aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "khel"
अगर मैं समझूँके ये जो मोहरे हैंसिर्फ़ लकड़ी के हैं खिलौनेतो जीतना क्या है हारना क्यान ये ज़रूरीन वो अहम हैअगर ख़ुशी है न जीतने कीन हारने का ही कोई ग़म हैतो खेल क्या हैमैं सोचता हूँजो खेलना हैतो अपने दिल में यक़ीन कर लूँये मोहरे सच-मुच के बादशाह ओ वज़ीरसच-मुच के हैं प्यादेऔर इन के आगे हैदुश्मनों की वो फ़ौजरखती है जो कि मुझ को तबाह करने केसारे मंसूबेसब इरादेमगर ऐसा जो मान भी लूँतो सोचता हूँये खेल कब हैये जंग है जिस को जीतना हैये जंग है जिस में सब है जाएज़कोई ये कहता है जैसे मुझ सेये जंग भी हैये खेल भी हैये जंग है पर खिलाड़ियों कीये खेल है जंग की तरह कामैं सोचता हूँजो खेल हैइस में इस तरह का उसूल क्यूँ हैकि कोई मोहरा रहे कि जाएमगर जो है बादशाहउस पर कभी कोई आँच भी न आएवज़ीर ही को है बस इजाज़तकि जिस तरफ़ भी वो चाहे जाए
और दबे दबे लहजे में कहे तुम ने अब तक बड़े दर्द सहेतुम तन्हा तन्हा जलते रहे तुम तन्हा तन्हा चलते रहेसुनो तन्हा चलना खेल नहीं, चलो आओ मिरे हम-राह चलोचलो नए सफ़र पर चलते हैं, चलो मुझे बना के गवाह चलो
ना चंचल खेल जवानी के ना प्यार की अल्हड़ घातें थींबस राह में उन का मिलना था या फ़ोन पे उन की बातें थींइस इश्क़ पे हम भी हँसते थे बे-हासिल सा बे-हासिल थाइक ज़ोर बिफरते सागर में ना कश्ती थी ना साहिल थाजो बात थी इन के जी में थी जो भेद था यकसर अन-जानाइस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना
मुश्तइल हो के अभी उट्ठेंगे वहशी साएये चला जाएगा रह जाएँगे बाक़ी साएरात-भर जिन से तिरा ख़ून-ख़राबा होगाजंग ठहरी है कोई खेल नहीं है ऐ दिलदुश्मन-ए-जाँ हैं सभी सारे के सारे क़ातिलये कड़ी रात भी ये साए भी तन्हाई भीदर्द और जंग में कुछ मेल नहीं है ऐ दिललाओ सुल्गाओ कोई जोश-ए-ग़ज़ब का अँगारतैश की आतिश-ए-जर्रार कहाँ है लाओवो दहकता हुआ गुलज़ार कहाँ है लाओजिस में गर्मी भी है हरकत भी तवानाई भी
इबलीसये अनासिर का पुराना खेल ये दुनिया-ए-दूँसाकिनान-ए-अर्श-ए-आज़म की तमन्नाओं का ख़ूँइस की बर्बादी पे आज आमादा है वो कारसाज़जिस ने इस का नाम रखा था जहान-ए-काफ़-अो-नूँमैं ने दिखलाया फ़रंगी को मुलूकियत का ख़्वाबमैं ने तोड़ा मस्जिद-ओ-दैर-ओ-कलीसा का फ़ुसूँमैं ने नादारों को सिखलाया सबक़ तक़दीर कामैं ने मुनइ'म को दिया सरमाया दारी का जुनूँकौन कर सकता है इस की आतिश-ए-सोज़ाँ को सर्दजिस के हंगामों में हो इबलीस का सोज़-ए-दरूँजिस की शाख़ें हों हमारी आबियारी से बुलंदकौन कर सकता है इस नख़्ल-ए-कुहन को सर-निगूँपहला मुशीरइस में क्या शक है कि मोहकम है ये इबलीसी निज़ामपुख़्ता-तर इस से हुए ख़ू-ए-ग़ुलामी में अवामहै अज़ल से इन ग़रीबों के मुक़द्दर में सुजूदइन की फ़ितरत का तक़ाज़ा है नमाज़-ए-बे-क़यामआरज़ू अव्वल तो पैदा हो नहीं सकती कहींहो कहीं पैदा तो मर जाती है या रहती है ख़ामये हमारी सई-ए-पैहम की करामत है कि आजसूफ़ी-ओ-मुल्ला मुलूकिय्यत के बंदे हैं तमामतब-ए-मशरिक़ के लिए मौज़ूँ यही अफ़यून थीवर्ना क़व्वाली से कुछ कम-तर नहीं इल्म-ए-कलामहै तवाफ़-ओ-हज का हंगामा अगर बाक़ी तो क्याकुंद हो कर रह गई मोमिन की तेग़-ए-बे-नियामकिस की नौ-मीदी पे हुज्जत है ये फ़रमान-ए-जदीदहै जिहाद इस दौर में मर्द-ए-मुसलमाँ पर हरामदूसरा मुशीरख़ैर है सुल्तानी-ए-जम्हूर का ग़ौग़ा कि शरतू जहाँ के ताज़ा फ़ित्नों से नहीं है बा-ख़बरपहला मुशीरहूँ मगर मेरी जहाँ-बीनी बताती है मुझेजो मुलूकियत का इक पर्दा हो क्या इस से ख़तरहम ने ख़ुद शाही को पहनाया है जमहूरी लिबासजब ज़रा आदम हुआ है ख़ुद-शनास-ओ-ख़ुद-निगरकारोबार-ए-शहरयारी की हक़ीक़त और हैये वजूद-ए-मीर-ओ-सुल्ताँ पर नहीं है मुनहसिरमज्लिस-ए-मिल्लत हो या परवेज़ का दरबार होहै वो सुल्ताँ ग़ैर की खेती पे हो जिस की नज़रतू ने क्या देखा नहीं मग़रिब का जमहूरी निज़ामचेहरा रौशन अंदरूँ चंगेज़ से तारीक-तरतीसरा