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नज़्म
जिस वक़्त महार उठाई थी मेरा ऊँट भी प्यासा था
मश्कीज़े में ख़ून भरा था आँख में सहरा फैला था
अली अकबर नातिक़
नज़्म
एक इक सम्त से शब-ख़ून की तय्यारी है
लुत्फ़ का वअ'दा है और मश्क़-ए-जफ़ा-कारी है
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
चश्मक-ए-दम-ब-दम नहीं मश्क़-ए-ख़िराम-ओ-रम नहीं
मेरे ग़ज़ाल क्या हुए मेरे ख़ुतन को क्या हुआ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
सर-चश्मा-ए-अख़लाक़ वफ़ा-केश-ओ-वफ़ा-कोश
ऐ मशरिक़-ए-इशराक़-ए-सफ़ा अब्र-ए-ख़ता-पोश
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
नज़्म
रात आती थी सुनाने सोज़ का पैग़ाम जब
मश्क़-ए-तहरीर-ए-जुनूँ बनता था तेरा नाम जब
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
बह के मशकीज़ा-ए-अब्र से कितनी बूँदें ज़मीं की ग़िज़ा बन गईं
ग़ैर-मुमकिन था उन का शुमार
शकेब जलाली
नज़्म
रोज़ चौराहों पे करती है पुलिस मश्क़-ए-कलाम
जादा-पैमाओं का जारी है वही तर्ज़-ए-ख़िराम
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
सुना है रास्ते ही में पुलिस ने धर लिया उन को
हमारे दिल पे जब करने को वो मश्क़-ए-सितम निकले