aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "putle"
जहाँ-ज़ाद नीचे गली में तिरे दर के आगेये मैं सोख़्ता-सर हसन-कूज़ा-गर हूँ!तुझे सुब्ह बाज़ार में बूढ़े अत्तार यूसुफ़की दुक्कान पर मैं ने देखातो तेरी निगाहों में वो ताबनाकीथी मैं जिस की हसरत में नौ साल दीवाना फिरता रहा हूँजहां-ज़ाद नौ साल दीवाना फिरता रहा हूँ!ये वो दौर था जिस में मैं नेकभी अपने रंजूर कूज़ों की जानिबपलट कर न देखावो कूज़े मेरे दस्त-ए-चाबुक के पुतलेगिल-ओ-रंग-ओ-रोग़न की मख़्लूक़-ए-बे-जाँवो सर-गोशियों में ये कहतेहसन कूज़ा-गर अब कहाँ है?वो हम से ख़ुद अपने अमल सेख़ुदा-वंद बन कर ख़ुदाओं के मानिंद है रू-ए-गरदाँ!जहाँ-ज़ाद नौ साल का दौर यूँ मुझ पे गुज़राकि जैसे किसी शहर-ए-मदफ़ून पर वक़्त गुज़रेतग़ारों में मिट्टीकभी जिस की ख़ुश्बू से वारफ़्ता होता था मैंसंग-बस्ता पड़ी थीसुराही-ओ-मीना-ओ-जाम-ओ-सुबू और फ़ानूस ओ गुल-दाँमिरी हेच-माया मईशत के इज़हार-ए-फ़न के सहारेशिकस्ता पड़े थेमैं ख़ुद मैं हसन कूज़ा-गर पा-ब-गिल ख़ाक-बर-सर बरहनासर-ए-चाक ज़ोलीदा-मू सर-ब-ज़ानूकिसी ग़म-ज़दा देवता की तरह वाहिमा केगिल-ओ-ला से ख़्वाबों के सय्याल कूज़े बनाता रहा थाजहाँ-ज़ाद नौ साल पहलेतू नादाँ थी लेकिन तुझे ये ख़बर थीकि मैं ने हसन कूज़ा-गर नेतिरी क़ाफ़ की सी उफ़ुक़-ताब आँखोंमें देखी है वो ताबनाकीकि जिस से मेरे जिस्म ओ जाँ अब्र ओ महताब कारह-गुज़र बन गए थेजहाँ-ज़ाद बग़दाद की ख़्वाब-गूँ रातवो रूद-ए-दजला का साहिलवो कश्ती वो मल्लाह की बंद आँखेंकिसी ख़स्ता-जाँ रंज-बर कूज़ा-गर के लिएएक ही रात वो कुहरबा थीकि जिस से अभी तक है पैवस्त उस का वजूदउस की जाँ उस का पैकरमगर एक ही रात का ज़ौक़ दरिया की वो लहर निकलाहसन कूज़ा-गर जिस में डूबा तो उभरा नहीं है!
अक़ाएद पर क़यामत आएगी तरमीम-ए-मिल्लत सेनया काबा बनेगा मग़रिबी पुतले सनम होंगे
(3)नए ज़माने में अगर उदास ख़ुद को पाऊँगाये शाम याद कर के अपने ग़म को भूल जाऊँगाअयादत-ए-हबीब से वो आज ज़िंदगी मिलीख़ुशी भी चौंक चौक उठी ग़म की आँख खुल गईअगरचे डॉक्टर ने मुझ को मौत से बचा लियापर इस के ब'अद उस निगाह ने मुझे जिला लियानिगाह-ए-यार तुझ से अपनी मंज़िलें मैं पाऊँगातुझे जो भूल जाऊँगा तो राह भूल जाऊँगा(4)क़रीब-तर मैं हो चला हूँ दुख की काएनात सेमैं अजनबी नहीं रहा हयात से ममात सेवो दुख सहे कि मुझ पे खुल गया है दर्द-ए-काएनातहै अपने आँसुओं से मुझ पे आईना ग़म-ए-हयातये बे-क़ुसूर जान-दार दर्द झेलते हुएये ख़ाक-ओ-ख़ूँ के पुतले अपनी जाँ पे खेलते हुएवो ज़ीस्त की कराह जिस से बे-क़रार है फ़ज़ावो ज़िंदगी की आह जिस से काँप उठती है फ़ज़ाकफ़न है आँसुओं का दुख की मारी काएनात परहयात क्या इन्हें हक़ीक़तों से होना बे-ख़बरजो आँख जागती रही है आदमी की मौत परवो अब्र-ए-रंग-रंग को भी देखती है सादा-तरसिखा गया दुख मिरा पुरानी पीर जाननानिगाह-ए-यार थी जहाँ भी आज मेरी रहनुमायही नहीं कि मुझ को आज ज़िंदगी नई मिलीहक़ीक़त-ए-हयात मुझ पे सौ तरह से खुल गईगवाह है ये शाम और निगाह-ए-यार है गवाहख़याल-ए-मौत को मैं अपने दिल में