मज़हब प्यार थाख़िदमत-ए-इंसानियत का जो अलम-बरदार थाअज़्म ने जिस के हर इक मुश्किल को आसाँ कर दियाजज़्बा-ए-एहसास-ए-ख़ुद्दारी बशर में भर दियानाज़ उठाए हिन्द के वो हिन्द का ग़म-ख़्वार थाकारवान-ए-हुर्रियत का रहबर-ओ-सालार थाये भी है मोजिज़-बयानी उस की हर तहरीर कीनक़्श-ए-फ़र्सूदा से पैदा इक नई तस्वीर कीख़ाक से शो'ले उठे और आसमाँ पर छा गएमाह-ओ-अंजुम बन गए कौन-ओ-मकाँ पर छा गएतीरगी भागी जहालत की फ़ज़ा छुटने लगीहौले हौले तीरा-ओ-तारीक शब कटने लगीहर तरफ़ कैफ़-ओ-मसर्रत हर तरफ़ नूर-ओ-सुरूरग़ुंचे ग़ुंचे पर तबस्सुम चश्म-ए-नर्गिस पर ग़ुरूरये फ़ुसूँ-कारी हुई जिस के सबब वो कौन थाये जुनूँ-कारी हुई जिस के सबब वो कौन थानाम था गाँधी मगर उस के हज़ारों नाम हैंएक मय-ख़ाना है जिस में हर तरह के जाम हैं
ऐ बहादुर-लाल ऐ भारत सुपूततू था अम्न-ओ-आश्ती का पासदारअम्न की ख़ातिर गया था ताशक़ंदतू ने कर दी जान भी उस पर निसारअम्न-ओ-सुल्ह-ओ-जंग में यकता था तूभारती तहज़ीब का आईना-दारपैकर-ए-इज्ज़-ओ-ख़ुलूस-ओ-सादगीतू था तहज़ीब-ओ-तमद्दुन का निखारतू ने यक-जिहती अता की क़ौम कोएकता का दान भारत को दियासर हुआ ऊँचा हमारा हर जगहतू ने वो सम्मान भारत को दियाअज़्म तेरा आहनी दीवार थासालमियत मुल्क की थी तेरी जानशान-ए-मुल्क-ओ-क़ौम थी पेश-ए-नज़रतुझ को अपनी जान से बढ़ कर थी आनहो गई गुल शम्अ' दे कर रौशनीताक़तें अम्न-ओ-अमाँ की डट गईंज़िंदगी के साथ वाबस्ता है मौतये हक़ीक़त है मगर कितनी अजीबहम को ये एहसास होता ही नहींज़िंदगी से मौत है उतनी क़रीबज़ुल्मत-ए-शब से सहर की दिलकशीयास से उम्मीद का रौशन है नाममौत के रोके भी रुक सकता नहींज़िंदगी का कारवाँ तेज़-गामहिन्द है इस क़ाफ़िले का रहनुमाकारवाँ-सालार मीर-ए-कारवाँअम्न-ए-आलम का अलम-बरदार हैअम्न-परवर सुल्ह-जू हिन्दोस्ताँ
बशर रुमूज़-ए-मुक़द्दर तलाश करता हैक़ज़ा-ओ-क़द्र का मेहवर तलाश करता हैफ़क़ीह-ए-शहर सनम-ख़ाना-ए-सियासत मेंसिरात-ए-दीन का रहबर तलाश करता हैख़ुदा को छोड़ के जम्हूर का हवस-पेशासुकून-ए-क़ल्ब फ़लक पर तलाश करता हैमज़ाक़-ए-अद्ल से बेगाना है मगर इंसानफ़साद-ख़ाना में यावर तलाश करता हैपए नजात वतन में ब-फैज़-ए-आज़ादीशरीफ़ आदमी ख़ंजर तलाश करता हैफ़ज़ा-ए-दहर में तख़रीब का अलम-बरदारहयात-साज़ पयम्बर तलाश करता हैतराशता है बराहीम-ए-अस्र सद-असनामचराग़-ए-तूर पर आज़र तलाश करता हैबरहना ज़ुल्मत-ए-तहज़ीब में तन-ए-मरयममसीह-ए-वक़्त की चादर तलाश करता हैसनम-कदे में तफ़ल्सुफ़ के तीरा-दिल वाइ'ज़उवैस-ओ-ख़ालिद-ओ-बू-ज़र तलाश करता हैइलाज ख़ातिर-ए-मिल्लत का पासबान-ए-हरमलईन-ए-वक़्त के दर पर तलाश करता हैख़ुलूस-ए-दीन को बा'द-अज़-ख़राबी-ए-बिसयारज़माना आज मुकर्रर तलाश करता हैतन-ए-शुयूख़ ब-ज़ाहिर गलीम-पोश सहीज़मीर शाहिद-ओ-साग़र तलाश करता हैदुआ असीरी की करता है साहब-ए-क़ुरआँमफ़र ग़ुलामी से काफ़र तलाश करता हैमज़ाक़-ए-फ़क़्र है रहमत असर ज़माने मेंअज़ाब-ए-कुंज़ तवंगर तलाश करता हैजहान-ए-शोर में पैहम यज़ीद का लश्करहुसैन-ए-अस्र को घर घर तलाश करता हैसँवर तो सकती है मिल्लत की नासेहा तक़दीरलहू ज़माने का तेवर तलाश करता हैमियान-ए-बहर सदफ़ में गुहर तो है लेकिनख़तर-पसंद शनावर तलाश करता हैज़माना बत्न-ए-जहन्नम में एक मुद्दत सेनिशात-ओ-कैफ़ बराबर तलाश करता हैगुनाहगार है 'बेबाक' बे-नवा लेकिननबी का गुम्बद-ए-अख़ज़र तलाश करता है
