aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "gashta"
मैं भी नाकाम-ए-वफ़ा था तो भी महरूम-ए-मुरादहम ये समझे थे कि दर्द-ए-मुश्तरक रास आ गयातेरी खोई मुस्कुराहट क़हक़हों में ढल गईमेरा गुम-गश्ता सुकूँ फिर से मिरे पास आ गया
तुम नहीं आए थे जब तब भी तो मौजूद थे तुमआँख में नूर की और दिल में लहू की सूरतदर्द की लौ की तरह प्यार की ख़ुश्बू की तरहबेवफ़ा वादों की दिलदारी का अंदाज़ लिएतुम नहीं आए थे जब तब भी तो तुम आए थेरात के सीने में महताब के ख़ंजर की तरहसुब्ह के हाथ में ख़ुर्शीद के साग़र की तरहशाख़-ए-ख़ूँ-रंग-ए-तमन्ना में गुल-ए-तर की तरहतुम नहीं आओगे जब तब भी तो तुम आओगेयाद की तरह धड़कते हुए दिल की सूरतग़म के पैमाना-ए-सर-शार को छलकाते हुएबर्ग-हा-ए-लब-ओ-रुख़्सार को महकाते हुएदिल के बुझते हुए अँगारे को दहकाते हुएज़ुल्फ़-दर-ज़ुल्फ़ बिखर जाएगा फिर रात का रंगशब-ए-तन्हाई में भी लुत्फ़-ए-मुलाक़ात का रंगरोज़ लाएगी सबा कू-ए-सबाहत से पयामरोज़ गाएगी सहर तहनियत-ए-जश्न-ए-फ़िराक़आओ आने की करें बातें कि तुम आए होअब तुम आए हो तो मैं कौन सी शय नज़्र करोकि मिरे पास ब-जुज़ मेहर ओ वफ़ा कुछ भी नहींएक ख़ूँ-गश्ता तमन्ना के सिवा कुछ भी नहीं
पहलू-ए-शाह में ये दुख़्तर-ए-जम्हूर की क़ब्रकितने गुम-गश्ता फ़सानों का पता देती हैकितने ख़ूँ-रेज़ हक़ाएक़ से उठाती है नक़ाबकितनी कुचली हुई जानों का पता देती है
अहद-ए-गुम-गश्ता की तस्वीर दिखाती क्यूँ होएक आवारा-ए-मंज़िल को सताती क्यूँ होवो हसीं अहद जो शर्मिंदा-ए-ईफ़ा न हुआउस हसीं अहद का मफ़्हूम जताती क्यूँ होज़िंदगी शोला-ए-बे-बाक बना लो अपनीख़ुद को ख़ाकिस्तर-ए-ख़ामोश बनाती क्यूँ होमैं तसव्वुफ़ के मराहिल का नहीं हूँ क़ाइलमेरी तस्वीर पे तुम फूल चढ़ाती क्यूँ होकौन कहता है कि आहें हैं मसाइब का इलाजजान को अपनी अबस रोग लगाती क्यूँ होएक सरकश से मोहब्बत की तमन्ना रख करख़ुद को आईन के फंदों में फंसाती क्यूँ होमैं समझता हूँ तक़द्दुस को तमद्दुन का फ़रेबतुम रसूमात को ईमान बनाती क्यूँ होजब तुम्हें मुझ से ज़ियादा है ज़माने का ख़यालफिर मिरी याद में यूँ अश्क बहाती क्यूँ होतुम में हिम्मत है तो दुनिया से बग़ावत कर दोवर्ना माँ बाप जहाँ कहते हैं शादी कर लो
दिल दर्द की शिद्दत से ख़ूँ-गश्ता ओ सी-पाराइस शहर में फिरता है इक वहशी-ओ-आवाराशायर है कि आशिक़ है, जोगी है कि बंजारादरवाज़ा खुला रखना