मुशीररूह-ए-सुल्तानी रहे बाक़ी तो फिर क्या इज़्तिराबहै मगर क्या इस यहूदी की शरारत का जवाबवो कलीम-ए-बे-तजल्ली वो मसीह-ए-बे-सलीबनीस्त पैग़मबर व-लेकिन दर बग़ल दारद किताबक्या बताऊँ क्या है काफ़िर की निगाह-ए-पर्दा-सोज़मश्रिक-ओ-मग़रिब की क़ौमों के लिए रोज़-ए-हिसाबइस से बढ़ कर और क्या होगा तबीअ'त का फ़सादतोड़ दी बंदों ने आक़ाओं के ख़ेमों की तनाबचौथा मुशीरतोड़ इस का रुमत-उल-कुबरा के ऐवानों में देखआल-ए-सीज़र को दिखाया हम ने फिर सीज़र का ख़्वाबकौन बहर-ए-रुम की मौजों से है लिपटा हुआगाह बालद-चूँ-सनोबर गाह नालद-चूँ-रुबाबतीसरा मुशीरमैं तो इस की आक़िबत-बीनी का कुछ क़ाइल नहींजिस ने अफ़रंगी सियासत को क्या यूँ बे-हिजाबपाँचवाँ मुशीर इबलीस को मुख़ातब कर केऐ तिरे सोज़-ए-नफ़स से कार-ए-आलम उस्तुवारतू ने जब चाहा किया हर पर्दगी को आश्कारआब-ओ-गिल तेरी हरारत से जहान-ए-सोज़-अो-साज़़अब्लह-ए-जन्नत तिरी तालीम से दाना-ए-कारतुझ से बढ़ कर फ़ितरत-ए-आदम का वो महरम नहींसादा-दिल बंदों में जो मशहूर है पर्वरदिगारकाम था जिन का फ़क़त तक़्दीस-ओ-तस्बीह-ओ-तवाफ़तेरी ग़ैरत से अबद तक सर-निगूँ-ओ-शर्मसारगरचे हैं तेरे मुरीद अफ़रंग के साहिर तमामअब मुझे उन की फ़रासत पर नहीं है ए'तिबारवो यहूदी फ़ित्ना-गर वो रूह-ए-मज़दक का बुरूज़हर क़बा होने को है इस के जुनूँ से तार तारज़ाग़ दश्ती हो रहा है हम-सर-ए-शाहीन-अो-चर्ग़कितनी सुरअ'त से बदलता है मिज़ाज-ए-रोज़गारछा गई आशुफ़्ता हो कर वुसअ'त-ए-अफ़्लाक परजिस को नादानी से हम समझे थे इक मुश्त-ए-ग़ुबारफ़ितना-ए-फ़र्दा की हैबत का ये आलम है कि आजकाँपते हैं कोहसार-ओ-मुर्ग़-ज़ार-ओ-जूएबारमेरे आक़ा वो जहाँ ज़ेर-ओ-ज़बर होने को हैजिस जहाँ का है फ़क़त तेरी सियादत पर मदार
आज की शब तो बहुत कुछ है मगर कल के लिएएक अंदेशा-ए-बेनाम है और कुछ भी नहींदेखना ये है कि कल तुझ से मुलाक़ात के ब'अदरंग-ए-उम्मीद खिलेगा कि बिखर जाएगावक़्त पर्वाज़ करेगा कि ठहर जाएगाजीत हो जाएगी या खेल बिगड़ जाएगाख़्वाब का शहर रहेगा कि उजड़ जाएगा
फ़र्श पर लेट गई है तू कभी रूठ के मुझ सेऔर कभी फ़र्श से मुझ को भी उठाया है मना करताश के पत्तों पे लड़ती है कभी खेल में मुझ सेऔर कभी लड़ती भी ऐसे है कि बस खेल रही हैऔर आग़ोश में नन्हे को
ओ देस से आने वाले बताक्या अब भी वतन में वैसे हीसरमस्त नज़ारे होते हैंक्या अब भी सुहानी रातों कोवो चाँद सितारे होते हैंहम खेल जो खेला करते थेक्या अब वही सारे होते हैंओ देस से आने वाले बता
ख़ुश-गवार मौसम मेंअन-गिनत तमाशाईअपनी अपनी टीमों कोदाद देने आते हैंअपने अपने प्यारों काहौसला बढ़ाते हैंमैं अलग-थलग सब सेबारहवें खिलाड़ी कोहूट करता रहता हूँबारहवाँ खिलाड़ी भीक्या अजब खिलाड़ी हैखेल होता रहता हैशोर मचता रहता हैदाद पड़ती रहती हैऔर वो अलग सब सेइंतिज़ार करता हैएक ऐसी साअ'त काएक ऐसे लम्हे काजिस में सानेहा हो जाएफिर वो खेलने निकलेतालियों के झुरमुट मेंएक जुमला-ए-ख़ुश-कुनएक नारा-ए-तहसीनउस के नाम पर हो जाएसब खिलाड़ियों के साथवो भी मो'तबर हो जाएपर ये कम ही होता हैफिर भी लोग कहते हैंखेल से खिलाड़ी काउम्र-भर का रिश्ता है
तुम रूठ चुके दिल टूट चुका अब याद न आओ रहने दोइस महफ़िल-ए-ग़म में आने की ज़हमत न उठाओ रहने दोये सच कि सुहाने माज़ी के लम्हों को भुलाना खेल नहींये सच कि भड़कते शोलों से दामन को बचाना खेल नहींरिसते हुए दिल के ज़ख़्मों को दुनिया से छुपाना खेल नहींऔराक़-ए-नज़र से जल्वों की तहरीर मिटाना खेल नहींलेकिन ये मोहब्बत के नग़्मे इस वक़्त न गाओ रहने दोजो आग दबी है सीने में होंटों पे न लाओ रहने दोजारी हैं वतन की राहों में हर सम्त लहू के फ़व्वारेदुख-दर्द की चोटें खा खा कर लर्ज़ां हैं दिलों के गहवारेअंगुश्त ब-लब हैं शम्स ओ क़मर हैरान ओ परेशाँ हैं तारेहैं बाद-ए-सहर के झोंके भी तूफ़ान-ए-मुसलसल के धारेअब फ़ुर्सत-ए-नाव-नोश कहाँ अब याद न आओ रहने दोतूफ़ान में रहने वालों को ग़ाफ़िल न बनाओ रहने दोमाना