अब न दूँगा राहजियूँगा हाँ जियूँगा ऐ निगाह-ए-आश्ना-ए-यारसदा सुहाग ज़िंदगी है और जहाँ सदा-बहार(5)अभी तो कितने ना-शुनीदा नग़्मा-ए-हयात हैंअभी निहाँ दिलों से कितने राज़-ए-काएनात हैंअभी तो ज़िंदगी के ना-चाशीदा रस हैं सैकड़ोंअभी तो हाथ में हम अहल-ए-ग़म के जस हैं सैकड़ोंअभी वो ले रही हैं मेरी शाएरी में करवटेंअभी चमकने वाली है छुपी हुई हक़ीक़तेंअभी तो बहर-ओ-बर पे सो रही हैं मेरी वो सदाएँसमेट लूँ उन्हें तो फिर वो काएनात को जगाएँअभी तो रूह बन के ज़र्रे ज़र्रे में समाऊँगाअभी तो सुब्ह बन के मैं उफ़ुक़ पे थरथराऊँगाअभी तो मेरी शाएरी हक़ीक़तें लुटाएगीअभी मिरी सदा-ए-दर्द इक जहाँ पे छाएगीअभी तो आदमी असीर-ए-दाम है ग़ुलाम हैअभी तो ज़िंदगी सद-इंक़लाब का पयाम हैअभी तमाम ज़ख़्म ओ दाग़ है तमद्दुन-ए-जहाँअभी रुख़-ए-बशर पे हैं बहमियत की झाइयाँअभी मशिय्यतों पे फ़त्ह पा नहीं सका बशरअभी मुक़द्दरों को बस में ला नहीं सका बशरअभी तो इस दुखी जहाँ में मौत ही का दौर हैअभी तो जिस को ज़िंदगी कहें वो चीज़ और हैअभी तो ख़ून थोकती है ज़िंदगी बहार मेंअभी तो रोने की सदा है नग़मा-ए-सितार मेंअभी तो उड़ती हैं रुख़-ए-बहार पर हवाईयाँअभी तो दीदनी हैं हर चमन की बे-फ़ज़ाईयाँअभी फ़ज़ा-ए-दहर लेगी करवटों पे करवटेंअभी तो सोती हैं हवाओं की वो संसनाहटेंकि जिस को सुनते ही हुकूमतों के रंग-ए-रुख़ उड़ेंचपेटें जिन की सरकशों की गर्दनें मरोड़ देंअभी तो सीना-ए-बशर में सोते हैं वो ज़लज़लेकि जिन के जागते ही मौत का भी दिल दहल उठेअभी तो बत्न-ए-ग़ैब में है इस सवाल का जवाबख़ुदा-ए-ख़ैर-ओ-शर भी ला नहीं सका था जिस की ताबअभी तो गोद में हैं देवताओं की वो माह-ओ-सालजो देंगे बढ़ के बर्क़-ए-तूर से हयात को जलालअभी रग-ए-जहाँ में ज़िंदगी मचलने वाली हैअभी हयात की नई शराब ढलने वाली हैअभी छुरी सितम की डूब कर उछलने वाली हैअभी तो हसरत इक जहान की निकलने वाली हैअभी घन-गरज सुनाई देगी इंक़लाब कीअभी तो गोश-बर-सदा है बज़्म आफ़्ताब कीअभी तो पूंजी-वाद को जहान से मिटाना हैअभी तो सामराजों को सज़ा-ए-मौत पाना हैअभी तो दाँत पीसती है मौत शहरयारों कीअभी तो ख़ूँ उतर रहा है आँखों में सितारों कीअभी तो इश्तिराकियत के झंडे गड़ने वाले हैंअभी तो जड़ से किश्त-ओ-ख़ूँ के नज़्म उखड़ने वाले हैंअभी किसान-ओ-कामगार राज होने वाला हैअभी बहुत जहाँ में काम-काज होने वाला हैमगर अभी तो ज़िंदगी मुसीबतों का नाम हैअभी तो नींद मौत की मिरे लिए हराम हैये सब पयाम इक निगाह में वो आँख दे गईब-यक-नज़र कहाँ कहाँ मुझे वो आँख ले गई
सो अब हमजो सदियों की लम्बी मसाफ़त से लौटे हैंतो अपने रंजूर कूज़ों में झोझा हुआ हैये तेरा क़ुसूर और न मेरी ख़ता हैकोई कूज़ा-गर तो हमारा भी होगासो ये उस की हिकमतकि उस ने हमें चाक पर ढालते वक़्तलम्हों का फेर इस नज़ाकत से रखाकि हम अपनी अपनी जगह सिर्फ़ शश्दर खड़े थेकई दस्त-ए-चाबुक के बे-जान पुतलेमरे और तिरे दरमियाँ सज गए थेसो ये उस की हिकमतमगर वक़्त इस दर्जा सफ़्फ़ाक क्यों हैये मश्शाता-ए-ज़िंदगी इतनी चालाक क्यों हैमरे और तिरे दरमियाँ नौ बरस जिस