मैं कि ख़ुद अपनी ही आवाज़ के शो'लों का असीरमैं कि ख़ुद अपनी ही ज़ंजीर का ज़िंदानी हूँकौन समझेगा जहाँ में मिरे ज़ख़्मों का हिसाबकिस को ख़ुश आएगा इस दहर में रूहों का अज़ाबकौन आ कर मिरे मिटने का तमाशा देखेकिस को फ़ुर्सत कि उजड़ती हुई दुनिया देखेकौन भड़की हुई इस आग को अपनाएगाजो भी आएगा मिरे साथ ही जल जाएगावो घड़ी कौन थी जब मुझ को मिला था बन-बासएक झोंका भी हवा का न वतन से आयाने कोई निकहत-ए-गुल और न कोई मौज-ए-नसीमफिर कोई ढूँडने मुझ को न चमन से आयामैं वो इक लाल हूँ जो बिक गया बाज़ारों मेंफिर कोई पूछने मुझ को न यमन से आयायाद करते हुए इक यूसुफ़-ए-गुम-गश्ता कोकुछ दिनों रोई तो होगी मिरे घर की दीवारकुछ दिनों गाँव की गलियों में उदासी होगीकुछ दिनों खुल न सके होंगे तिरे हार सिंघारकुछ दिनों के लिए सुनसान सा लगता होगाआम के बाग़ में बेचैन फिरी होगी बहारमैं ने इक पेड़ पे जो नाम लिखा था अपनाकुछ दिनों ज़ख़्म के मानिंद वो ताज़ा होगामेरे सब दोस्त उसे देख के कहते होंगेजाने किस देस में बेचारा भटकता होगाउम्र भर कौन किसे याद किया करता हैएक इक कर के मुझे सब ने भुलाया होगाहाए उन को भी ख़बर क्या कि वो इक ज़ख़्म-नसीबज़िंदगी के लिए निकला था जो राही बन करआज तक पा न सका चश्मा-ए-आब-ए-हैवाँउस को सूरज भी मिले हैं तो सियाही बन करघर से लाया था जो कुछ तब्-ए-रवाँ ज़ेहन-ए-रसासाथ उस के रहे असबाब-ए-तबाही बन करमेरा ये जुर्म कि मैं साहब-ए-इदराक-ओ-शुऊरमेरा ये ऐब कि इक शाइर ओ फ़नकार हूँ मैंमुझ को ये ज़िद है कि मैं सर न झुकाऊँगा कभीमुझ को इसरार कि जीने का सज़ा-वार हूँ मैंमुझ को ये फ़ख़्र कि मैं हक़्क़-ओ-सदाक़त का अमींमुझ को ये ज़ोम ख़ुद-आगाह हूँ ख़ुद्दार हूँ मैंएक इक मोड़ पे आलाम ओ मसाइब के पहाड़एक इक गाम पे आफ़ात से टकराया हूँएक इक ज़हर को हँस हँस के पिया है मैं नेएक इक ज़ख़्म को चुन चुन के उठा लाया हूँएक इक लम्हे की ज़ंजीर से मैं उलझा हूँएक इक साँस पे ख़ुद आप से शरमाया हूँयूँ तो कहने की नहीं बात मगर कहता हूँप्यार का नाम किताबों में लिखा देखा हैजब कभी हाथ बढ़ाया है किसी की जानिबफ़ासला और भी कुछ बढ़ता हुआ देखा हैबूँद भर दे न सका कोई मोहब्बत की शराबयूँ तो मय-ख़ाने का मय-ख़ाना लुटा देखा है