कि मोहब्बत की ख़ातिर हम तुम ने क़सम भी खाई थीये अम्न-ओ-सुकूँ से दूर फ़ज़ा पैग़ाम-ए-सुकूँ भी लाई थीवो दौर भी था जब दुनिया की हर शय पे जवानी छाई थीख़्वाबों की नशीली बद-मस्ती मासूम दिलों पर छाई थीलेकिन वो ज़माना दूर गया अब याद न आओ रहने दोजिस राह पे जाना लाज़िम है उस से न हटाओ रहने दोअब वक़्त नहीं उन नग़्मों का जो ख़्वाबों को बेदार करेंअब वक़्त है ऐसे नारों का जो सोतों को होश्यार करेंदुनिया को ज़रूरत है उन की जो तलवारों को प्यार करेंजो क़ौम ओ वतन के क़दमों पर क़ुर्बानी दें ईसार करेंरूदाद-ए-मोहब्बत फिर कहना अब मान भी जाओ रहने दोजादू न जगाओ रहने दो फ़ित्ने न उठाओ रहने दोमैं ज़हर-ए-हक़ीक़त की तल्ख़ी ख़्वाबों में छुपाऊँगा कब तकग़ुर्बत के दहकते शोलों से दामन को बचाऊँगा कब तकआशोब-ए-जहाँ की देवी से यूँ आँख चुराऊँगा कब तकजिस फ़र्ज़ को पूरा करना है वो फ़र्ज़ भुलाऊँगा कब तकअब ताब नहीं नज़्ज़ारे की जल्वे न दिखाओ रहने दोख़ुर्शीद-ए-मोहब्बत के रुख़ से पर्दे न उठाओ रहने दोमुमकिन है ज़माना रुख़ बदले ये दौर-ए-हलाकत मिट जाएये ज़ुल्म की दुनिया करवट ले ये अहद-ए-ज़लालत मिट जाएदौलत के फ़रेबी बंदों का ये किब्र और नख़वत मिट जाएबर्बाद वतन के महलों से ग़ैरों की हुकूमत मिट जाएउस वक़्त ब-नाम-ए-अहद-ए-वफ़ा मैं ख़ुद भी तुम्हें याद आऊँगामुँह मोड़ के सारी दुनिया से उल्फ़त का सबक़ दुहराऊँगा
देर तक देखती रह जाती हैमेरे इस झोंपड़े में कुछ भी नहींखेल इक सादा मोहब्बत काशब ओ रोज़ के इस बढ़ते हुए खोखले-पन में जो कभी खेलते हैंकभी रो लेते हैं मिल कर कभी गा लेते हैंऔर मिल कर कभी हँस लेते हैंदिल के जीने के बहाने के सिवा और नहींहर्फ़ सरहद हैं जहाँ-ज़ाद मआनी सरहदइश्क़ सरहद है जवानी सरहददिल के जीने के बहाने के सिवा और नहींदर्द-ए-महरूमी कीतन्हाई की सरहद भी कहीं है कि नहीं?
कभी न खींचा शरारत से जिस का आँचल भीरचा सकी मिरी आँखों में जो न काजल भीवो माँ जो मेरे लिए तितलियाँ पकड़ न सकीजो भागते हुए बाज़ू मिरे जकड़ न सकीबढ़ाया प्यार कभी कर के प्यार में न कमीजो मुँह बना के किसी दिन न मुझ से रूठ सकीजो ये भी कह न सकी जा न बोलूँगी तुझ सेजो एक बार ख़फ़ा भी न हो सकी मुझ सेवो जिस को जूठा लगा मुँह कभी दिखा न सकाकसाफ़तों पे मिरी जिस को प्यार आ न सकाजो मिट्टी खाने पे मुझ को कभी न पीट सकीन हाथ थाम के मुझ को कभी घसीट सकीवो माँ जो गुफ़्तुगू की रौ में सुन के मेरी बड़कभी जो प्यार से मुझ को न कह सकी घामड़शरारतों से मिरी जो कभी उलझ न सकीहिमाक़तों का मिरी फ़ल्सफ़ा समझ न सकीवो माँ कभी जिसे चौंकाने को मैं लुक न सकामैं राह छेंकने को जिस के आगे रुक न सकाजो अपने हाथ से बहरूप मेरे भर न सकीजो अपनी आँखों को आईना मेरा कर न सकीगले में डाली न बाहोँ की फूल-माला भीन दिल में लौह-ए-जबीं से किया उजाला भीवो माँ कभी जो मुझे बद्धियाँ पहना न सकीकभी मुझे नए कपड़ों से जो सजा न सकीवो माँ न जिस से लड़कपन के झूट बोल सकान जिस के दिल के दराँ कुंजियों से खोल सकावो माँ मैं पैसे भी जिस के कभी चुरा न सकासज़ा से बचने को झूटी क़सम भी खा न सका
जब मेरा जी चाहे मैं जादू के खेल दिखा सकता हूँआँधी बन कर चल सकता हूँ बादल बन कर छा सकता हूँहाथ के एक इशारे से पानी में आग लगा सकता हूँराख के ढेर से ताज़ा रंगों वाले फूल उगा सकता हूँइतने ऊँचे आसमान के तारे तोड़ के ला सकता हूँ
मैं एक गुरेज़ाँ लम्हा हूँअय्याम के अफ़्सूँ-ख़ाने मेंमैं एक तड़पता क़तरा हूँमसरूफ़-ए-सफ़र जो रहता हैमाज़ी की सुराही के दिल सेमुस्तक़बिल के पैमाने मेंमैं सोता हूँ और जागता हूँऔर जाग के फिर सो जाता हूँसदियों का पुराना खेल हूँ मैंमैं मर के अमर हो जाता हूँ
रणभूमी में लड़ते लड़ते मैं ने कितने सालइक दिन जल में छाया देखी चट्टे हो गए बालपापड़ जैसी हुईं हड्डियाँ जलने लगे हैं दाँतजगह जगह झुर्रियों से भर गई सारे तन की खाल