ने ला कर बिछाएये नौ साल किस तौर मैं ने बिताएकि साहिल से कश्ती तक आते हुएजैसे तख़्ते के हमराह दिल डगमगाएवही नौ बरस जो मिरे और तिरे दरमियाँवक़्त की किर्चियाँ हैंज़माना भी कैसी अजब कहकशाँ हैये दुनियाए सय्यारगाँ है कि जिस में हज़ारों कवाकिबमुसलसल किसी चाक पर घूमते हैंये अज्साम के गिर्द अज्साम का रक़्स ही ज़िंदगी है मिरी जाँमिरी जान तू चाक के साथ मिट्टी के रिश्ते को पहचानता थाहसन तू ने मिटी के बे-जान पुतलों सेतख़्लीक़ के जाँ-गुसिल मरहलों मेंसदा गुफ़्तुगू सौ तरह गुफ़्तुगू कीज़हानत के पुतले मोहब्बत के ख़ालिक़ फ़क़त ये बता देकि तेरे अनासिर के अजज़ाए-तरकीब में वाहिमा कैसे आयाहसन तू वहाँ झोंपड़े मेंअकेला गले मिल के रोया था किस सेलबीब और तू और मैं और हक़ीक़त में कोई नहीं थातरह वाहिमा मेरे लब मेरे गेसू से लिपटा रहा थालबीब एक साया जिसे तू ने रोग अपनी जाँ का बनायाये साया कहीं गर हक़ीक़त भी होतातो आख़िर को तू इस हक़ीक़त से क्यों बे-ख़बर थाकि हर जिस्म के साथ इक आफ़्ताब और महताब लाज़िमये तसलीस क़ाएम है क़ाएम रहेगी
दीवाली के दीप जले हैंयार से मिलने यार चले हैंचारों जानिब धूम-धड़ाकाछोटे रॉकेट और पटाख़ाघर में फुल-झड़ियाँ छूटेमन ही मन में लड्डू फूटेदीप जले हैं घर आँगन मेंउजयारा हो जाए मन मेंअपनों की तो बात अलग हैआज तो सारे ग़ैर भले हैंदीवाली के दीप जले हैंराम की जय-जय-कार हुई हैरावन की जो हार हुई हैसच्चे का हर बोल है बालाझूटे का मुँह होगा कालासच्चाई का डंका बाजेसच के सर पर सहरा साजेझूट की लंका ख़ाक बना केराम अयोध्या लौट चले हैंदीवाली के दीप जले हैंहिन्दू मुस्लिम सिख ईसाईमिल कर खाएँ यार मिठाईभूल के शिकवे और गिले सबहँसते गाते आज मिले सबकहने को हर धर्म जुदा हैलेकिन सब का एक ख़ुदा हैइक माटी के पुतले 'हैदर'इस साँचे में ख़ूब ढले हैंदीवाली के दीप जले हैं
ऐ हसन-कूज़ा-गरतू ने जाना कि मैंजिस्म-ओ-जाँ के त'अल्लुक़ की रौशन गुज़रगाह सेइक जहाँ का सफ़र झेल करइस रिफ़ाक़त की दहलीज़ तक आई हूँऐ हसन काश तू जान सकताकि इस सहन-ए-ख़ाना से दहलीज़ तक के सफ़र मेंजहाँ-ज़ाद को क्यों ज़माने लगे हैंहसनइस सफ़र में जहाँ-ज़ाद को एक इक गाम परवक़्त के ताज़ियाने लगे हैंहसनवक़्त मालिक भी है देवता भीमुहाफ़िज़ भी है और ख़्वाजा-सरा भीये देखा है मैं नेकि जब भी दरीचों में ताज़ा शगूफ़ा खिला हैहवा से वो हँस कर ज़रा सा गले भी मिला हैतो ख़्वाजा-सरा की नज़र से कहाँ बच सका हैमगर देख मुझ कोकि मैं ने यहाँ ठीक नौ साल तकफूल काढ़े हैं ख़्वाबों के बिस्तर पे लेकिनअभी तक कोई इन पे सोया नहींफूल ताज़ा शगुफ़्ता और आज़ुर्दा हैंमैं ने नौ साल सूरत-गरी की है तेरे हर इक लम्स कीरात भर मैं ने आँखें भिगोई हैं कूज़ों में और सुब्ह-दमहल्क़ को तर किया आँसुओं से बहुतये मसाफ़तये नौ साल की बे-महाबा मसाफ़ततिरे दर के आगे मुझे खींच लाईमगर तू यहाँ चाक पर अपनी धुन में मगन हैनिगाहें उठादेख तो मैं जहाँ-ज़ाद तेरी तिरे सामने हूँमगर तू ने सच ही कहा थाज़माना जहाँ-ज़ाद वो चाक हैजिस पे मीना-ओ-जाम-ओ-सुबू और फ़ानूस-ओ-गुलदां की मानिंदबनते बिगड़ते