कोई दाना ये पूछता था सवालख़ाकी इंसाँ में ऐसा क्या है कमालनाएब अल्लाह का ये बन बैठानहीं मिलती कहीं भी इस की मिसालइस का उक़्दा नहीं खुला अब तकक्यों किया इस को यूँ बुलंद-इक़बालये तो मजबूर अपनी ज़ात में हैवो अहद वो समद वो इज़्ज़-ओ-जलालये तग़य्युर के साथ जीता हैशान उस की कमाल-ए-इस्तिक़्लालयूँ तो मख़्लूक़ है मगर फिर भीकहीं औसाफ़ में कभी हो विसालइस की तारीफ़ क्या करे कोईजब मजाज़ी सिफ़ात-ए-हुस्न-ओ-जमालउस की तारीफ़ क्या बयान करूँचाहिए इक ख़ज़ीनत-उल-अमसालजम्अ' अज़दाद इस के वस्फ़ में हैंऔर वो औसाफ़ में कमाल-ए-कमालइस के दिल को टटोलिए तो कभीनूर है नूर का कभी इबतालइक तरफ़ इंतिहा पे हैं हसनातइक तरफ़ मुंतहा-ए-शर्र-ओ-ज़लालकभी अफ़्लाक तक रसाई हैकभी तहतुस्सरा में रू-ब-ज़वालकभी अल्लाह का पयम्बर हैकोई फ़िरऔन सा शनी' ख़िसालकभी इंकार में अना रब्बीऔर अनल-हक़ कभी ब-पेश-ए-जमालकभी दुनिया में जन्नतें आबादकभी फ़िरदौस छोड़ने पे मलालकभी मेहनत-कशी में ला-सानीऔर कभी ग़र्क़-ए-बहर-ए-ख़्वाब-ओ-ख़यालकभी क़ारून की शहंशाहीकभी फ़ाक़ों के साथ अक्ल-ए-हलालकभी दानिश में ये है अफ़लातूनऔर कभी फ़हम में है जेहल मिसालकभी दरमांदगी से पज़मुर्दाकभी उम्मीद से क़ुआ हैं बहालकभी अजराम पर कमंद-रसाऔर कभी ज़ावियों में मस्त बहालकभी उज़्लत-नशीं पहाड़ों मेंकभी मसरूफ़ियत में जंग-ओ-जिदालकभी अंदेशा-हा-ए-सूद-ओ-ज़ियाँऔर कभी अक़्ल से तही आ'मालकभी ता'मीर का अलम-बरदारकभी तख़रीब पर करे न मलालकभी नाक़ूस ओ दैर का है असीरकभी सहराओं में सदा-ए-बिलाल
प्यारी जो है तुझे ख़ुदा की क़समतुझ में है किस के हुस्न का आलमतुझ में किस शोख़ की सबाहत हैकिस की ज़ुल्फ़ों की तुझ में निगहत हैताज़गी तू ने किस की पाई हैतू ये सूरत कहाँ से लाई हैबाग़ आबाद है तिरे दम सेतेरी ख़ूबी जुदा है आलम सेबाग़ से तुझ को तोड़ लाते हैंलोग सर पर तुझे बिठाते हैंनाज़-बरदार हैं हसीन तिरेख़ुद तलबगार हैं हसीन तिरेजब तुझे आँखों से लगाते हैंतमकनत सारी भूल जाते हैंगो समझते हैं हम रक़ीब है तूफिर भी दिलकश है ख़ुश-नसीब है तू
मैं भी पैदा हुईवो भी पैदा हुआमैं आई तो ख़ुशियाँ बहुत थीं मगरवो आया तो शादयाने बजेमैं फख़्र-ए-माँ-बाप थावो फख़्र-ए-माँ-बाप थामैं ग़म-ख़्वार थीवो जलाली बहुत थामैं फ़र्मां-बरदार थीवो बाग़ी बहुत थामैं ज़मीं थावो आसमाँ थामेरा बचपन छीना गयाउस को बच्चा समझा गयामैं ख़तावार थी औरबे-ख़ता उस को समझा गयामुझ को पर्दे में रक्खा गयाउस को आज़ाद छोड़ा गयामुझ को चौका-बर्तन मिलाउस को गेंद और बल्ला मिलामैं भी पढ़ती थीवो भी पढ़ता थामैं नाक़िस-उल-अक़्ल थीवो दाना बहुत थाबज़्म-ए-आलम में उस का दर्जा सिवाथाक्यूँकि मैं औरत थीऔर वो मर्द था