जानतुम को ख़बर तक नहींलोग अक्सर बुरा मानते हैंकि मेरी कहानी किसी मोड़ पर भीअँधेरी गली से गुज़रती नहींकि तुम ने शुआ'ओं से हर रंग ले करमिरे हर निशान-ए-क़दम को धनक सौंप दीन गुम-गश्ता ख़्वाबों की परछाइयाँ हैंन बे-आस लम्हों की सरगोशियाँ हैंकि नाज़ुक हरी बेल कोइक तवाना शजर अन-गिनत अपने हाथों मेंथामे हुए हैकोई ना-रसाई का आसेब उस रहगुज़र में नहींये कैसा सफ़र है कि रूदाद जिस कीग़ुबार-ए-सफ़र में नहीं
तिरे साए में बचपन की सुहानी यादगारें हैंहमारे अहद-ए-गुम-गश्ता के लम्हों की क़तारें हैं
जब से बे-नूर हुई हैं शमएँख़ाक में ढूँढता फिरता हूँ न जाने किस जाखो गई हैं मिरी दोनों आँखेंतुम जो वाक़िफ़ हो बताओ कोई पहचान मिरीइस तरह है कि हर इक रग में उतर आया हैमौज-दर-मौज किसी ज़हर का क़ातिल दरियातेरा अरमान, तिरी याद लिए जान मिरीजाने किस मौज में ग़लताँ है कहाँ दिल मेराएक पल ठहरो कि उस पार किसी दुनिया सेबर्क़ आए मिरी जानिब यद-ए-बैज़ा ले करऔर मिरी आँखों के गुम-गश्ता गुहरजाम-ए-ज़ुल्मत से सियह-मस्तनई आँखों के शब-ताब गुहरलौटा देएक पल ठहरो कि दरिया का कहीं पाट लगेऔर नया दिल मेराज़हर में धुल के, फ़ना हो केकिसी घाट लगेफिर पए-नज़्र नए दीदा ओ दिल ले के चलूँहुस्न की मदह करूँ शौक़ का मज़मून लिक्खूँ
आसमाँ बादल का पहने ख़िरक़ा-ए-देरीना हैकुछ मुकद्दर सा जबीन-ए-माह का आईना हैचाँदनी फीकी है इस नज़्ज़ारा-ए-ख़ामोश मेंसुब्ह-ए-सादिक़ सो रही है रात की आग़ोश मेंकिस क़दर अश्जार की हैरत-फ़ज़ा है ख़ामुशीबरबत-ए-क़ुदरत की धीमी सी नवा है ख़ामुशीबातिन-ए-हर-ज़र्रा-ए-आलम सरापा दर्द हैऔर ख़ामोशी लब-ए-हस्ती पे आह-ए-सर्द हैआह जौलाँ-गाह-ए-आलम-गीर यानी वो हिसारदोश पर अपने उठाए सैकड़ों सदियों का बारज़िंदगी से था कभी मामूर अब सुनसान हैये ख़मोशी उस के हंगामों का गोरिस्तान हैअपने सुक्कान-ए-कुहन की ख़ाक का दिल-दादा हैकोह के सर पर मिसाल-ए-पासबाँ इस्तादा हैअब्र के रौज़न से वो बाला-ए-बाम-ए-आसमाँनाज़िर-ए-आलम है नज्म-ए-सब्ज़-फ़ाम-ए-आसमाँख़ाक-बाज़ी वुसअत-ए-दुनिया का है मंज़र उसेदास्ताँ नाकामी-ए-इंसाँ की है अज़बर उसेहै अज़ल से ये मुसाफ़िर सू-ए-मंज़िल जा रहाआसमाँ से इंक़िलाबों का तमाशा देखतागो सुकूँ मुमकिन नहीं आलम में अख़्तर के लिएफ़ातिहा-ख़्वानी को ये ठहरा है दम भर के लिएरंग-ओ-आब-ए-ज़िंदगी से गुल-ब-दामन है ज़मींसैकड़ों ख़ूँ-गश्ता तहज़ीबों का मदफ़न है ज़मींख़्वाब-गह शाहों की है ये मंज़िल-ए-हसरत-फ़ज़ादीदा-ए-इबरत ख़िराज-ए-अश्क-ए-गुल-गूँ कर अदाहै तो गोरिस्ताँ मगर ये