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नज़्म
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
आनंद नारायण मुल्ला
नज़्म
क्यूँ तबीअ'त को न हो बे-ख़ुदी-ए-शौक़ पे नाज़
हज़रत-ए-अब्र के क़दमों पे है ये फ़र्क़-ए-नियाज़
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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क्यूँ तबीअ'त को न हो बे-ख़ुदी-ए-शौक़ पे नाज़
हज़रत-ए-अब्र के क़दमों पे है ये फ़र्क़-ए-नियाज़