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नज़्म
यही वो मंज़िल-ए-मक़्सूद है कि जिस के लिए
बड़े ही अज़्म से अपने सफ़र पे निकले थे
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
ऐ शहीद-ए-जलवा-ए-मानी फ़क़ीर-ए-बे-नियाज़
इस तरह किस ने कही है दास्तान-ए-सोज़-अो-साज़
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
नज़्म
शहीद-ए-जौर-ए-गुलचीं हैं असीर-ए-ख़स्ता-तन हम हैं
हमारा जुर्म इतना है हवा-ख़्वाह-ए-चमन हम हैं
आनंद नारायण मुल्ला
नज़्म
शाहिद-ए-मा'नी-ए-असरार-ए-ज़ुहूर-ए-क़ुदरत
सब पे रौशन था कि वो ख़ास था नूर-ए-क़ुदरत
बिस्मिल इलाहाबादी
नज़्म
कोई झोंका अगर शम्अ-ए-शहीद-ए-कर्बला को छू नहीं सकता
तो ऐ तारीक दुनिया तो ऐ मायूस इंसाँ
ज़किया सुल्ताना नय्यर
नज़्म
चमन में चल कि दिखाऊँ बहार-ए-शाहिद-ए-गुल
नज़र फ़रेब हैं नक़्श-ओ-निगार-ए-शाहिद-गुल