aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "route"
एक कोने मेंहिमालियाई सिल्क रूट सेस्मगल किए हुएबच्चियों लड़कियों औरतों वालेचीनी फ़ौलादी जूतेपलोठी के लड़कों के इंतिज़ार मेंपिघल पिघल केछोटी छोटी उल्टे कटोरों जैसीबे-फन्दे की आहनीतुर्की टोपियों बने बैठे थे
आँख ही दर्द पहचानती हैमैं इस रूट परपहेली गाड़ी का मेहमाँ थाबे-तरह घूमती गेंद पर अब नफ़स जितने अन्फ़ास का और मेहमान हैउन की गिनती मिरी दास्ताँ में नहींख़ाक की नाफ़ से ख़ाक के बत्न तकचंद साआ'त की रौशनीपोशिशें बत्तियाँ ताज़ा मोडल क्लबताज़ा-रुख़ गाड़ी और बान और गुल-चेहरा इंटरप्रेटरयही चार-आइना चेहराकि चेहरे में तस्वीर-ए-अय्याम सेरौनक़ों में बसे इस तिलिस्मात मेंदिन जो वीराँ कटेजो शीशें घनी रात में खो गईंसो गईंआसमानों पे ख़ाली का चाँदनाक-नक़्शा बिखरने पे क़ादिर हुआजिस की तहवील में दो मुँदे दाएरे आँख के हैंफ़क़त आँख के हाथ पर नक़्श हैं आँख ख़ाली नहीं
हमारे शहर की आबादी के दरमियानकिसी भी समझौते के इम्कान को मुस्तरद करते हुएशहर के शुमाल मग़रिब मेंदूर तक फैली हुई पहाड़ी में एक शिगाफ़ डाल दिया गया हैपहाड़ी को काटने का ये अछूता ख़यालशहर के कुछ मे'मारों के ज़ेहन में क्या आयाशहर के मकानों के दर-ओ-दीवारइस नई तफ़रीक़ के शोर-ओ-शर सेतप कर सुर्ख़ हो गएऔर शहर के ऊपर मंडलाने लगेक़िस्मत आज़माऊँ के अज़ाएमशहर को अब नए ज़ावियों से देखा जाने लगाअब इस पहाड़ी मेंकई एक ऐसे मक़ामात दिखाई देने लगे हैंजहाँ से उसे मज़ीद काटाया कमज़ोर किया जा सकता हैपहाड़ी के कटते हीउस पास की आबादियों ने अपनी हुदूद कोनए सिरे से तरतीब दे लिया हैकटाओ से शहर में हवा का दबाओग़ैर-मुस्तहकम हो गया हैगाड़ियों के रूट बदलने लगेजमी जमाई आबादीमुतज़लज़ल हो गईबाज़ारों और ख़रीदारों के रंग रूपऔर चेहरे मोहरे तब्दील हो गए हैंलोग शाह-राहोंमकानोंपार्कोंस्कूलों और इबादत-गाहों कोयूँ देखने लगेजैसे उन के बीच भी उन्हेंशिगाफ़ दिखाई देने लगे होंकटी हुई पहाड़ी नेहम सब के चेहरों के बीचएक मुस्तक़िल दराड़ डाल दी हैइन मे'मारों से ज़्यादाजिन्हों ने पहाड़ी में शिगाफ़ डालाहम हर उस शय से ख़ौफ़-ज़दा हैंजिस में ब-ज़ाहिर कोई शिगाफ़ या दराड़ दिखाई नहीं देतीपर जिस के दरमियान सेमुस्तक़िल झाँक रही हैकटी हुई पहाड़ी
जब कहीं बैठ के रोते हैं वो बेकस जिन केअश्क आँखों में बिलकते हुए सो जाते हैंना-तवानों के निवालों पे झपटते हैं उक़ाबबाज़ू तोले हुए मंडलाते हुए आते हैं
हम रातों को उठ कर रोते हैं रो रो के दुआएँ करते हैंआँखों में तसव्वुर दिल में ख़लिश सर धुनते हैं आहें भरते हैंऐ इश्क़ ये कैसा रोग लगा जीते हैं न ज़ालिम मरते हैं
दुनिया में पादशह है सो है वो भी आदमीऔर मुफ़्लिस-ओ-गदा है सो है वो भी आदमीज़रदार-ए-बे-नवा है सो है वो भी आदमीनेमत जो खा रहा है सो है वो भी आदमीटुकड़े चबा रहा है सो है वो भी आदमीअब्दाल, क़ुतुब ओ ग़ौस वली-आदमी हुएमुंकिर भी आदमी हुए और कुफ़्र के भरेक्या क्या करिश्मे कश्फ़-ओ-करामात के लिएहत्ता कि अपने ज़ोहद-ओ-रियाज़त के ज़ोर सेख़ालिक़ से जा मिला है सो है वो भी आदमीफ़िरऔन ने किया था जो दावा ख़ुदाई काशद्दाद भी बहिश्त बना कर हुआ ख़ुदानमरूद भी ख़ुदा ही कहाता था बरमलाये बात है समझने की आगे कहूँ मैं क्यायाँ तक जो हो चुका है सो है वो भी आदमीकुल आदमी का हुस्न ओ क़ुबह में है याँ ज़ुहूरशैताँ भी आदमी है जो करता है मक्र-ओ-ज़ोरऔर हादी रहनुमा है सो है वो भी आदमीमस्जिद भी आदमी ने बनाई है याँ मियाँबनते हैं आदमी ही इमाम और ख़ुत्बा-ख़्वाँपढ़ते हैं आदमी ही क़ुरआन और नमाज़ियाँऔर