ख़ाक-ए-गर्दूं-पाया हैआह इक बरगश्ता क़िस्मत क़ौम का सरमाया हैमक़बरों की शान हैरत-आफ़रीं है इस क़दरजुम्बिश-ए-मिज़्गाँ से है चश्म-ए-तमाशा को हज़रकैफ़ियत ऐसी है नाकामी की इस तस्वीर मेंजो उतर सकती नहीं आईना-ए-तहरीर मेंसोते हैं ख़ामोश आबादी के हंगामों से दूरमुज़्तरिब रखती थी जिन को आरज़ू-ए-ना-सुबूरक़ब्र की ज़ुल्मत में है इन आफ़्ताबों की चमकजिन के दरवाज़ों पे रहता है जबीं-गुस्तर फ़लकक्या यही है इन शहंशाहों की अज़्मत का मआलजिन की तदबीर-ए-जहाँबानी से डरता था ज़वालरोब-ए-फ़ग़्फ़ूरी हो दुनिया में कि शान-ए-क़ैसरीटल नहीं सकती ग़नीम-ए-मौत की यूरिश कभीबादशाहों की भी किश्त-ए-उम्र का हासिल है गोरजादा-ए-अज़्मत की गोया आख़िरी मंज़िल है गोरशोरिश-ए-बज़्म-ए-तरब क्या ऊद की तक़रीर क्यादर्दमंदान-ए-जहाँ का नाला-ए-शब-गीर क्याअरसा-ए-पैकार में हंगामा-ए-शमशीर क्याख़ून को गरमाने वाला नारा-ए-तकबीर क्याअब कोई आवाज़ सोतों को जगा सकती नहींसीना-ए-वीराँ में जान-ए-रफ़्ता आ सकती नहींरूह-ए-मुश्त-ए-ख़ाक में ज़हमत-कश-ए-बेदाद हैकूचा गर्द-ए-नय हुआ जिस दम नफ़स फ़रियाद हैज़िंदगी इंसाँ की है मानिंद-ए-मुर्ग़-ए-ख़ुश-नवाशाख़ पर बैठा कोई दम चहचहाया उड़ गयाआह क्या आए रियाज़-ए-दहर में हम क्या गएज़िंदगी की शाख़ से फूटे खिले मुरझा गएमौत हर शाह ओ गदा के ख़्वाब की ताबीर हैइस सितमगर का सितम इंसाफ़ की तस्वीर हैसिलसिला हस्ती का है इक बहर-ए-ना-पैदा-कनारऔर इस दरिया-ए-बे-पायाँ की मौजें हैं मज़ारऐ हवस ख़ूँ रो कि है ये ज़िंदगी बे-ए'तिबारये शरारे का तबस्सुम ये ख़स-ए-आतिश-सवारचाँद जो सूरत-गर-ए-हस्ती का इक एजाज़ हैपहने सीमाबी क़बा महव-ए-ख़िराम-ए-नाज़ हैचर्ख़-ए-बे-अंजुम की दहशतनाक वुसअत में मगरबेकसी इस की कोई देखे ज़रा वक़्त-ए-सहरइक ज़रा सा अब्र का टुकड़ा है जो महताब थाआख़िरी आँसू टपक जाने में हो जिस की फ़नाज़िंदगी अक़्वाम की भी है यूँही बे-ए'तिबाररंग-हा-ए-रफ़्ता की तस्वीर है उन की बहारइस ज़ियाँ-ख़ाने में कोई मिल्लत-ए-गर्दूं-वक़ाररह नहीं सकती अबद तक बार-ए-दोश-ए-रोज़गारइस क़दर क़ौमों की बर्बादी से है ख़ूगर जहाँदेखता बे-ए'तिनाई से है ये मंज़र जहाँएक सूरत पर नहीं रहता किसी शय को क़रारज़ौक़-ए-जिद्दत से है तरकीब-ए-मिज़ाज-ए-रोज़गारहै नगीन-ए-दहर की ज़ीनत हमेशा नाम-ए-नौमादर-ए-गीती रही आबस्तन-ए-अक़्वाम-ए-नौहै हज़ारों क़ाफ़िलों से आश्ना ये रहगुज़रचश्म-ए-कोह-ए-नूर