दयार-ए-हिन्द था गहवारा याद है हमदमबहुत ज़माना हुआ किस के किस के बचपन काइसी ज़मीन पे खेला है 'राम' का बचपनइसी ज़मीन पे उन नन्हे नन्हे हाथों नेकिसी समय में धनुष-बान को सँभाला थाइसी दयार ने देखी है 'कृष्ण' की लीलायहीं घरोंदों में सीता सुलोचना राधाकिसी ज़माने में गुड़ियों से खेलती होंगीयही ज़मीं यही दरिया पहाड़ जंगल बाग़यही हवाएँ यही सुब्ह-ओ-शाम सूरज चाँदयही घटाएँ यही बर्क़-ओ-र'अद ओ क़ौस-ए-क़ुज़हयहीं के गीत रिवायात मौसमों के जुलूसहुआ ज़माना कि 'सिद्धार्थ' के थे गहवारेइन्ही नज़ारों में बचपन कटा था 'विक्रम' कासुना है 'भर्तृहरि' भी इन्हीं से खेला था'भरत' 'अगस्त्य' 'कपिल' 'व्यास' 'पाशी' 'कौटिल्य''जनक' 'वशिष्ठ' 'मनु' 'वाल्मीकि' 'विश्वामित्र''कणाद' 'गौतम' ओ 'रामानुज' 'कुमारिल-भट्ट'मोहनजोडारो हड़प्पा के और अजंता केबनाने वाले यहीं बल्लमों से खेले थेइसी हिंडोले में 'भवभूति' ओ 'कालीदास' कभीहुमक हुमक के जो तुतला के गुनगुनाए थेसरस्वती ने ज़बानों को उन की चूमा थायहीं के चाँद व सूरज खिलौने थे उन केइन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन पला था 'ख़ुसरव' काइसी ज़मीं से उठे 'तानसेन' और 'अकबर''रहीम' 'नानक' ओ 'चैतन्य' और 'चिश्ती' नेइन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन के दिन गुज़ारे थेइसी ज़मीं पे कभी शाहज़ादा-ए-'ख़ुर्रम'ज़रा सी दिल-शिकनी पर जो रो दिया होगाभर आया था दिल-ए-नाज़ुक तो क्या अजब इस मेंइन आँसुओं में झलक ताज की भी देखी हो'अहिल्याबाई' 'दमन' 'पदमिनी' ओ 'रज़िया' नेयहीं के पेड़ों की शाख़ों में डाले थे झूलेइसी फ़ज़ा में बढ़ाई थी पेंग बचपन कीइन्ही नज़ारों में सावन के गीत गाए थेइसी ज़मीन पे घुटनों के बल चले होंगे'मलिक-मोहम्मद' ओ 'रसखान' और 'तुलसी-दास'इन्हीं फ़ज़ाओं में गूँजी थी तोतली बोली'कबीर-दास' 'टुकाराम' 'सूर' ओ 'मीरा' कीइसी हिंडोले में 'विद्यापति' का कंठ खुलाइसी ज़मीन के थे लाल 'मीर' ओ 'ग़ालिब' भीठुमक ठुमक के चले थे घरों के आँगन में'अनीस' ओ 'हाली' ओ 'इक़बाल' और 'वारिस-शाह'यहीं की ख़ाक से उभरे थे 'प्रेमचंद' ओ 'टैगोर'यहीं से उठ्ठे थे तहज़ीब-ए-हिन्द के मेमारइसी ज़मीन ने देखा था बाल-पन इन कायहीं दिखाई थीं इन सब ने बाल-लीलाएँयहीं हर एक के बचपन ने तर्बियत पाईयहीं हर एक के जीवन का बालकांड खुलायहीं से उठते बगूलों के साथ दौड़े हैंयहीं की मस्त घटाओं के साथ झूमे हैंयहीं की मध-भरी बरसात में नहाए हैंलिपट के कीचड़ ओ पानी से बचपने उन केइसी ज़मीन से उठ्ठे वो देश के सावंतउड़ा दिया था जिन्हें कंपनी ने तोपों सेइसी ज़मीन से उठी हैं अन-गिनत नस्लेंपले हैं हिन्द हिंडोले में अन-गिनत बच्चेमुझ ऐसे कितने ही गुमनाम बच्चे खेले हैंइसी ज़मीं से इसी में सुपुर्द-ए-ख़ाक हुएज़मीन-ए-हिन्द अब आराम-गाह है उन कीइस अर्ज़-ए-पाक से उट्ठीं बहुत सी तहज़ीबेंयहीं तुलू हुईं और यहीं ग़ुरूब हुईंइसी ज़मीन से उभरे कई उलूम-ओ-फ़ुनूनफ़राज़-ए-कोह-ए-हिमाला ये दौर-ए-गंग-ओ-जमनऔर इन की गोद में पर्वर्दा कारवानों नेयहीं रुमूज़-ए-ख़िराम-ए-सुकूँ-नुमा सीखेनसीम-ए-सुब्ह-ए-तमद्दुन ने भैरवीं छेड़ीयहीं वतन के तरानों की वो पवें फूटेंवो बे-क़रार सुकूँ-ज़ा तरन्नुम-ए-सहरीवो कपकपाते हुए सोज़-ओ-साज़ के शोलेइन्ही फ़ज़ाओं में अंगड़ाइयाँ जो ले के उठेलवों से जिन के चराग़ाँ हुई थी बज़्म-ए-हयातजिन्हों ने हिन्द की तहज़ीब को ज़माना हुआबहुत से ज़ावियों से आईना दिखाया थाइसी ज़मीं पे ढली है मिरी हयात की शामइसी ज़मीन पे वो सुब्ह मुस्कुराई हैतमाम शोला ओ शबनम मिरी हयात की सुब्हसुनाऊँ आज कहानी मैं अपने बचपन कीदिल-ओ-दिमाग़ की कलियाँ अभी न चटकी थींहमेशा खेलता रहता था भाई बहनों मेंहमारे साथ मोहल्ले की लड़कियाँ लड़केमचाए रखते थे बालक उधम हर एक घड़ीलहू तरंग उछल-फाँद का ये आलम थामोहल्ला सर पे उठाए फिरे जिधर गुज़रेहमारे चहचहे और शोर गूँजते रहतेचहार-सम्त मोहल्ले के गोशे गोशे मेंफ़ज़ा में आज भी ला-रैब गूँजते होंगेअगरचे दूसरे बच्चों की तरह था मैं भीब-ज़ाहिर औरों