हैं इंसाँसो अब हम जो सदियों की लम्बी मसाफ़त से लौटे हैंतू अपने रंजूर कूज़ों में जूझा हुआ हैये तेरा क़ुसूर और न मेरी ख़ता हैकोई कूज़ा-गर तो हमारा भी होगासो ये उस की हिकमतकि उस ने हमें चाक पर ढालते वक़्तलम्हों का फेर इस नज़ाकत से रक्खाकि हम अपनी अपनी जगह सिर्फ़ शश्दर खड़े थेकई दस्त-ए-चाबुक के बे-जान पुतलेमिरे और तिरे दरमियाँ सज गए थेसो ये उस की हिकमतमगर वक़्त इस दर्जा सफ़्फ़ाक क्यों हैये मश्शाता-ए-ज़िंदगी इतनी चालाक क्यों हैमिरे और तिरे दरमियाँ नौ बरस जिस ने ला कर बिछाएये नौ साल किस तरह मैं ने बिताएकि साहिल से कश्ती तक आते हुएजैसे तख़्ते के हमराह दिल डगमगाएवही नौ बरसजो मिरे और तिरे दरमियाँ वक़्त की किर्चियाँ हैंज़माना भी कैसी 'अजब कहकशाँ हैये दुनिया-ए-सय्यारगाँ है कि जिस मेंहज़ारों कवाकिबमुसलसल किसी चाक पर घूमते हैंये अज्साम के गिर्द अज्साम का रक़्स ही ज़िंदगी है मिरी जाँमिरी जान तू चाक के साथ मिट्टी के रिश्ते को पहचानता थाहसन तू ने मिट्टी के बे-जान पुतलों सेतख़्लीक़ के जाँ-गुसिल मरहलों मेंसदा गुफ़्तुगूसौ तरह गुफ़्तुगू कीज़िहानत के पुतले मोहब्बत के ख़ालिक़फ़क़त ये बता देकि तेरे 'अनासिर के अज्ज़ा-ए-तर्कीबी मेंवाहिमा कैसे आयाहसन तू वहाँ झोंपड़े मेंअकेला गले मिल के रोया था किस सेलबीब और तू और मैंऔर हक़ीक़त में कोई नहीं थातिरा वाहिमामेरे लब मेरे गेसू से लिपटा रहा थालबीब एक सायाजिसे तू ने रोग अपनी जाँ का बनायाये साया कहीं गर हक़ीक़त भी होतातो आख़िर को तू इस हक़ीक़त से क्यों बे-ख़बर थाकि हर जिस्म के साथ इक आफ़्ताब और महताब लाज़िमये तसलीस क़ाएम है क़ाएम रहेगीहसन मैं तिरे सामने आइना थीतिरे हिज्र और वस्ल का आइनाइंहिमाक-ओ-त'अल्लुक़ की मिट्टी से गूँधे हुए जिस्म कोतेरी आँखों की हिद्दत ने चमकाया थातेरी ख़ल्वत की हैरत ने वो रंग-ओ-रोग़न किए थेकि आईने शश्दर खड़े रह गए थेमगर तेरी ख़ल्वत की हैरत में वहशत का जो शाइबा थानिगाहों से मेरी कहाँ छुप सका थामिरे और तिरे दरमियाँ वस्ल की हर घड़ी मेंन जाने कहाँ सेवही सोख़्ता-बख़्त तेरीकि जो जाँ-फ़िशानी के शो'लों से दहके हुएज़िंदगी के अबद-ताब तन्नूर परउँगलियाँ तेरे बच्चों की थामे खड़ीभूक से बरसर-ए-जंग थीजिस के नज़दीक येतेरे कूज़े तिरा फ़न तिरी आग सबमेरी आँखें मिरे फूल और ख़्वाब सबज़िंदगी के अबद-ताब तन्नूर की राख थेतेरी इस सोख़्ता-बख़्त को क्या ख़बरजब ज़मीं अपने महवर की तज्दीद मेंहर्फ़-ए-ला से गुज़र जाएगीतो हज़ारों बरस बा'द भीये अज़ल के घरोंदों की मिट्टी में मदफ़ूनफूल और बूटे ये कूज़ेऔर उन में उन्ही क़ाफ़ आँखों से छलके हुएसुर्ख़ पानी की तलछटकिसी कूज़ा-गर के जवाँ लम्स से जी उठे तोजहाँ-ज़ाद उस के लिए फिर जनम लेगीऔर नौ बरस रक़्स करते गुज़र जाएँगेतेरी इस सोख़्ता-बख़्त को क्या ख़बरवो रातवो हलब की कारवाँ-सरा का हौज़जिस को मैं ने जिस्म-ओ-जाँ की ख़ुशबुएँ कशीद कर केक़तरा-क़तरा नौ बरस में आँसुओं से पुर कियावो एक रात सिर्फ़ एक रात मेंतमाम ख़ुश्क हो गयाहम अपने वस्ल की तमाज़तों में ऐसे जल-बुझेकि राख तक नहीं बचीये एक जाँ की