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नज़्म
साहिर लुधियानवी
नज़्म
क्यूँ दाद-ए-ग़म हमीं ने तलब की बुरा किया
हम से जहाँ में कुश्ता-ए-ग़म और क्या न थे
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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क्यूँ दाद-ए-ग़म हमीं ने तलब की बुरा किया
हम से जहाँ में कुश्ता-ए-ग़म और क्या न थे