सोचता हूँ मैंतुम्हारे ज़ेर-ए-लब हर्फ़-ए-सुख़न मेंकोई अफ़्साना है मुज़्मर या हक़ीक़त या फ़रेब-ए-पुख़्ता-काराँमैं नज़र रखता हूँ तुम परऔर तुम्हारी आँख है पैहम तआ'क़ुब में किसी इक अजनबी केअजनबी जो ख़ुद हिरासाँ और परेशाँ-हाल हैदूसरी जानिब सड़क पर देर से इक और शख़्सझूट को सच कह के जो एलान करता फिर रहा हैदिल ही दिल में डर रहा है
ऐ ज़मिस्ताँ की हुआ तेज़ न चलइस क़दर तेज़ न हो मौज-ए-सुबुक-ख़ेज़ की रौकहीं अश्जार के ख़ेमों की तनाबें कट जाएँज़र्द पत्ते हैं अभी गुलशन-ए-हस्ती का सिंघारकह रही है ये अभी अहद-ए-गुज़शता की बहाररंग-रफ़्ता हूँ मगर आज भी तस्वीर में हूँमुर्तसिम हैं मिरी शाख़ों पे मिरी याद के चाँदमैं हनूज़ अपने ख़यालात की ज़ंजीर में हूँअभी पत्तों पे चमक उठता है रंगों का ग़ुबारअभी शाख़ों में लहक जाती है बुलबुल की पुकारबर्ग-रीज़ाँ से कहो शहर से बाहर ठहरेशहर के बाग़ से बुस्तान-ए-दबिस्ताँ से परेबर्ग-ए-लर्ज़ां में तड़पता है अभी ज़ौक़-ए-नुमूपर-ए-ताऊस में है रक़्स की ख़्वाहिश अब भीअभी करता है चमन चाक-ए-गरेबाँ को रफ़ूयूँ तो क़ानून हैं फ़ितरत के अटलऐ ज़मिस्ताँ की हवा तेज़ न चलसई-ए-मलबूस में हैं कितने नगों बख़्त-ए-ज़बूँज़िंदगी जिन के लिए सहन-ए-समन-पोश नहींदूर के देस से आई हुई उतरन के लिएमर्द-ओ-ज़न कूचा-ओ-बाज़ार में रुस्वा हैं अभीजैसे हो क़हर-ए-मुजस्सम तिरी यख़-बस्ता जबींतेरी आहट में हो जैसे किसी दहशत का पयामतेरी दस्तक से लरज़ते हैं मकाँ और मकींवो मकाँ जिन के दर-ओ-बाम दर-ओ-बाम नहींवो मकीं जिन के लिए इशरत-ए-अय्याम नहींजिन के लहजों में नहीं लज़्ज़त-ए-गुफ़्तार का रंगजिन की आवाज़ में हैं तीरा-नसीबी के अज़ाबजिन से तहज़ीब लिया करती है जीने का ख़िराजजिन की हर साँस है अंदेशा-ए-फ़र्दा का निसाबइस क़दर तुंद न हो देख सँभलऐ ज़मिस्ताँ की हुआ तेज़ न चल
हंगामा-ए-कशाकश-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ न पूछशायद कि हो रहा है फिर इक इम्तिहाँ न पूछक्यूँकर लुटी है जिन्स-ए-गिराँ-माया-ए-नशातवीराँ हुआ है कैसे भरा आशियाँ न पूछशायद सुझा गई है मआल-ए-चमन का राज़क्या कह गई है बाग़ से बाद-ए-ख़िज़ाँ न पूछऐ नाशनास-ए-क़ीमत-ए-आज़ादी-ए-हयातहासिल हुई है चीज़ ये कितनी गिराँ न पूछतफ़रीक़-ए-बाहमी ये तशत्तुत ये इफ़्तिराक़ख़िरमन जला न दें कहीं ये बिजलियाँ न पूछअपनी जगह भी क्यों कोई अब मुतमइन नहींनुक्ता नहीं ये क़ाबिल-ए-शरह-ओ-बयाँ न पूछउलझा हुआ है बाहमी जंग-ओ-जदल में क्योंदुनिया पहुँच गई है कहाँ से कहाँ न पूछ'इबरत-नज़र से देख मआल-ए-गुल-ओ-चमनदस्तूर-ए-इंक़िलाब-ए-बहार-ओ-ख़िज़ाँ न पूछजिन से है अब भी दामन-ए-इंसान लाला-ज़ारअफ़्साना-ए-हयात की वो सुर्ख़ियाँ न पूछफ़ित्ना कोई जहाँ में नया जागता न होउठ्ठा है क्यों ये शोर-ए-ग़म-ए-ना-गहाँ न पूछ'इन'आम' ज़िंदगी के हक़ाएक़ के वास्तेलाज़िम है किस क़दर नज़र-ए-नुक्ता-दाँ न पूछ