तिश्नगीमुझे तुझे ब-यक-ज़माँभला कहाँ कहाँ न खींचती फिरीमगर ये तू ने क्या कहाकि तेरे जैसी 'औरतें जहान-ज़ादऐसी उलझनें हैं जिन को आज तक कोई नहीं सुलझा सकाकि 'औरतों की साख़्त है वो तंज़ अपने आप परजवाब जिन का हम नहींतो फिर ये जाम-ओ-मीना-ओ-सुबू-ओ-हौज़-ओ-रूद-ए-नीलइस ज़मीं की गोद मेंअज़ल के हर्फ़-गीर ताबनाक ख़्वाब के लिएकहीं भी कुछ रक़म नहींऐ हसनचाक पर से ज़रा अपनी नज़रें हटातू मिरे नौ बरस तक बनाए गए फूल तो देख लेफूल ताज़ा शगुफ़्ता और आज़ुर्दा हैंयूँ न हो कि इन्हेंभूक और मुफ़लिसी के सताए हुएमेरे बच्चे भी नीलाम कर आएँ जा कर कहींतेरे कूज़ों के मानिंद बग़दाद मेंऐ हसनदामन-ए-वक़्त पर जितने फूल और बूटे सजे हैंजहाँ-ज़ाद की ज़ख़्मी पोरों नेरंग उन में अपने जुनूँ के भरे हैंये तावान हैं चम्पई उँगलियों कातिरे जाम-ओ-मीना पेजिस ख़ाल-ओ-ख़द की नज़ाकत की परछाईयाँ थींतुझे क्या ख़बर ये किन आँखों की बीनाइयाँ थींहसन ये मोहब्बतकि जिस को तिरी सोख़्ता-बख़्त गर्दान्ती हैअमीरों की बाज़ीतो मेरे तईं ये अमीरों की बाज़ी कहाँसिर्फ़ बाज़ीगरी थीमोहब्बत हमेशा से मुफ़्लिस का सरमाया-ए-जाँ रही हैयही तो वो पूँजी हैजिस तक अमीरों के हाथ अब भी पहुँचे नहीं हैंतुझे ये गुमाँ थाकि 'औरत मोहब्बत की बाज़ी में बे-जान पत्ते की सूरतकिसी दस्त-ए-चाबुक की मरहून-ए-मिन्नतवो इस खेल में एक मोहरे की सूरतकि जब जिस ने चाहाइसे एक घर से उठा करकिसी दूसरे घर का मालिक बनायाकि 'औरत फ़क़त एक पत्थर की मूरतये तस्वीर-ए-हैरतयूँही चुप खड़ी हैयूँही चुप रहेगीमगर यूँ नहीं हैहसन तू ने देखाकि मैं क़ैद-ए-औहाम ओ बंद-ए-रिवायात मेंबूढ़े 'अत्तार यूसुफ़ की दुक्कान परअपनी आँखें तुझे नज़्र करती रहीबूढ़ा 'अत्तार वो कीमिया-गरकि जिस ने ज़मानों के जंगल सेचेहरों के फूल और बूटे चुनेवो मुझे और तुझे जानता था मगरमैं ने बाज़ार मेंतुझ से आँखों का और दिल का सौदा कियाऐ हसनमेरे एक इक दरीचे पेकोहना रिवायात ओ ज़ालिम 'अक़ाएद का जंगल उगा थाहसनकाश तू मेरी आँखों से मेरे दरीचे को तकतातो ये जान सकताजहाँ तू खड़ा था वहाँ एक इक दर्ज़ सेमेरी आँखें मिरा जिस्मछन छन केकट कट के गिरता रहा था
फ़ख़्र-ए-वतन हैं दोनों और दोनों मुक़्तदर हैंहैं फूल इक चमन के इक नख़्ल के समर हैंऐ क़ौम तेरे दुख के दोनों ही चारागर हैंदोनों जिगर जिगर हैं लेकिन दिगर दिगर हैंआपस के तफ़रक़ों से हैं आह ख़ार दोनोंअग़्यार की नज़र में हैं बे-वक़ार दोनोंमिल कर चलो कि आख़िर दोनों हो भाई भाईभाई से क्या लड़ाई भाई से क्या बुराईकब तक ये ख़ाना-जंगी कब तक ये ख़ुद-सिताईदो भाइयों को हरगिज़ ज़ेबा नहीं जुदाईमिल कर गले निकालो दिल का ग़ुबार दोनोंइस ख़ाक के हो पुतले पायान-ए-कार दोनोंरश्क-ए-जिनाँ बनाओ हिन्दोस्ताँ को मिल करख़ून-ए-जिगर से सींचो इस गुलिस्ताँ को मिल करलहराओ आसमाँ पर क़ौमी निशाँ को मिल करदो आब-ए-जाँ-निसारी नोक-ए-सिनाँ को मिल कर
