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नज़्म
इन को अपनाने की ख़्वाहिश उन्हें पाने की तलब
शौक़-ए-बेकार सही सई-ए-ग़म-ए-अंजाम नहीं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
वो एक तड़प वो एक लगन कुछ खोने की कुछ पाने की
वो एक तलब दो रूहों के इक क़ालिब में ढल जाने की
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
कि जैसे लम्स में दुनिया की सब ख़ुशियाँ मुक़य्यद हों
मुझे पाने की ख़ातिर वो बहुत बेताब रहती है
सुलैमान जाज़िब
नज़्म
इल्म-ओ-फ़न की चंद बातें जो मुझे मालूम हैं
दाद पाने के लिए हर बार दोहराता हूँ मैं