ने देखे हैं कितने ताजवरमिस्र ओ बाबुल मिट गए बाक़ी निशाँ तक भी नहींदफ़्तर-ए-हस्ती में उन की दास्ताँ तक भी नहींआ दबाया मेहर-ए-ईराँ को अजल की शाम नेअज़्मत-ए-यूनान-ओ-रूमा लूट ली अय्याम नेआह मुस्लिम भी ज़माने से यूँही रुख़्सत हुआआसमाँ से अब्र-ए-आज़ारी उठा बरसा गयाहै रग-ए-गुल सुब्ह के अश्कों से मोती की लड़ीकोई सूरज की किरन शबनम में है उलझी हुईसीना-ए-दरिया शुआओं के लिए गहवारा हैकिस क़दर प्यारा लब-ए-जू मेहर का नज़्ज़ारा हैमहव-ए-ज़ीनत है सनोबर जूएबार-ए-आईना हैग़ुंचा-ए-गुल के लिए बाद-ए-बहार-ए-आईना हैनारा-ज़न रहती है कोयल बाग़ के काशाने मेंचश्म-ए-इंसाँ से निहाँ पत्तों के उज़्लत-ख़ाने मेंऔर बुलबुल मुतरिब-ए-रंगीं नवा-ए-गुलसिताँजिस के दम से ज़िंदा है गोया हवा-ए-गुलसिताँइश्क़ के हंगामों की उड़ती हुई तस्वीर हैख़ामा-ए-क़ुदरत की कैसी शोख़ ये तहरीर हैबाग़ में ख़ामोश जलसे गुलसिताँ-ज़ादों के हैंवादी-ए-कोहसार में नारे शबाँ-ज़ादों के हैंज़िंदगी से ये पुराना ख़ाक-दाँ मामूर हैमौत में भी ज़िंदगानी की तड़प मस्तूर हैपत्तियाँ फूलों की गिरती हैं ख़िज़ाँ में इस तरहदस्त-ए-तिफ़्ल-ए-ख़ुफ़्ता से रंगीं खिलौने जिस तरहइस नशात-आबाद में गो ऐश बे-अंदाज़ा हैएक ग़म यानी ग़म-ए-मिल्लत हमेशा ताज़ा हैदिल हमारे याद-ए-अहद-ए-रफ़्ता से ख़ाली नहींअपने शाहों को ये उम्मत भूलने वाली नहींअश्क-बारी के बहाने हैं ये उजड़े बाम ओ दरगिर्या-ए-पैहम से बीना है हमारी चश्म-ए-तरदहर को देते हैं मोती दीदा-ए-गिर्यां के हमआख़िरी बादल हैं इक गुज़रे हुए तूफ़ाँ के हमहैं अभी सद-हा गुहर इस अब्र की आग़ोश मेंबर्क़ अभी बाक़ी है इस के सीना-ए-ख़ामोश मेंवादी-ए-गुल ख़ाक-ए-सहरा को बना सकता है येख़्वाब से उम्मीद-ए-दहक़ाँ को जगा सकता है येहो चुका गो क़ौम की शान-ए-जलाली का ज़ुहूरहै मगर बाक़ी अभी शान-ए-जमाली का ज़ुहूर
जीने से दिल बेज़ार हैहर साँस इक आज़ार हैकितनी हज़ीं है ज़िंदगीअंदोह-गीं है ज़िंदगीवो बज़्म-ए-अहबाब-ए-वतनवो हम-नवायान-ए-सुख़नआते हैं जिस दम याद अबकरते हैं दिल नाशाद अबगुज़री हुई रंगीनियाँखोई हुई दिलचस्पियाँपहरों रुलाती हैं मुझेअक्सर सताती हैं मुझेवो ज़मज़मे वो चहचहेवो रूह-अफ़ज़ा क़हक़हेजब दिल को मौत आई न थीयूँ बे-हिसी छाई न थीकॉलेज की रंगीं वादियाँवो दिल नशीं आबादियाँवो नाज़नीनान-ए-वतनज़ोहरा-जबीनान-ए-वतनजिन में से इक रंगीं क़बाआतश-नफ़स