तसल्लुत लाख ये सय्याद-ओ-बर्क़-ओ-बाग़बाँ कर लेंनहीं मुमकिन कि हम बाहर चमन से आशियाँ कर लेंबदल दें ये ज़मीं पैदा नया इक आसमाँ कर लेंहम अपने जज़्बा-ए-दिल से मुहय्या इक जहाँ कर लेंअभी सब दग़दग़ा मिट जाए ये सय्याद-ओ-गुलचीं काजो हम पैदा शु'ऊर-ए-ज़िंदगी-ए-गुलिस्ताँ कर लेंज़माना दे रहा है दा'वत-ए-बेदारी-ओ-जुरअतनिगाह-ओ-दिल को आमादा बरा-ए-इम्तिहाँ कर लेंपहुँच जाएँ हम इस्तिक़्लाल की ऐसी बुलंदी परनज़र मुस्तग़नी-ए-हंगामा-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ कर लेंअभी हो जाएँ पारा-पारा सब आ'दा की तदबीरेंज़रा हम मुजतमा' अपने अगर ताब-ओ-तवाँ कर लेंगुज़र अच्छा नहीं हर दम ये ज़िद पर आशियाने कीबस अपना रास्ता ही मुख़्तलिफ़ अब बिजलियाँ कर लेंबदल जाए अभी 'इन'आम' नज़्म-ए-शोरिश-ए-बातिलज़रा हम इत्तिबा'-ए-मशरब-ए-रूहानियाँ कर लें
दरिया-ए-तबी'अत को रवाँ हम ने किया हैदुर्र-ए-हा-ए-म'आनी को 'अयाँ हम ने किया हैयूँ हाल-ए-दिल-ए-ज़ार बयाँ हम ने किया हैख़ुद उन को भी अब अश्क-फ़िशाँ हम ने किया हैइन में भी नज़र कुछ की हक़ाएक़ से है महरूमये तज्ज़िया-ए-दीदा-वराँ हम ने किया हैकम हैं बहुत इंसानियत-ओ-ख़ुल्क़ की क़द्रेंये तज्रबा-ए-अहल-ए-जहाँ हम ने किया हैहै बात हमारी ही कि रिंदों को बहर-तौरज़ेर-ए-असर-ए-पीर-ए-मुग़ाँ हम ने किया हैक्या ख़ूब उभर आए नुक़ूश-ए-गुल-ओ-लालाआँखों को जो ख़ूँ-नाबा-फ़शाँ हम ने किया हैइक मोड़ दिया है रुख़-ए-तारीख़ को जिस नेकिरदार वो 'आलम पे 'अयाँ हम ने किया हैमाहौल के ज़ुल्मत-कदा-ए-तीरा-शबी कोइक जल्वा-गह-ए-काहकशाँ हम ने किया हैगोया हैं दिल-ओ-दीदा ज़बाँ साकित-ओ-ख़ामोशइस तर्ज़ से भी शोर-ए-फ़ुग़ाँ हम ने किया हैपैहम रहे हम हुस्न-ए-यक़ीं के मुतजस्सिसकब कोई ग़लत वहम-ओ-गुमाँ हम ने किया है'इबरत-कदा-ए-दहर की इक खींच दी तस्वीरजब ज़िक्र-ए-जहान-ए-गुज़राँ हम ने किया हैशाइस्तगी-ए-फ़िक्र को भी नाज़ है जिस परपैदा वही उस्लूब-ए-बयाँ हम ने किया हैलब्बैक कहा है रसन-ओ-दार को जिस नेवो हौसला-ए-क़ल्ब-ए-तपाँ हम ने किया हैख़ल्लाक़-ए-दो-'आलम का किया ज़िक्र-ओ-तसव्वुरक्या ख़ूब 'इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ हम ने किया हैहम ने ही बनाया उन्हें मरदान-ए-ख़ुश-अन्फ़ासतब्दील रूख़-ए-बादा-कशाँ हम ने किया हैहर ख़ल्वत-ओ-जल्वत में जो कहते रहे दाइमवो बरसर-ए-मिम्बर भी बयाँ हम ने किया हैहर हाल में राज़ी रहे हम उस की रज़ा मेंकब तब्सिरा-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ हम ने किया हैकोहसार-ओ-समा जिस के उठाने से थे मा'ज़ूरबर्दाश्त वो इक बार-ए-गराँ हम ने किया हैहक़-गोई अगर जुर्म है ये जुर्म निको-तरहम डट के ये कहते हैं कि हाँ हम ने किया हैइंसान हैं इंसान हम इक अशरफ़-ए-मख़्लूक़तस्ख़ीर जो ये कौन-ओ-मकाँ हम ने किया हैजिस दर्जा पए-'आलम-ए-बाला है ज़रूरी'इन'आम' वो सामान कहाँ हम ने किया है
