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नज़्म
वक़्त-ए-रुख़्सत उन्हें इतना भी न आए कह कर
गोद में आँसू कभी टपके जो रुख़ से बह कर
राम प्रसाद बिस्मिल
नज़्म
बंजर धरती की नस नस में पौदों का तख़य्युल लहराया
उजड़े खेतों पर साया है गेहूँ के सुनहरी ख़ोशों का