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नज़्म
ख़ूँ चूस रहा है पौदों का इक फूल जो ख़ंदाँ होता है
पामाल बना कर सब्ज़ों को इक सर्व खरामा होता है
नुशूर वाहिदी
नज़्म
ये अपने हाथ में तहज़ीब का फ़ानूस लेती है
मगर मज़दूर के तन से लहू तक चूस लेती है
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
सारी क़ुव्वत चूस चुकी दिन भर की शहर-नवर्दी
माथों में से झाँक रही है मरती धूप की ज़र्दी
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
कितने हाथों ने निचोड़ा है मिरी ज़ुल्फ़ों को
कितने भँवरे मिरा रस चूस के मुँह मोड़ गए
नरेश कुमार शाद
नज़्म
जो मरते हैं आसानी से और जीते हैं दुश्वारी से
ख़ूँ चूस लिया है ग़ैरों ने बीमार भी हैं नादान भी हैं