दुनिया-ए-रंग-ओ-बू से मोहब्बत नहीं रहीअब गुल-रुख़ान-ए-दहर की चाहत नहीं रहीया-रब ये किस मक़ाम पर अब आ गया हूँ मैंबेज़ार दिल को उन से भी उल्फ़त नहीं रहीबीमार-ए-ग़म की चारागरी अब न कीजिएइस को किसी इलाज की हाजत नहीं रहीआज़ुर्दा मुझ को देख के कहते हैं सब रफ़ीक़क्या हो गया तुम्हें कि बशाशत नहीं रहीजो कुछ कहा किसी ने वो चुपके से सुन लियादुनिया से अब उलझने की हिम्मत नहीं रहीदुश्वारी-ए-हयात से है क़ाफ़िया ही तंगऐसे में शेर कहने की फ़ुर्सत नहीं रहीतक़दीर ने भी अपनी नज़र मुझ से फेर लीजब से तुम्हारी चश्म-ए-इनायत नहीं रहीइस आलम-ए-वजूद पे तन्क़ीद क्या करूँअब मुझ को ऐब-जूई की आदत नहीं रहीजल्वा हर एक शय में है परवरदिगार कादिल को किसी भी चीज़ से नफ़रत नहीं रहीतेरी तजल्लियों से हुआ दिल भी जाम-ए-जमइस आइने पे गर्द-ए-कुदूरत नहीं रहीया दूर भागता था मैं अपनों के नाम सेया दुश्मनों से भी मुझे वहशत नहीं रहीज़र है कसौटी अज़्मत-ए-इंसाँ की आज-कलइल्म-ओ-हुनर की अब कोई वक़अत नहीं रहीतहज़ीब-ए-नौ ने देखिए क्या गुल खिलाए हैंमफ़क़ूद है ख़ुलूस मुरव्वत नहीं रहीगो औरतों में जज़्बा-ए-ईसार ख़त्म हैमर्दों में भी हमिय्यत-ओ-ग़ैरत नहीं रहीबाज़ार गर्म रहता है मक्र-ओ-फ़रेब कासिद्क़-ओ-सफ़ा की अब कोई क़ीमत नहीं रहीहै आदमी की ज़ात से लर्ज़ां ख़ुद आदमीअहल-ए-जहाँ के दिल में उख़ुव्वत नहीं रहीलाहौर क्या छुटा कि ज़माना बदल गयाअर्बाब-ए-ज़ौक़-ओ-शौक़ की सोहबत नहीं रहीक्या बात है कि अब तिरे शे'रों में ऐ 'बहार'वो सोज़ वो तड़प वो हरारत नहीं रही
फ़रोग़-ए-चश्म है तस्कीन-ए-दिल है बे-गुमाँ उर्दूहर इक आलम में है गोया बहार-ए-गुल-फ़िशाँ उर्दूकोई देखे तो इस की क़ुव्वत-ए-तख़्लीक़ का आलमबना सकती है ज़ेर-ए-चर्ख़ लाखों आसमाँ उर्दूमुक़ल्लिद जो नहीं इस का वो पहुँचेगा न मंज़िल परसर-ए-हर-जादा-ए-मंज़िल है मीर-ए-कारवाँ उर्दूमुहाफ़िज़ अपनी क़ुव्वत से है तहज़ीब-ओ-तमद्दुन कीन क्यूँ हो इर्तिक़ा-ए-ज़िंदगी की राज़-दाँ उर्दूगुलिस्तान-ए-अदब में जिस क़दर थे मुंतशिर जल्वेमुनज़्ज़म कर चुकी है उन को मिस्ल-ए-जिस्म-ओ-जाँ उर्दूफ़ज़ा-ए-इल्म-ओ-फ़न पर ये मिसाल-ए-अब्र छाई हैमज़ाक़-ए-जुस्तुजू बन कर रग-ए-दिल में समाई हैज़बानें और भी दुनिया में कुछ गर्मी-ए-महफ़िल हैंमगर मंज़िल है उर्दू और वो सब गर्द-ए-मंज़िल हैंहर इक अंदाज़ रौशन हर बयाँ पुर-कैफ़ है इस काअदाएँ जिस क़दर भी हैं वो शरह-ए-जज़्बा-ए-दिल हैंज़मीन-ए-शेर इस की इक चमन-ज़ार-ए-मोहब्ब्बत हैहैं जितने गीत वो सब नग़्मा-ए-फ़ितरत का हासिल हैरियाज़ी हो कि मंतिक़ फ़ल्सफ़ा हो या तसव्वुफ़ होसब इस की बज़्म में मौजूद हैं और जान-ए-महफ़िल हैंमिली हैं जल्वा-ए-फ़ितरत की सब रंगीनियाँ इस कोमुरक़्क़े इस के सीने से लगा लेने के क़ाबिल हैंरिवाज इस का जहाँ की वुसअतों में बे-तकल्लुफ़ हैये पाकीज़ा ज़बाँ है और