आतिश-नवाकर के मोहब्बत आश्नारंग-ए-अक़ीदत आश्नामेरे दिल-ए-नाकाम कोख़ूँ-गश्ता-ए-आलाम कोदाग़-ए-जुदाई दे गईसारी ख़ुदाई ले गईउन साअतों की याद मेंउन राहतों की याद मेंमग़्मूम सा रहता हूँ मैंग़म की कसक सहता हूँ मैंसुनता हूँ जब अहबाब सेक़िस्से ग़म-ए-अय्याम केबेताब हो जाता हूँ मैंआहों में खो जाता हूँ मैंफिर वो अज़ीज़-ओ-अक़रिबाजो तोड़ कर अहद-ए-वफ़ाअहबाब से मुँह मोड़ करदुनिया से रिश्ता तोड़ करहद्द-ए-उफ़ुक़ से उस तरफ़रंग-ए-शफ़क़ से उस तरफ़इक वादी-ए-ख़ामोश कीइक आलम-ए-बेहोश कीगहराइयों में सौ गएतारीकियों में खो गएउन का तसव्वुर ना-गहाँलेता है दिल में चुटकियाँऔर ख़ूँ रुलाता है मुझेबे-कल बनाता है मुझेवो गाँव की हम-जोलियाँमफ़लूक दहक़ाँ-ज़ादीयाँजो दस्त-ए-फ़र्त-ए-यास सेऔर यूरिश-ए-अफ़्लास सेइस्मत लुटा कर रह गईंख़ुद को गँवा कर रह गईंग़मगीं जवानी बन गईंरुस्वा कहानी बन गईंउन से कभी गलियों में अबहोता हूँ मैं दो-चार जबनज़रें झुका लेता हूँ मैंख़ुद को छुपा लेता हूँ मैंकितनी हज़ीं है ज़िंदगीअंदोह-गीं है ज़िंदगी
अँध्यारी रात के आँगन में ये सुब्ह के क़दमों की आहटये भीगी भीगी सर्द हवा ये हल्की हल्की धुंदलाहटगाड़ी में हूँ तन्हा महव-ए-सफ़र और नींद नहीं है आँखों मेंभूले-बिसरे अरमानों के ख़्वाबों की ज़मीं है आँखों मेंअगले दिन हाथ हिलाते हैं पिछली पीतें याद आती हैंगुम-गश्ता ख़ुशियाँ आँखों में आँसू बन कर लहराती हैंसीने के वीराँ गोशों में इक टीस सी करवट लेती हैनाकाम उमंगें रोती हैं उम्मीद सहारे देती हैवो राहें ज़ेहन में घूमती हैं जिन राहों से आज आया हूँकितनी उम्मीद से पहुँचा था कितनी मायूसी लाया हूँ
मेरे दरवाज़े से अब चाँद को रुख़्सत कर दोसाथ आया है तुम्हारे जो तुम्हारे घर सेअपने माथे से हटा दो ये चमकता हुआ ताजफेंक दो जिस्म से किरनों का सुनहरा ज़ेवरतुम ही तन्हा मिरे ग़म-ख़ाने में आ सकती होएक मुद्दत से तुम्हारे ही लिए रक्खा हैमेरे जलते हुए सीने का दहकता हुआ चाँददिल-ए-ख़ूँ-गश्ता का हँसता हुआ ख़ुश-रंग गुलाब
शहर के शहर का अफ़्साना वो ख़ुश-फ़हम मगर सादा मुसाफ़िरकि जिन्हें इश्क़ की ललकार के रहज़न ने कहा: आओ!दिखलाएँ तुम्हें एक दर-ए-बस्ता के असरार का ख़्वाबशहर के शहर का अफ़्साना वो दिल जिन के बयाबाँ मेंकिसी क़तरा-ए-गुम-गशता के नागाह लरज़ने की सदा ने ये कहा:''आओ दिखलाएँ तुम्हें सुब्ह के होंटों पे तबस्सुम का सराब!''