के बचपन सा था मिरा बचपनये सब सही मिरे बचपन की शख़्सियत भी थी एकवो शख़्सियत कि बहुत शोख़ जिस के थे ख़द-ओ-ख़ालअदा अदा में कोई शान-ए-इन्फ़िरादी थीग़रज़ कुछ और ही लक्षण थे मेरे बचपन केमुझे था छोटे बड़ों से बहुत शदीद लगावहर एक पर मैं छिड़कता था अपनी नन्ही सी जाँदिल उमडा आता था ऐसा कि जी ये चाहता थाउठा के रख लूँ कलेजे में अपनी दुनिया कोमुझे है याद अभी तक कि खेल-कूद में भीकुछ ऐसे वक़्फ़े पुर-असरार आ ही जाते थेकि जिन में सोचने लगता था कुछ मिरा बचपनकई मआनी-ए-बे-लफ़्ज़ छूने लगते थेबुतून-ए-ग़ैब से मेरे शुऊर-ए-असग़र कोहर एक मंज़र-ए-मानूस घर का हर गोशाकिसी तरह की हो घर में सजी हुई हर चीज़मिरे मोहल्ले की गलियाँ मकाँ दर-ओ-दीवारचबूतरे कुएँ कुछ पेड़ झाड़ियाँ बेलेंवो फेरी वाले कई उन के भाँत भाँत के बोलवो जाने बूझे मनाज़िर वो आसमाँ ओ ज़मींबदलते वक़्त का आईना गर्मी-ओ-ख़ुनकीग़ुरूब-ए-महर में रंगों का जागता जादूशफ़क़ के शीश-महल में गुदाज़-ए-पिन्हाँ सेजवाहरों की चटानें सी कुछ पिघलती हुईंशजर हजर की वो कुछ सोचती हुई दुनियासुहानी रात की मानूस रमज़ियत का फ़ुसूँअलस्सबाह उफ़ुक़ की वो थरथराती भवेंकिसी का झाँकना आहिस्ता फूटती पौ सेवो दोपहर का समय दर्जा-ए-तपिश का चढ़ावथकी थकी सी फ़ज़ा में वो ज़िंदगी का उतारहुआ की बंसियाँ बंसवाड़ियों में बजती हुईंवो दिन के बढ़ते हुए साए सह-पहर का सुकूँसुकूत शाम का जब दोनों वक़्त मिलते हैंग़रज़ झलकते हुए सरसरी मनाज़िर परमुझे गुमान परिस्तानियत का होता थाहर एक चीज़ की वो ख़्वाब-नाक अस्लिय्यतमिरे शुऊर की चिलमन से झाँकता था कोईलिए रुबूबियत-ए-काएनात का एहसासहर एक जल्वे में ग़ैब ओ शुहूद का वो मिलापहर इक नज़ारा इक आईना-ख़ाना-ए-हैरतहर एक मंज़र-ए-मानूस एक हैरत-ज़ारकहीं रहूँ कहीं खेलों कहीं पढ़ूँ लिखूँमिरे शुऊर पे मंडलाते थे मनाज़िर-ए-दहरमैं अक्सर उन के तसव्वुर में डूब जाता थावफ़ूर-ए-जज़्बा से हो जाती थी मिज़ा पुर-नममुझे यक़ीन है इन उन्सुरी मनाज़िर सेकि आम बच्चों से लेता था मैं ज़ियादा असरकिसी समय मिरी तिफ़्ली रही न बे-परवान छू सकी मिरी तिफ़्ली को ग़फ़लत-ए-तिफ़्लीये खेल-कूद के लम्हों में होता था एहसासदुआएँ देता हो जैसे मुझे सुकूत-ए-दवामकि जैसे हाथ अबद रख दे दोश-ए-तिफ़्ली परहर एक लम्हा के रख़नों से झाँकती सदियाँकहानियाँ जो सुनूँ उन में डूब जाता थाकि आदमी के लिए आदमी की जग-बीतीसे बढ़ के कौन सी शय और हो ही सकती हैइन्ही फ़सानों में पिन्हाँ थे ज़िंदगी के रुमूज़इन्ही फ़सानों में खुलते थे राज़-हा-ए-हयातउन्हें फ़सानों में मिलती थीं ज़ीस्त की क़द्रेंरुमूज़-ए-बेश-बहा ठेठ आदमियत केकहानियाँ थीं कि सद-दर्स-गाह-ए-रिक़्क़त-ए-क़ल्बहर इक कहानी में शाइस्तगी-ए-ग़म का सबक़वो उंसुर आँसुओं का दास्तान-ए-इंसाँ मेंवो नल-दमन की कथा सरगुज़श्त-ए-सावित्री'शकुन्तला' की कहानी 'भरत' की क़ुर्बानीवो मर्ग-ए-भीष्म-पितामह वो सेज तीरों कीवो पांचों पांडव की स्वर्ग-यात्रा की कथावतन से रुख़्सत-ए-'सिद्धार्थ' 'राम' का बन-बासवफ़ा के ब'अद भी 'सीता' की वो जिला-वतनीवो रातों-रात 'सिरी-कृष्ण' को उठाए हुएबला की क़ैद से 'बसदेव' का निकल जानावो अंधकार वो बारिश, बढ़ी हुई जमुनाग़म-ए-आफ़रीन कहानी वो 'हीर' 'राँझा' कीशुऊर-ए-हिन्द के बचपन की यादगार-ए-अज़ीमकि ऐसे वैसे तख़य्युल की साँस उखड़ जाएकई मुहय्युर-ए-इदराक देव-मालाएँहितोपदेश के क़िस्से कथा सरत-सागरकरोड़ों सीनों में वो गूँजता हुआ आल्हामैं पूछता हूँ किसी और मलक वालों सेकहानियों की ये दौलत ये बे-बहा दौलतफ़साने देख लो इन के नज़र भी आती हैमैं पूछता हूँ कि गहवारे और क़ौमों केबसे हुए हैं कहीं ऐसी दास्तानों सेकहानियाँ जो मैं सुनता था अपने बचपन मेंमिरे लिए वो न थीं महज़ बाइस-ए-तफ़रीहफ़सानों से मिरे बचपन ने सोचना सीखाफ़सानों से मुझे संजीदगी के दर्स मिलेफ़सानों में नज़र आती थी मुझ को ये दुनियाग़म ओ ख़ुशी में रची प्यार में बसाई हुईफ़सानों से मिरे