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नज़्म
तुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीम
तुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीम
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इसी के ख़र्रमी-ए-आग़ोश में उस का नशेमन था
इसी शादाब वादी में वो बे-बाकाना रहती थी
अख़्तर शीरानी
नज़्म
है खटका उस के हाथ लगा जो और किसी को दे खटका
और ग़ैब से झटका खाता है जो और किसी के दे झटका
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
जिस की ख़ातिर तिरी ज़िल्लत भी गवारा थी मुझे
आज उसी ''पैकर-ए-इस्मत'' का ख़ता-कार हूँ मैं
क़तील शिफ़ाई
नज़्म
बाज़ ऐसे थे जो सरमाए के ठेकेदार थे
कहते थे मज़दूर को ख़र और ख़ुद ख़र-कार थे