ऐ शख़्स अगर 'जोश' को तो ढूँढना चाहेवो पिछले पहर हल्क़ा-ए-इरफ़ाँ में मिलेगाऔर सुब्ह को वो नाज़िर-ए-नज़्ज़ारा-ए-क़ुदरततरफ़-ए-चमन-ओ-सहन-ए-बयाबाँ में मिलेगाऔर दिन को वो सर-गश्ता-ए-इसरार-ओ-मआ'नीशहर-ए-हुनर-ओ-कू-ए-अदीबाँ में मिलेगाऔर शाम को वो मर्द-ए-ख़ुदा रिंद-ए-ख़राबातरहमत-कदा-ए-बादा-फ़रोशाँ में मिलेगाऔर रात को वो ख़ल्वती-ए-काकुल-ओ-रुख़सारबज़्म-ए-तरब-ओ-कूचा-ए-ख़ूबाँ में मिलेगाऔर होगा कोई जब्र तो वो बंदा-ए-मजबूरमुर्दे की तरह कल्बा-ए-अहज़ाँ में मिलेगा
चमन में लाई है फूलों की आरज़ू तुझ कोमिला कहाँ से ये एहसास-ए-रंग-ओ-बू तुझ कोतिरी तरह कोई सर-गश्ता-ए-जमाल नहींगुलों में महव है काँटों का कुछ ख़याल नहींख़िज़ाँ का ख़ौफ़ न है बाग़बाँ का डर तुझ कोमआल-ए-कार का भी कुछ ख़तर नहीं तुझ कोख़ुश-ए'तिक़ाद ओ ख़ुश-आहंग ख़ुश-नवा बुलबुलजिगर के दाग़ को पुर-नूर कर दिया किस नेतुझे इस आग से मामूर कर दिया किस नेये दिल ये दर्द ये सौदा कहाँ से लाई हैकहाँ की तू ने ये तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ उड़ाई है
नया दिन रोज़ मुझ को कितना पीछे फेंक देता हैये आज अंदाज़ा होता है कि मैं आहिस्ता आहिस्ताहज़ारों मील की दूरी पे तुम से आ गया और अबदिनों सालों महीनों को इकट्ठा कर के गुम-गश्तादयार-ए-हू में बैठा हूँ न कुछ आगे न कुछ पीछेसिवा कुछ वसवसों के कुछ ख़सारों के कमर-बस्ताकहीं चलने को आगे जिस का वाज़ेह कुछ तसव्वुर ही नहीं कोईहमारे सब मसाइल जिन का हम पर बोझ है इतनाहमारी किश्त-ए-बे-माया हैं इस सहरा में क्या बोयाबगूलों के सिवा कुछ गर्म झोंकों के सिवा हम नेचलो इक तेज़ धारे में कहीं पर डाल दें कश्तीलताफ़त ठंडे पानी की करें महसूस कुछ थोड़ा बिखर जाएँहँसें बे-वजह यूँही ग़ुल मचाएँ बे-सबब दौड़ेंउड़ें उन बादलों के पीछे और मीलों निकल जाएँ
हाँ तुझ को जुस्तुजू है किस बहर-ए-बे-कराँ कीहम पर तो कुछ हक़ीक़त खुलती नहीं जहाँ कीऐ पर्दा-सोज़ इम्काँ ऐ जल्वा-रेज़ इरफ़ाँतो शम-ए-अंजुमन है किस बज़्म-ए-दिल-सिताँ कीक्यूँ जादा-ए-तलब में फिरती कशाँ कशाँ हैतुझ को तलाश है किस गुम-गश्ता कारवाँ कीजाती है तू कहाँ को आती है तू कहाँ सेदिल-बस्तगी है तुझ को किस बहर-ए-बे-निशाँ से