नन्हे-मुन्ने दो बच्चों की है दिलचस्प कहानीरूप-नगर की सैर करेंगे बात जो दिल में ठानीलाख मनाया माँ ने लेकिन बात न उस की मानीसुब्ह-सवेरे घर से निकले घर वालों से छुप केचलते चलते दोनों बच्चे इक जंगल में पहुँचेशिद्दत की गर्मी थी उस पे दोनों ही थे भूकेथोड़ी देर चले जंगल में देखा बाग़ अनोखाफूल खिले थे रंग-बिरंगे जूही बेला चम्पानन्हा सा इक पेड़ भी देखा फल था जिस का मीठाफल खाया दोनों ने मिल कर अपनी प्यास बुझाईइतने में इक नन्ही बच्ची सामने उन के आईआगे बढ़ कर बोली तुम हो कौन बताओ भाईसच सच बोलो क्यों तुम दोनों मेरे देस में आएये वो देस है भाई इस में जो आए रह जाएरूप-नगर में कोई आ कर कैसे जाने पाएबात सुनी जब बच्चों ने तो अपना हाल बतायारूप-नगर का शौक़ ही हम को इस जंगल में लायाबरसों से थी जिस की ख़्वाहिश उस को देख तो पायासुन कर बच्ची हँस कर बोली आओ शहर दिखाएँसोने चाँदी के महलों की तुम को सैर कराएँभूके हो तो घर पे चल कर पहले खाना खाएँजगमग करती सड़कें देखीं देखे महल दो महलेऐसी दुनिया इन बच्चों ने कब देखी थी पहलेबच्चे बूढ़े और जवाँ थे सब अख़्लाक़ के पुतलेनन्ही बच्ची ने दोनों को अपना भाई समझाउस के अब्बू अम्मी ने भी प्यार से उन को रक्खाअच्छे खाने ख़ूब दिए फिर अच्छा अच्छा कपड़ालेकिन इक बच्चे को अपनी माँ की याद जो आईरो रो कर अम्मी अम्मी को फिर आवाज़ लगाईहाथ पकड़ कर कोई बोला क्यों रोते हो भाईआँख खुली तो अम्मी बोलीं देख रहे थे सपनाशाहिद मेरी बातें मानो सुन लो मेरा कहनारूप-नगर जाने को झगड़ा हरगिज़ अब मत करनानानी अम्माँ के क़िस्से को बिल्कुल झूट समझनावर्ना मेरी मार से मुश्किल है अब तेरा बचना
ये मा'ज़ूर बेकस ग़बी ज़ेहनी बच्चेहैं इंसाँ नहीं कोई माटी के पुतलेज़बाँ से हैं गूँगे समाअ'त से आरीबनाओ न इन को सड़क के भिकारीहैं पुर-पेच-तर इन की हस्ती के रस्तेकि पुर-सोज़ जैसे हों बंसी के नग़्मेसरापे को उन के न बे-कार कहनाये हैं ज़िंदगी का हसीं एक गहनाकभी ये हँसाएँ कभी रूठ जाएँदिलों से ग़मों की लकीरें मिटाएँये नट-खट हटीले बहुत चुलबुले हैंअदाओं में इन की अजब वलवले हैंकटी उँगलियाँ हैं मुसव्विर बनेंगेअपाहिज सही फिर भी ताजिर बनेंगेमोहब्बत का सीनों में जज़्बा जगाओसमाजी फरीज़े को अपने निभाओये इक फ़र्ज़ ऐसा कि राहत है इस मेंछुपी इब्न-ए-आदम की अज़्मत है इस मेंइन्हें ग़ौर से तुम घड़ी भर जो देखोमशिय्यत है क़ुदरत की कुछ इस को समझोसुलूक उन से रक्खो मोहब्बत वफ़ा कासिला पाओगे तुम भी बे-शक जज़ा काइन्हें भूल कर न कभी दूर रखना'अदीम' इन सितारों को मामूर रखना
कल तलक जो धरती परसर-बुलंद परचम थाआफ़्ताब की सूरतरंग जिस के चेहरे कादूर तक चमकता थाआज उस से लिपटी हैंटिड्डियाँ हवाओं कीसुर्ख़ियों के शोलों कोले रही हैं नर्ग़े मेंबदलियाँ फ़ज़ाओं की'मार्क्स'-जी के पुतले परबैठा काला कव्वा एकबीट करने वाला हैपास ही में नारा एकइंक़लाब ज़िंदाबादगूँजता है रह रह कर
