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नज़्म
मैं ने जो ग़ैब की सरकार से माँगा वो मिला
जो अक़ीदा था मिरे दिल का हिलाए न हिला
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
काश मैं ऐसी कहानी को सुना भी सकता
तअ'ना-ज़न हैं जो मिरे हाल पे अरबाब-ए-नशात
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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मैं ने जो ग़ैब की सरकार से माँगा वो मिला
जो अक़ीदा था मिरे दिल का हिलाए न हिला
काश मैं ऐसी कहानी को सुना भी सकता
तअ'ना-ज़न हैं जो मिरे हाल पे अरबाब-ए-नशात