हमें मुअर्रा के ख़्वाब दे दो(कि सब को बख़्शें ब-क़द्र-ए-ज़ौक़-ए-निगह तबस्सुम)हमें मुअर्रा की रूह का इज़्तिराब दे दो(जहाँ गुनाहों के हौसले से मिले तक़द्दुस के दुख का मरहम)कि उस की बे-नूर-ओ-तार आँखेंदरून-ए-आदम की तीरा रातोंको छेदती थींउसी जहाँ में फ़िराक़-ए-जाँ-काह-ए-हर्फ़-ओ-मअ'नीको देखती थींबहिश्त उस के लिए वो मासूम सादा-लौहों की आफ़ियत थाजहाँ वो नंगे बदन पे जाबिर के ताज़ियानों से बच केराह-ए-फ़रार पाएँवो कफ़्श-ए-पा था कि जिस से ग़ुर्बत की रेग-ए-बर्याँसे रोज़-ए-फ़ुर्सत क़रार पाएँकि सुल्ब-ए-आदम की रहम-ए-हव्वा की उज़लतों मेंनिहायत-ए-इंतिज़ार पाएँ!(बहिश्त सिफ़्र-ए-आज़ीम लेकिन हमें वो गुम-गश्ता हिन्दसे हैंबग़ैर जिन के कोई मुसावात क्या बनेगीविसाल-ए-मअ'नी से हर्फ़ की बात क्या बनेगी?)हम इस ज़मीं पर अज़ल से पीराना-सर हैं मानामगर अभी तक हैं दिल तवानाऔर अपनी ज़ूलीदा-कारियों के तुफ़ैल दानाहमें मुअर्रा के ख़्वाब दे दो(बहिश्त में भी नशात यक-रंग हो तो ग़म हैहो एक सा जाम-ए-शहद सब के लिए तो सम है)कि हम अभी तक हैं इस जहाँ में वो हर्फ़-ए-तन्हा(बहिश्त रख लो हमें ख़ुद अपना जवाब दे दो!)जिसे तमन्ना-ए-वस्ल-ए-म'अना
उन्हें मुझ से शिकायत है कि मैं माज़ी में जीती हूँमिरे अशआ'र में आसेब हैं गुज़रे ज़मानों केवो कहते हैं की यादें साए की मानिंद मेरे साथ रहती हैंये सच है इस से कब इंकार है मुझ कोमैं अक्सर जागते दिन में भी आँखें मूँद लेती हूँकोई सूरत कोई आवाज़ कोई ज़ाइक़ा या लम्स जब जादू जगाता हैतो गर्द-आलूद मीना-तूर तस्वीरें अचानक बोलने लगती हैं नाटक-मंच सजता हैकिसी टूटे हुए संदूक़ में रक्खे हुएबोसीदा मख़तूते से कोई दास्ताँ तमसील बन जाती हैजी उठते हैं सब किरदार माज़ी केसिपाही बादशाह ख़िलअ'त नवादिर रक़्स-ओ-मौसीक़ीकिसी के पाँव में पायल धनक आँचलकिसी शमशीर की बिजली घनी बरसात की बदलीकिसी बारा-दरी में राग दीपक काकिसी सेहन-ए-गुलिस्ताँ में कदम के पेड़ पर बैठी हुई चिड़ियाँअचानक जाग जाती हैंकिसी गुमनाम क़स्बे में कोई टूटी हुई मेहराब ख़स्ता-हाल-डेवढ़ी की झलकमादूम कर देती है होटल चाए-ख़ाने बस के अड्डे ढेर कूड़े केकई सदियाँ गुज़र जाती हैं सर सेऔर कोई गुम-गश्ता शहर-ए-रफ़्तगाँ बेदार होता हैइसी मंज़र का हिस्सा बन के मैं तस्वीर हो जाती हूँ खो जाती हूँ माज़ी मेंमें अक्सर आबना-ए-वक़्त पर काग़ज़ की नाव डाल देती हूँतो पानी अपना रस्ता मोड़ देता हैमैं जब चाहूँसलोनी साँवली नट-खट मधुर यादें उठा लाऊँ लड़कपन के घरोंदों सेमैं जब चाहूँ तो काली कोठरी में क़ैदरंजीदा पशेमाँ ज़ख़्म-ख़ूरदा-साअतों बीते दिनों को प्यार से छू करदिलासा दूँ थपक कर लोरियाँ दूँख़ूब रोऊँ ख़ूब रोऊँ शांत हो जाऊँये माज़ी मेरा माज़ी हैफ़क़त मेरे तसर्रुफ़ में हैमेरी मिल्किय्यत है मेरा विर्सा हैन मेरा हाल पर बस हैऔर आने वाला कल भी किस ने देखा है
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