घरों से बच्चो निकल आओ गिर रही है बर्फ़बजाओ तालियाँ और गाओ गिर रही है बर्फ़फ़लक से फ़र्श-ए-ज़मीं पर बरस रहा है नूरछतों पे खेतों पे शाख़ों पे बस रहा है नूरचमन है नूर की इक नाव गिर रही है बर्फ़फ़ज़ा में चारों तरफ़ सुरमई उजाला हैथी बूँद पानी की अब रुई का जो गाला हैदिलों को शौक़ से गर्माओ गिर रही है बर्फ़है नर्म ऐसी कि फूलों को गुदगुदी आएसफ़ेद ऐसी कि बगुले का पर भी शरमाएमिला के गुड़ में इसे खाओ गिर रही है बर्फ़बनाओ क़ौस-ए-क़ुज़ह बर्फ़ पर गिरा कर रंगबढ़ाओ बर्फ़ के खेलों से अपने दिल की उमंगफिसल के बर्फ़ पे दिखलाओ गिर रही है बर्फ़तराशो बर्फ़ के पुतले मनाओ यख़ की बहारउछालो बर्फ़ की गेंदें उड़ाओ यख़ की फुवारचलो कि पार्क में बे-भाव गिर रही है बर्फ़घरों से बच्चो निकल आओ गिर रही है बर्फ़बजाओ तालियाँ और गाओ गिर रही है बर्फ़
जहाँ को फिर बताएँगेसमुंदर भाप बन कर किस तरह उड़ते हैं आँखों सेबदन शक़ होते होते किस तरह पाताल बनते हैंनफ़स के शहर कैसे रेज़ा रेज़ा ख़ाक होते हैंमसामों से उबल कर आसमाँ कैसे सुलगते हैंअदम मशरूम बन कर कैसे ख़लियों से उभरता हैकि उखड़ी इर्तिक़ा की बूँद में सरशार ये पुतलेहमारे दो जहानों का मुक़द्दर सोचने वालेइन्हीं बौनों की ख़ातिर लाए हैं अब हम सुकूत अपनाकि हम ख़ामोश बैठे हैंकि लर्ज़ां इर्तिक़ा के रुख़ पे पर्दा डालते हैं हमकि अब भी रूह से हीर ओ शीमा खँगालते हैं हम
ऐ तख़्त-नशीं लोगो तुम नेये कैसा मुल्क बना डालाहर हिस्से में है ज़ख़्म बहुतहर शक्ल पे मातम छाया हैक़तरा-क़तरा ख़ूँ बहता हैरेज़ा-रेज़ा सब मरते हैंहर लम्हा इक डर रहता हैकोई साया जाने कहाँ सेआ धमके फिर खा ही जाएहम डरते हैं सब डरते हैंसब का डरना लाज़िम भी हैइन कमरों में चीख़ रही हैसच कहने वाली ख़ामोशीसच सुन ने वाली इक आदतसच लिखने वाले कुछ पागलहैं ज़ब्त कहीं पर लोग यहाँकोई खोजे आख़िर उन कोहाँ उन लोगों में हिम्मत हैतोपों के आगे रख देंगेकुछ गीत कहानी नज़्म क़लमकुछ दीवारें पोती जाएँगीकुछ वा'दे लिक्खे जाएँगेवो दहशत तोड़ी जाएगीकुछ पुतले फूँके जाएँगेडफ़ली पे राग बनेगी फिरतब एक मशअ'ल जलेगी फिरज़ंजीरें तलवारें तोपेंये सब ग़ाएब हो जाएँगीहम फिर से तब मुस्काएँगेहम फिर से सच कह पाएँगे
इन में शामिल हैं बुरे भी और चँगे भीकुछ शराफ़त के हैं पुतले कुछ लफ़ंगे भीचंद इक ने तो कराए होंगे दंगे भी
अपने मुँह से क्या बताएँ हम कि क्या वो लोग थेनफ़्स-कुश नेकी के पुतले थे मुजस्सम योग थे
यही एक लम्हा हैजब मेरे पाँव ज़मीं पर हैंमेरा वजूद एक सोंधी सी ख़ुशबू लिए हैयही एक लम्हाकि मैं हूँयही एक लम्हाकि तू हैतिरा ख़ून सय्याल आतिशतिरे जिस्म कोएक मिट्टी के तारीक पुतले कोलौ दे रहा है
ये आए दिन के हंगामेये जब देखो सफ़र करनायहाँ जाना वहाँ जानाइसे मिलना उसे मिलनाहमारे सारे लम्हेऐसे लगते हैंकि जैसे ट्रेन के चलने से पहलेरेलवे-स्टेशन परजल्दी जल्दी अपने डब्बे ढूँडतेकोई मुसाफ़िर होंजिन्हें कब साँस भी लेने की मोहलत हैकभी लगता हैतुम को मुझ से मुझ को तुम से मिलने काख़याल आएकहाँ इतनी भी फ़ुर्सत हैमगर जब संग-दिल दुनिया मेरा दिल तोड़ती है तोकोई उम्मीद चलते चलतेजब मुँह मोड़ती है तोकभी कोई ख़ुशी का फूलजब इस दिल में खिलता हैकभी जब मुझ को अपने ज़ेहन सेकोई ख़याल इनआम मिलता हैकभी जब इक तमन्ना पूरी होने सेये दिल ख़ाली सा होता हैकभी जब दर्द आ के पलकों पे मोती पिरोता हैतो ये एहसास होता हैख़ुशी हो ग़म हो हैरत होकोई जज़्बा होइस में जब कहीं इक मोड़ आए तोवहाँ पल भर कोसारी दुनिया पीछे छूट जाती हैवहाँ पल भर कोइस कठ-पुतली जैसी ज़िंदगी कीडोरी टूट जाती हैमुझे उस मोड़ परबस इक तुम्हारी ही ज़रूरत हैमगर ये ज़िंदगी की ख़ूबसूरत इक हक़ीक़त हैकि मेरी राह में जब ऐसा कोई मोड़ आया हैतो हर उस मोड़ पर मैं नेतुम्हें हम-राह पाया है