दिल ने घुलावटें पाईंयही नहीं कि मशाहीर ही के अफ़्सानेज़रा सी उम्र में करते हों मुझ को मुतअस्सिरमोहल्ले टोले के गुमनाम आदमिय्यों केकुछ ऐसे सुनने में आते थे वाक़िआत-ए-हयातजों यूँ तो होते थे फ़र्सूदा और मामूलीमगर थे आईने इख़्लास और शराफ़त केये चंद आई गई बातें ऐसी बातें थींकि जिन की ओट चमकता था दर्द-ए-इंसानीये वारदात नहीं रज़्मिय्ये हयात के थेग़रज़ कि ये हैं मिरे बचपने की तस्वीरेंनदीम और भी कुछ ख़त्त-ओ-ख़ाल हैं उन केये मेरी माँ का है कहना कि जब मैं बच्चा थामैं ऐसे आदमी की गोद में न जाता थाजो बद-क़िमार हो एेबी हो या हो बद-सूरतमुझे भी याद है नौ दस बरस ही का मैं थातो मुझ पे करता था जादू सा हुस्न-ए-इंसानीकुछ ऐसा होता था महसूस जब मैं देखता थाशगुफ़्ता रंग तर-ओ-ताज़ा रूप वालों काकि उन की आँच मिरी हड्डियाँ गला देगीइक आज़माइश-ए-जाँ थी कि था शुऊर-ए-जमालऔर उस की नश्तरिय्यत उस की उस्तुखाँ-सोज़ीग़म ओ नशात लगावट मोहब्बत ओ नफ़रतइक इंतिशार-ए-सकूँ इज़्तिराब प्यार इताबवो बे-पनाह ज़की-उल-हिसी वो हिल्म ओ ग़ुरूरकभी कभी वो भरे घर में हिस्स-ए-तंहाईवो वहशतें मिरी माहौल-ए-ख़ुश-गवार में भीमिरी सरिश्त में ज़िद्दैन के कई जोड़ेशुरूअ ही से थे मौजूद आब-ओ-ताब के साथमिरे मिज़ाज में पिन्हाँ थी एक जदलिय्यतरगों में छूटते रहते थे बे-शुमार अनारनदीम ये हैं मिरे बाल-पन के कुछ आसारवफ़ूर ओ शिद्दत-ए-जज़्बात का ये आलम थाकि कौंदे जस्त करें दिल के आबगीने मेंवो बचपना जिसे बर्दाश्त अपनी मुश्किल होवो बचपना जो ख़ुद अपनी ही तेवरियाँ सी चढ़ाएनदीम ज़िक्र-ए-जवानी से काँप जाता हूँजवानी आई दबे पाँव और यूँ आईकि उस के आते ही बिगड़ा बना-बनाया खेलवो ख़्वाहिशात के जज़्बात के उमडते हुएवो होंकते हुए बे-नाम आग के तूफ़ाँवो फूटता हुआ ज्वाला-मुखी जवानी कारगों में उठती हुई आँधियों के वो झटकेकि जो तवाज़ुन-ए-हस्ती झिंझोड़ के रख देंवो ज़लज़ले कि पहाड़ों के पैर उखड़ जाएँबुलूग़ियत की वो टीसें वो कर्ब-ए-नश्व-ओ-नुमाऔर ऐसे में मुझे ब्याहा गया भला किस सेजो हो न सकती थी हरगिज़ मिरी शरीक-ए-हयातहम एक दूसरे के वास्ते बने ही न थेसियाह हो गई दुनिया मिरी निगाहों मेंवो जिस को कहते हैं शादी-ए-ख़ाना-आबादीमिरे लिए वो बनी बेवगी जवानी कीलुटा सुहाग मिरी ज़िंदगी का मांडो मेंनदीम खा गई मुझ को नज़र जवानी कीबला-ए-जान मुझे हो गया शुऊर-ए-जमालतलाश-ए-शोला-ए-उलफ़त से ये हुआ हासिलकि नफ़रतों का अगन-कुंड बन गई हस्तीवो हल्क़ ओ सीना ओ रग रग में बे-पनाह चुभानदीम जैसे निगल ली हो मैं ने नाग-फनीज़ इश्क़-ज़ादम ओ इशक़म कमुश्त ज़ार-ओ-दरेग़ख़बर न बुर्द ब-रुस्तम कसे कि सोहरा-बमन पूछ आलम-ए-काम-ओ-दहन नदीम मिरेसमर हयात का जब राख बिन गया मुँह मेंमैं चलती-फिरती चिता बन गया जवानी कीमैं कांधा देता रहा अपने जीते मुर्दे कोये सोचता था कि अब क्या करूँ कहाँ जाऊँबहुत से और मसाइब भी मुझ पे टूट पड़ेमैं ढूँढने लगा हर सम्त सच्ची झूटी पनाहतलाश-ए-हुस्न में शेर-ओ-अदब में दोस्ती मेंरुँधी सदा से मोहब्बत की भीक माँगी हैनए सिरे से समझना पड़ा है दुनिया कोबड़े जतन से सँभाला है ख़ुद को मैं ने नदीममुझे सँभलने में तो चालीस साल गुज़रे हैंमेरी हयात तो विश-पान की कथा है नदीममैं ज़हर पी के ज़माने को दे सका अमृतन पूछ मैं ने जो ज़हराबा-ए-हयात पियामगर हूँ दिल से मैं इस के लिए सिपास-गुज़ारलरज़ते हाथों से दामन ख़ुलूस का न छटाबचा के रक्खी थी मैं ने अमानत-ए-तिफ़्लीइसे न छीन सकी मुझ से दस्त-बुर्द-ए-शबाबब-क़ौल शाएर-ए-मुल्क-ए-फ़रंग हर बच्चाख़ुद अपने अहद-ए-जवानी का बाप होता हैये कम नहीं है कि तिफ़्ली-ए-रफ़्ता छोड़ गईदिल-ए-हज़ीं में कई छोटे छोटे नक़्श-ए-क़दममिरी अना की रगों में पड़े हुए हैं अभीन जाने कितने बहुत नर्म उँगलियों के निशाँहनूज़ वक़्त के बे-दर्द हाथ कर न सकेहयात-ए-रफ़्ता की ज़िंदा निशानियों को फ़नाज़माना छीन सकेगा न मेरी फ़ितरत सेमिरी सफ़ा मिरे तहतुश-शुऊर की इस्मततख़य्युलात