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नज़्म
किशवर-ए-मग़रिब अलम-बरदार-ए-तहज़ीब-ए-जदीद
आ दिखा दूँ मैं तुझे अनवार-ए-तहज़ीब-ए-जदीद
ज़फ़र अहमद सिद्दीक़ी
नज़्म
तिकोनों का अलम-बरदार है वो
झुकती कमरों बर्फ़ से बालों बदन के दुखते जोड़ों जन्नती पैरों
बिमल कृष्ण अश्क
नज़्म
ख़िदमत-ए-इंसानियत का जो अलम-बरदार था
अज़्म ने जिस के हर इक मुश्किल को आसाँ कर दिया
साहिर होशियारपुरी
नज़्म
रिफ़अत-ए-माज़ी से फिर तक़दीर-ए-फ़र्दा जोड़ दो
सच तो ये है क़ौम के बस तुम अलम-बरदार हो
शहज़ादी कुलसूम
नज़्म
ख़ुलूस-ओ-उन्स का मुझ को अलम-बरदार कहते हैं
जो बाक़ी हैं मुझे इक बंदा-ए-बेकार कहते हैं
असद जाफ़री
नज़्म
वो हिन्दी नौजवाँ यानी अलम-बरदार-ए-आज़ादी
वतन की पासबाँ वो तेग़-ए-जौहर-दार-ए-आज़ादी
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
फ़रोग़-ए-चश्म है तस्कीन-ए-दिल है बे-गुमाँ उर्दू
हर इक आलम में है गोया बहार-ए-गुल-फ़िशाँ उर्दू
अलम मुज़फ़्फ़र नगरी
नज़्म
तेरे फ़िरदौस-ए-तख़य्युल से है क़ुदरत की बहार
तेरी किश्त-ए-फ़िक्र से उगते हैं आलम सब्ज़ा-वार
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
फ़स्ल-ए-बहार आई मगर हम हैं और ग़म
हर सम्त से हैं घेरे हुए सदमा-ओ-अलम