लतीफ़ इस का तसर्रुफ़ हैमिटा सकता है कौन ऐसी ज़बान-ए-पाक-फ़ितरत कोदया दर्स-ए-वफ़ा जिस ने मज़ाक़-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत कोजुमूद-ज़िंदगी में हश्र बरपा कर दिया इस नेअता की हैं इसी ने बिजलियाँ एहसास-ए-उल्फ़त कोनिज़ाम-ए-ज़िंदगानी पर बड़ा एहसान है इस काबहुत आसानियाँ इस में मिलें तब्लीग़-ए-फ़ितरत कोरहे शान-ए-तलाक़त लफ़्ज़-ओ-मा'नी हैं कि गुल-बूटेज़हे औज-ए-हज़ाक़त जान दे दी मुर्दा हिकमत कोये मुमकिन है कि क़ौमों को मिटा दे गर्दिश-ए-आलममगर कोई मिटा सकता नहीं उर्दू की अज़्मत कोहर इक तहरीक इस की तर्जुमान जज़्ब-ए-कामिल हैकि हर आहंग-ए-उर्दू हमनवा-ए-बरबत-ए-दिल है
दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबीउफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर-ए-गिराँ-ख़्वाबीउरूक़-मुर्दा-ए-मशरिक़ में ख़ून-ए-ज़िंदगी दौड़ासमझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबीमुसलमाँ को मुसलमाँ कर दिया तूफ़ान-ए-मग़रिब नेतलातुम-हा-ए-दरिया ही से है गौहर की सैराबीअता मोमिन को फिर दरगाह-ए-हक़ से होने वाला हैशिकोह-ए-तुर्कमानी ज़ेहन हिन्दी नुत्क़ आराबीअसर कुछ ख़्वाब का ग़ुंचों में बाक़ी है तू ऐ बुलबुलनवा-रा तल्ख़-तरमी ज़न चू ज़ौक़-ए-नग़्मा कम-याबीतड़प सेहन-ए-चमन में आशियाँ में शाख़-सारों मेंजुदा पारे से हो सकती नहीं तक़दीर-ए-सीमाबीवो चश्म-ए-पाक हैं क्यूँ ज़ीनत-ए-बर-गुस्तवाँ देखेनज़र आती है जिस को मर्द-ए-ग़ाज़ी की जिगर-ताबीज़मीर-ए-लाला में रौशन चराग़-ए-आरज़ू कर देचमन के ज़र्रे ज़र्रे को शहीद-ए-जुस्तुजू कर देसरिश्क-ए-चश्म-ए-मुस्लिम में है नैसाँ का असर पैदाख़लीलुल्लाह के दरिया में होंगे फिर गुहर पैदाकिताब-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा की फिर शीराज़ा-बंदी हैये शाख़-ए-हाशमी करने को है फिर बर्ग-ओ-बर पैदारबूद आँ तुर्क शीराज़ी दिल-ए-तबरेज़-ओ-काबुल रासबा करती है बू-ए-गुल से अपना हम-सफ़र पैदाअगर उस्मानियों पर कोह-ए-ग़म टूटा तो क्या ग़म हैकि ख़ून-ए-सद-हज़ार-अंजुम से होती है सहर पैदाजहाँबानी से है दुश्वार-तर कार-ए-जहाँ-बीनीजिगर ख़ूँ हो तो चश्म-ए-दिल में होती है नज़र पैदाहज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती हैबड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदानवा-पैरा हो ऐ बुलबुल कि हो तेरे तरन्नुम सेकबूतर के तन-ए-नाज़ुक में शाहीं का जिगर पैदातिरे सीने में है पोशीदा राज़-ए-ज़िंदगी कह देमुसलमाँ से हदीस-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी कह देख़ुदा-ए-लम-यज़ल का दस्त-ए-क़ुदरत तू ज़बाँ तू हैयक़ीं पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल कि मग़लूब-ए-गुमाँ तू हैपरे है चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम से मंज़िल मुसलमाँ कीसितारे जिस की गर्द-ए-राह हों वो कारवाँ तो हैमकाँ फ़ानी मकीं फ़ानी अज़ल तेरा