सुहानी नुमूद-ए-जहाँ की घड़ी थीतबस्सुम-फ़शाँ ज़िंदगी की कली थीकहीं मुहर को ताज-ए-ज़र मिल रहा थाअता चाँद को चाँदनी हो रही थीसियह पैरहन शाम को दे रहे थेसितारों को ता'लीम-ए-ताबिंदगी थीकहीं शाख़-ए-हस्ती को लगते थे पत्तेकहीं ज़िंदगी की कली फूटती थीफ़रिश्ते सिखाते थे शबनम को रोनाहँसी गुल को पहले-पहल आ रही थीअता दर्द होता था शाइ'र के दिल कोख़ुदी तिश्ना-काम मय-ए-बे-ख़ुदी थीउठी अव्वल अव्वल घटा काली कालीकोई हूर चोटी को खोले खड़ी थीज़मीं को था दा'वा कि मैं आसमाँ हूँमकाँ कह रहा था कि मैं ला-मकाँ हूँग़रज़ इस क़दर ये नज़ारा था प्याराकि नज़ारगी हो सरापा नज़ारामलक आज़माते थे परवाज़ अपनीजबीनों से नूर-ए-अज़ल आश्काराफ़रिश्ता था इक इश्क़ था नाम जिस काकि थी रहबरी उस की सब का सहाराफ़रिश्ता कि पुतला था बे-ताबियों कामलक का मलक और पारे का पारापए सैर फ़िरदौस को जा रहा थाक़ज़ा से मिला राह में वो क़ज़ा-राये पूछा तिरा नाम क्या काम क्या हैनहीं आँख को दीद तेरी गवाराहुआ सुन के गोया क़ज़ा का फ़रिश्ताअजल हूँ मिरा काम है आश्काराउड़ाती हूँ मैं रख़्त-ए-हस्ती के पुर्ज़ेबुझाती हूँ मैं ज़िंदगी का शरारामिरी आँख में जादू-ए-नीस्ती हैपयाम-ए-फ़ना है उसी का इशारामगर एक हस्ती है दुनिया में ऐसीवो आतिश है मैं सामने उस के पाराशरर बन के रहती है इंसाँ के दिल मेंवो है नूर-ए-मुतलक़ की आँखों का ताराटपकती है आँखों से बन बन के आँसूवो आँसू कि हो जिन की तल्ख़ी गवारासुनी इश्क़ ने गुफ़्तुगू जब क़ज़ा कीहँसी उस के लब पर हुई आश्कारागिरी इस तबस्सुम की बिजली अजल परअंधेरे का हो नूर में क्या गुज़ाराबक़ा को जो देखा फ़ना हो गई वोक़ज़ा थी शिकार क़ज़ा हो गई वो
दिन-भर कॉफ़ी-हाउस में बैठे कुछ दुबले-पतले नक़्क़ादबहस यही करते रहते हैं सुस्त अदब की है रफ़्तारसिर्फ़ अदब के ग़म में ग़लताँ चलने फिरने से लाचारचेहरों से ज़ाहिर होता है जैसे बरसों के बीमारउर्दू-अदब में ढाई हैं शायर 'मीर' ओ 'ग़ालिब' आधा 'जोश'या इक-आध किसी का मिस्रा या 'इक़बाल' के चंद अशआरया फिर नज़्म है इक चूहे पर हामिद-'मदनी' का शहकारकोई नहीं है अच्छा शायर कोई नहीं अफ़्साना-निगार'मंटो' 'कृष्ण' 'नदीम' और 'बेदी' इन में जान तो है लेकिनऐब ये है इन के हाथों में कुंद ज़बाँ की है तलवार'आली' अफ़सर 'इंशा' बाबू 'नासिर' 'मीर' के बर-ख़ुरदार'फ़ैज़' ने जो अब तक लिक्खा है क्या लिक्खा है सब बे-कारउन को अदब की सेह्हत का ग़म मुझ को उन की सेह्हत काये बेचारे दुख के मारे जीने से हैं क्यूँ बे-ज़ारहुस्न से वहशत इश्क़ से नफ़रत अपनी ही सूरत से प्यारख़ंदा-ए-गुल पर एक तबस्सुम गिर्या-ए-शबनम से इंकार
पतली गर्दन पतले अबरू पतले लब पतली कमरजितना बीमार आदमी इतना तरहदार आदमी
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