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नज़्म
तारिक़ क़मर
नज़्म
गुम सी हो जाती हैं नज़रें तो ख़याल आता है
इस में पिन्हाँ तिरी आँखों का इशारा तो नहीं
हिमायत अली शाएर
नज़्म
फिर आँखों से इशारा कर के कमरे में छुप जाता है
इसी तरह वो नए नए अंदाज़ दिखाया करता है
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
परे से तकती हर इक नज़र उस नगर की राहों से बे-ख़बर है
हिनाई-अंगुश्त का इशारा लजाई-आँखों की मुस्कुराहट
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
दिल में जब अशआर की होती है बारिश बे-शुमार
नुत्क़ पर बूँदें टपक पड़ती हैं कुछ बे-इख़्तियार
जोश मलीहाबादी
नज़्म
क्यूँ इशारा है उफ़ुक़ पर आज किस की दीद है
अलविदा'अ माह-ए-रमज़ाँ वो हिलाल-ए-ईद है