की दोशीज़गी का रद्द-ए-अमलजवान हो के भी बे-लौस तिफ़ल-वश जज़्बातस्याना होने पे भी ये जिबिल्लतें मेरीये सरख़ुशी ओ ग़म बे-रिया ये क़ल्ब-गुदाज़बग़ैर बैर के अन-बन ग़रज़ से पाक तपाकग़रज़ से पाक ये आँसू ग़रज़ से पाक हँसीये दश्त-ए-दहर में हमदर्दियों का सरचश्माक़ुबूलियत का ये जज़्बा ये काएनात ओ हयातइस अर्ज़-ए-पाक पर ईमान ये हम-आहंगीहर आदमी से हर इक ख़्वाब ओ ज़ीस्त से ये लगावये माँ की गोद का एहसास सब मनाज़िर मेंक़रीब ओ दूर ज़मीं में ये बू-ए-वतनिय्यतनिज़ाम-ए-शमस-ओ-क़मर में पयाम-ए-हिफ़्ज़-ए-हयातब-चश्म-ए-शाम-ओ-सहर मामता की शबनम सीये साज़ ओ दिल में मिरे नग़्मा-ए-अनलकौनैनहर इज़्तिराब में रूह-ए-सुकून-ए-बे-पायाँज़माना-ए-गुज़राँ में दवाम का सरगमये बज़्म-ए-जश्न-ए-हयात-ओ-ममात सजती हुईकिसी की याद की शहनाइयाँ सी बजती हुईये रमज़ीत के अनासिर शुऊर-ए-पुख़्ता मेंफ़लक पे वज्द में लाती है जो फ़रिश्तों कोवो शाएरी भी बुलूग़-ए-मिज़ाज-ए-तिफ़्ली हैये नश्तरिय्यत-ए-हस्ती ये इस की शेरियतये पत्ती पत्ती पे गुलज़ार-ए-ज़िंदगी के किसीलतीफ़ नूर की परछाइयाँ सी पड़ती हुईबहम ये हैरत ओ मानूसियत की सरगोशीबशर की ज़ात कि महर-ए-उलूहियत ब-जबींअबद के दिल में जड़ें मारता हुआ सब्ज़ाग़म-ए-जहाँ मुझे आँखें दिखा नहीं सकताकि आँखें देखे हुए हूँ मैं ने अपने बचपन कीमिरे लहू में अभी तक सुनाई देती हैंसुकूत-ए-हुज़्न में भी घुंघरुओं की झंकारेंये और बात कि मैं इस पे कान दे न सकूँइसी वदीअत-ए-तिफ़्ली का अब सहारा हैयही हैं मर्हम-ए-काफ़ूर दिल के ज़ख़्मों परउन्ही को रखना है महफ़ूज़ ता-दम-ए-आख़िरज़मीन-ए-हिन्द है गहवारा आज भी हमदमअगर हिसाब करें दस करोड़ बच्चों काये बच्चे हिन्द की सब से बड़ी अमानत हैंहर एक बच्चे में हैं सद-जहान-ए-इम्कानातमगर वतन का हल-ओ-अक़्द जिन के हाथ में हैनिज़ाम-ए-ज़िंदगी-ए-हिंद जिन के बस में हैरवय्या देख के उन का ये कहना पड़ता हैकिसे पड़ी है कि समझे वो इस अमानत कोकिसे पड़ी है कि बच्चों की ज़िंदगी को बचाएख़राब होने से टलने से सूख जाने सेबचाए कौन इन आज़ुर्दा होनहारों कोवो ज़िंदगी जिसे ये दे रहे हैं भारत कोकरोड़ों बच्चों के मिटने का इक अलमिय्या हैचुराए जाते हैं बच्चे अभी घरों से यहाँकि जिस्म तोड़ दिए जाएँ उन के ताकि मिलेचुराने वालों को ख़ैरात माघ-मेले कीजो इस अज़ाब से बच जाएँ तो गले पड़ जाएँवो लानतें कि हमारे करोड़ों बच्चों कीनदीम ख़ैर से मिट्टी ख़राब हो जाएवो मुफ़्लिसी कि ख़ुशी छीन ले वो बे-बरगीउदासियों से भरी ज़िंदगी की बे-रंगीवो यासियात न जिस को छुए शुआ-ए-उमीदवो आँखें देखती हैं हर तरफ़ जो बे-नूरीवो टुकटुकी कि जो पथरा के रह गई हो नदीमवो बे-दिली की हँसी छीन ले जो होंटों सेवो दुख कि जिस से सितारों की आँख भर आएवो गंदगी वो कसाफ़त मरज़-ज़दा पैकरवो बच्चे छिन गए हों जिन से बचपने उन केहमीं ने घोंट दिया जिस के बचपने का गलाजो खाते-पीते घरों के हैं बच्चे उन को भी क्यासमाज फूलने-फलने के दे सका साधनवो साँस लेते हैं तहज़ीब-कुश फ़ज़ाओं मेंहम उन को देते हैं बे-जान और ग़लत तालीममिलेगा इल्म-ए-जिहालत-नुमा से क्या उन कोनिकल के मदरसों और यूनीवर्सिटिय्यों सेये बद-नसीब न घर के न घाट के होंगेमैं पूछता हूँ ये तालीम है कि मक्कारीकरोड़ों ज़िंदगियों से ये बे-पनाह दग़ानिसाब ऐसा कि मेहनत करें अगर इस परबजाए इल्म जहालत का इकतिसाब करेंये उल्टा दर्स-ए-अदब ये सड़ी हुई तालीमदिमाग़ की हो ग़िज़ा या ग़िज़ा-ए-जिस्मानीहर इक तरह की ग़िज़ा में यहाँ मिलावट हैवो जिस को बच्चों की तालीम कह के देते हैंवो दर्स उल्टी छुरी है गले पे बचपन केज़मीन-ए-हिन्द हिण्डोला नहीं है बच्चों काकरोड़ों बच्चों का ये देस अब जनाज़ा हैहम इंक़लाब के ख़तरों से ख़ूब वाक़िफ़ हैंकुछ और रोज़ यही रह गए जो लैल-ओ-नहारतो मोल लेना पड़ेगा हमें ये ख़तरा भीकि बच्चे क़ौम की सब से बड़ी अमानत हैं