अबद तेराख़ुदा का आख़िरी पैग़ाम है तू जावेदाँ तू हैहिना-बंद-ए-उरूस-ए-लाला है ख़ून-ए-जिगर तेरातिरी निस्बत बराहीमी है मेमार-ए-जहाँ तू हैतिरी फ़ितरत अमीं है मुम्किनात-ए-ज़िंदगानी कीजहाँ के जौहर-ए-मुज़्मर का गोया इम्तिहाँ तो हैजहान-ए-आब-ओ-गिल से आलम-ए-जावेद की ख़ातिरनबुव्वत साथ जिस को ले गई वो अरमुग़ाँ तू हैये नुक्ता सरगुज़िश्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा से है पैदाकि अक़्वाम-ए-ज़मीन-ए-एशिया का पासबाँ तू हैसबक़ फिर पढ़ सदाक़त का अदालत का शुजाअ'त कालिया जाएगा तुझ से काम दुनिया की इमामत कायही मक़्सूद-ए-फ़ितरत है यही रम्ज़-ए-मुसलमानीउख़ुव्वत की जहाँगीरी मोहब्बत की फ़रावानीबुतान-ए-रंग-ओ-ख़ूँ को तोड़ कर मिल्लत में गुम हो जान तूरानी रहे बाक़ी न ईरानी न अफ़्ग़ानीमियान-ए-शाख़-साराँ सोहबत-ए-मुर्ग़-ए-चमन कब तकतिरे बाज़ू में है परवाज़-ए-शाहीन-ए-क़हस्तानीगुमाँ-आबाद हस्ती में यक़ीं मर्द-ए-मुसलमाँ काबयाबाँ की शब-ए-तारीक में क़िंदील-ए-रुहबानीमिटाया क़ैसर ओ किसरा के इस्तिब्दाद को जिस नेवो क्या था ज़ोर-ए-हैदर फ़क़्र-ए-बू-ज़र सिद्क़-ए-सलमानीहुए अहरार-ए-मिल्लत जादा-पैमा किस तजम्मुल सेतमाशाई शिगाफ़-ए-दर से हैं सदियों के ज़िंदानीसबात-ए-ज़िंदगी ईमान-ए-मोहकम से है दुनिया मेंकि अल्मानी से भी पाएँदा-तर निकला है तूरानीजब इस अँगारा-ए-ख़ाकी में होता है यक़ीं पैदातो कर लेता है ये बाल-ओ-पर-ए-रूह-उल-अमीं पैदाग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरेंजो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरेंकोई अंदाज़ा कर सकता है उस के ज़ोर-ए-बाज़ू कानिगाह-ए-मर्द-ए-मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरेंविलायत पादशाही इल्म-ए-अशिया की जहाँगीरीये सब क्या हैं फ़क़त इक नुक्ता-ए-ईमाँ की तफ़्सीरेंबराहीमी नज़र पैदा मगर मुश्किल से होती हैहवस छुप छुप के सीनों में बना लेती है तस्वीरेंतमीज़-ए-बंदा-ओ-आक़ा फ़साद-ए-आदमियत हैहज़र ऐ चीरा-दस्ताँ सख़्त हैं फ़ितरत की ताज़ीरेंहक़ीक़त एक है हर शय की ख़ाकी हो कि नूरी होलहू ख़ुर्शीद का टपके अगर ज़र्रे का दिल चीरेंयक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलमजिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरेंचे बायद मर्द रा तब-ए-बुलंद मशरब-ए-नाबेदिल-ए-गरमे निगाह-ए-पाक-बीने जान-ए-बेताबेउक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बाल-ओ-पर निकलेसितारे शाम के ख़ून-ए-शफ़क़ में डूब कर निकलेहुए मदफ़ून-ए-दरिया ज़ेर-ए-दरिया तैरने वालेतमांचे मौज के खाते थे जो बन कर गुहर निकलेग़ुबार-ए-रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिन कोजबीनें ख़ाक पर रखते थे जो इक्सीर-गर निकलेहमारा नर्म-रौ क़ासिद पयाम-ए-ज़िंदगी लायाख़बर देती थीं जिन को बिजलियाँ वो बे-ख़बर निकलेहरम रुस्वा हुआ पीर-ए-हरम की कम-निगाही सेजवानान-ए-ततारी किस क़दर साहब-नज़र