हर लड़की केतकिए के नीचेतेज़ ब्लेडगोंद की शीशीऔर कुछ तस्वीरें होती हैंसोने से पहलेवो कई तस्वीरों की तराश-ख़राश सेएक तस्वीर बनाती हैकिसी की आँखें किसी के चेहरे पर लगाती हैकिसी के जिस्म पर किसी का चेहरा सजाती हैऔर जब इस खेल से ऊब जाती हैतो किसी भी गोश्त-पोस्त के आदमी के साथलिपट कर सो जाती है
क्या बच्चे सुलझे होते हैंजब गेंद से उलझे होते हैंवो इस लिए मुझ को भाते हैंदिन बीते याद दिलाते हैंवो कितने हसीन बसेरे थेजब दूर ग़मों से डेरे थेजो खेल में हाइल होता थानफ़रीन के क़ाबिल होता थाहर इक से उलझ कर रह जानारुक रुक के बहुत कुछ कह जानाहँस देना बातों बातों परबरसात की काली रातों परबादल की सुबुक-रफ़्तारी परबुलबुल की आह-ओ-ज़ारी परऔर शम्अ की लौ की गर्मी परपरवानों की हट-धर्मी परदुनिया के धंदे क्या जानेंआज़ाद ये फंदे क्या जानेंमासूम फ़ज़ा में रहते थेहम तो ये समझ ही बैठे थेख़ुशियों का अलम अंजाम नहींदुनिया में ख़िज़ाँ का नाम नहींमाहौल ने खाया फिर पल्टानागाह तग़य्युर आ झपटाऔर उस की करम-फ़रमाई सेहालात की इक अंगड़ाई सेआ पहुँचे ऐसे बेड़ों मेंजो ले गए हमें थपेड़ों मेंबचपन के सुहाने साए थेसाए में ज़रा सुसताए थेवो दौर-ए-मुक़द्दस बीत गयाये वक़्त ही बाज़ी जीत गयाअब वैसे मिरे हालात नहींवो चीज़ नहीं वो बात नहींजीने का सफ़र अब दूभर हैहर गाम पे सौ सौ ठोकर हैवो दिल जो रूह-ए-क़रीना थाआशाओं का एक ख़ज़ीना थाइस दिल में निहाँ अब नाले हैंतारों से ज़ियादा छाले हैंजो हँसना हँसाना होता हैरोने को छुपाना होता हैकोई ग़ुंचा दिल में खिलता हैथोड़ा सा सुकूँ जब मिलता हैग़म तेज़ क़दम फिर भरता हैख़ुशियों का तआक़ुब करता हैमैं सोचता रहता हूँ यूँहीआख़िर ये तफ़ावुत क्या मअनीये सोच अजब तड़पाती हैआँखों में नमी भर जाती हैफिर मुझ से दिल ये कहता हैमाज़ी को तू रोता रहता हैकुछ आहें दबी सी रहने देकुछ आँसू बाक़ी रहने देये हाल भी माज़ी होना हैइस पर भी तुझे कुछ रोना है
इक लड़की थी छोटी सीदुबली सी और मोटी सीनन्ही सी और मुन्नी सीबिल्कुल ही थन मथनी सीउस के बाल थे काले सेसीधे घुँघराले सेमुँह पर उस के लाली सीचट्टी सी मटियाली सीउस की नाक पकोड़ी सीनोकीली सी चौड़ी सीआँखें काली नीली सीसुर्ख़ सफ़ेद और पीली सीकपड़े उस के थैले सेउजले से और मैले सेये लड़की थी भोली सीबी बी सी और गोली सीहर दम खेल था काम उस काशादाँ बी-बी नाम था उस काहँसती थी और रोती थीजागती थी और सोती थीहर दम उस की अम्माँ-जानखींचा करती उस के कानकहती थीं मकतब को जाखेलों में मत वक़्त गँवाअम्मी सब कुछ कहती थीशादाँ खेलती रहती थीइक दिन शादाँ खेल में थीआए उस के अब्बा जीवो लाहौर से आए थेचीज़ें वीज़ें लाए थेबॉक्स में थीं ये चीज़ें सबख़ैर तमाशा देखो अबअब्बा ने आते ही कहाशादाँ आ कुछ पढ़ के सुनागुम थी इक मुद्दत से किताबक्या देती इस वक़्त जवाबदो बहनें थीं शादाँ कीछोटी नन्ही मुन्नी सीनाम था मंझली का सीमाँगुड़िया सी नन्ही नादाँवो बोली ऐ अब्बा जीअब तो पढ़ती हूँ मैं भीबिल्ली है सी ए टी कैटचूहा है आर ए टी रैटमुँह माउथ है नाक है नोज़और गुलाब का फूल है रोज़मैं ने अब्बा जी देखाख़ूब सबक़ है याद कियाशादाँ ने उस वक़्त कहामैं ने ही तो सिखाया थालेकिन अब्बा ने चुप चापखोला बॉक्स को उठ कर आपइस में जो चीज़ें निकलेंसारी सीमाँ को दे देंइक चीनी की गुड़िया थीइक जादू की पुड़िया थीइक नन्ही सी थी मोटरआप ही चलती थी फ़र-फ़रगेंदों का इक जोड़ा थाइक लकड़ी का घोड़ा थाइक सीटी थी इक बाजाएक था मिट्टी का राजाशादाँ को कुछ भी न मिलायानी खेल की पाई सज़ाअब वो ग़ौर से पढ़ती हैपूरे तौर से पढ़ती है
शहर-ए-तमन्ना के मरकज़ में लगा हुआ है मेला साखेल-खिलौनों का हर-सू है इक रंगीं गुलज़ार खिलावो इक बालक जिस को घर से इक दिरहम भी नहीं मिलामेले की सज-धज में खो कर बाप की उँगली छोड़ गयाहोश आया तो ख़ुद को तन्हा पा के बहुत हैरान हुआभीड़ में राह मिली नहीं घर की इस आबाद ख़राबे मेंदेखो हम ने कैसे बसर की इस आबाद ख़राबे में
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