निकलेज़मीं से नूरयान-ए-आसमाँ-परवाज़ कहते थेये ख़ाकी ज़िंदा-तर पाएँदा-तर ताबिंदा-तर निकलेजहाँ में अहल-ए-ईमाँ सूरत-ए-ख़ुर्शीद जीते हैंइधर डूबे उधर निकले उधर डूबे इधर निकलेयक़ीं अफ़राद का सरमाया-ए-तामीर-ए-मिल्लत हैयही क़ुव्वत है जो सूरत-गर-ए-तक़दीर-ए-मिल्लत हैतू राज़-ए-कुन-फ़काँ है अपनी आँखों पर अयाँ हो जाख़ुदी का राज़-दाँ हो जा ख़ुदा का तर्जुमाँ हो जाहवस ने कर दिया है टुकड़े टुकड़े नौ-ए-इंसाँ कोउख़ुव्वत का बयाँ हो जा मोहब्बत की ज़बाँ हो जाये हिन्दी वो ख़ुरासानी ये अफ़्ग़ानी वो तूरानीतू ऐ शर्मिंदा-ए-साहिल उछल कर बे-कराँ हो जाग़ुबार-आलूदा-ए-रंग-ओ-नसब हैं बाल-ओ-पर तेरेतू ऐ मुर्ग़-ए-हरम उड़ने से पहले पर-फ़िशाँ हो जाख़ुदी में डूब जा ग़ाफ़िल ये सिर्र-ए-ज़िंदगानी हैनिकल कर हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जामसाफ़-ए-ज़िंदगी में सीरत-ए-फ़ौलाद पैदा करशबिस्तान-ए-मोहब्बत में हरीर ओ पर्नियाँ हो जागुज़र जा बन के सैल-ए-तुंद-रौ कोह ओ बयाबाँ सेगुलिस्ताँ राह में आए तो जू-ए-नग़्मा-ख़्वाँ हो जातिरे इल्म ओ मोहब्बत की नहीं है इंतिहा कोईनहीं है तुझ से बढ़ कर साज़-ए-फ़ितरत में नवा कोईअभी तक आदमी सैद-ए-ज़बून-ए-शहरयारी हैक़यामत है कि इंसाँ नौ-ए-इंसाँ का शिकारी हैनज़र को ख़ीरा करती है चमक तहज़ीब-ए-हाज़िर कीये सन्नाई मगर झूटे निगूँ की रेज़ा-कारी हैवो हिकमत नाज़ था जिस पर ख़िरद-मंदान-ए-मग़रिब कोहवस के पंजा-ए-ख़ूनीं में तेग़-ए-कार-ज़ारी हैतदब्बुर की फ़ुसूँ-कारी से मोहकम हो नहीं सकताजहाँ में जिस तमद्दुन की बिना सरमाया-दारी हैअमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भीये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी हैख़रोश-आमोज़ बुलबुल हो गिरह ग़ुंचे की वा कर देकि तू इस गुल्सिताँ के वास्ते बाद-ए-बहारी हैफिर उट्ठी एशिया के दिल से चिंगारी मोहब्बत कीज़मीं जौलाँ-गह-ए-अतलस क़बायान-ए-तातारी हैबया पैदा ख़रीदा रास्त जान-ए-ना-वान-ए-रापस अज़ मुद्दत गुज़ार उफ़्ताद बर्मा कारवाने राबया साक़ी नवा-ए-मुर्ग़-ज़ार अज़ शाख़-सार आमदबहार आमद निगार आमद निगार आमद क़रार आमदकशीद अब्र-ए-बहारी ख़ेमा अंदर वादी ओ सहरासदा-ए-आबशाराँ अज़ फ़राज़-ए-कोह-सार आमदसरत गर्दम तोहम क़ानून पेशीं साज़ दह साक़ीकि ख़ैल-ए-नग़्मा-पर्दाज़ाँ क़तार अंदर क़तार आमदकनार अज़ ज़ाहिदाँ बर-गीर ओ बेबाकाना साग़र-कशपस अज़ मुद्दत अज़ीं शाख़-ए-कुहन बाँग-ए-हज़ार आमदब-मुश्ताक़ाँ हदीस-ए-ख़्वाजा-ए-बदरौ हुनैन आवरतसर्रुफ़-हा-ए-पिन्हानश ब-चश्म-ए-आश्कार आमददिगर शाख़-ए-ख़लील अज़ ख़ून-ए-मा नमनाक मी गर्ददब-बाज़ार-ए-मोहब्बत नक़्द-ए-मा कामिल अय्यार आमदसर-ए-ख़ाक-ए-शाहीरे बर्ग-हा-ए-लाला मी पाशमकि ख़ूनश बा-निहाल-ए-मिल्लत-ए-मा साज़गार आमदबया ता-गुल बा-अफ़ोशनीम ओ मय दर साग़र अंदाज़ेमफ़लक रा सक़्फ़ ब-शागाफ़ेम ओ तरह-ए-दीगर अंदाज़ेम
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