आदमी ही उन की चुराते हैं जूतियाँजो उन को ताड़ता है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी पे जान को वारे है आदमीऔर आदमी पे तेग़ को मारे है आदमीपगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमीचिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमीऔर सुन के दौड़ता है सो है वो भी आदमीचलता है आदमी ही मुसाफ़िर हो ले के मालऔर आदमी ही मारे है फाँसी गले में डालयाँ आदमी ही सैद है और आदमी ही जालसच्चा भी आदमी ही निकलता है मेरे लालऔर झूट का भरा है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी ही शादी है और आदमी बियाहक़ाज़ी वकील आदमी और आदमी गवाहताशे बजाते आदमी चलते हैं ख़्वाह-मख़ाहदौड़े हैं आदमी ही तो मशअ'ल जला के राहऔर ब्याहने चढ़ा है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी नक़ीब हो बोले है बार बारऔर आदमी ही प्यादे हैं और आदमी सवारहुक़्क़ा सुराही जूतियाँ दौड़ें बग़ल में मारकाँधे पे रख के पालकी हैं दौड़ते कहारऔर उस में जो पड़ा है सो है वो भी आदमीबैठे हैं आदमी ही दुकानें लगा लगाऔर आदमी ही फिरते हैं रख सर पे ख़ूनचाकहता है कोई लो कोई कहता है ला रे लाकिस किस तरह की बेचें हैं चीज़ें बना बनाऔर मोल ले रहा है सो है वो आदमीतबले मजीरे दाएरे सारंगियाँ बजागाते हैं आदमी ही हर इक तरह जा-ब-जारंडी भी आदमी ही नचाते हैं गत लगाऔर आदमी ही नाचे हैं और देख फिर मज़ाजो नाच देखता है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी ही लाल-ओ-जवाहर में बे-बहाऔर आदमी ही ख़ाक से बद-तर है हो गयाकाला भी आदमी है कि उल्टा है जूँ तवागोरा भी आदमी है कि टुकड़ा है चाँद-साबद-शक्ल बद-नुमा है सो है वो भी आदमीइक आदमी हैं जिन के ये कुछ ज़र्क़-बर्क़ हैंरूपे के जिन के पाँव हैं सोने के फ़र्क़ हैंझमके तमाम ग़र्ब से ले ता-ब-शर्क़ हैंकम-ख़्वाब ताश शाल दो-शालों में ग़र्क़ हैंऔर चीथडों लगा है सो है वो भी आदमीहैराँ हूँ यारो देखो तो क्या ये स्वाँग हैऔर आदमी ही चोर है और आपी थांग हैहै छीना झपटी और बाँग ताँग हैदेखा तो आदमी ही यहाँ मिस्ल-ए-रांग हैफ़ौलाद से गढ़ा है सो है वो भी आदमीमरने में आदमी ही कफ़न करते हैं तयारनहला-धुला उठाते हैं काँधे पे कर सवारकलमा भी पढ़ते जाते हैं रोते हैं ज़ार-ज़ारसब आदमी ही करते हैं मुर्दे के कारोबारऔर वो जो मर गया है सो है वो भी आदमीअशराफ़ और कमीने से ले शाह-ता-वज़ीरये आदमी ही करते हैं सब कार-ए-दिल-पज़ीरयाँ आदमी मुरीद है और आदमी ही पीरअच्छा भी आदमी ही कहाता है ऐ 'नज़ीर'और सब में जो बुरा है सो है वो भी आदमी
ये मिलें ये जागीरेंकिस का ख़ून पीती हैंबैरकों में ये फ़ौजेंकिस के बल पे जीती हैंकिस की मेहनतों का फलदाश्ताएँ खाती हैंझोंपड़ों से रोने कीक्यूँ सदाएँ आती हैंजब शबाब पर आ करखेत लहलहाता हैकिस के नैन रोते हैंकौन मुस्कुराता हैकाश तुम कभी समझोकाश तुम कभी समझोकाश तुम कभी जानोदस करोड़ इंसानो!इल्म-ओ-फ़न के रस्ते मेंलाठियों की ये बाड़ेंकॉलिजों के लड़कों परगोलियों की बौछाड़ेंये किराए के गुंडेयादगार-ए-शब देखोकिस क़दर भयानक हैज़ुल्म का ये ढब देखोरक़्स-ए-आतिश-ओ-आहनदेखते ही जाओगेदेखते ही जाओगेहोश में न आओगेहोश में न आओगेऐ ख़मोश तूफ़ानो!दस करोड़ इंसानो!
जब आदमी के हाल पे आती है मुफ़्लिसीकिस किस तरह से उस को सताती है मुफ़्लिसीप्यासा तमाम रोज़ बिड़ाती है मुफ़्लिसीभूका तमाम रात सुलाती है मुफ़्लिसीये दुख वो जाने जिस पे कि आती है मुफ़्लिसीकहिए तो अब हकीम की सब से बड़ी है शाँतअ'ज़ीम जिस की करते हैं तो अब और ख़ाँमुफ़्लिस हुए तो हज़रत-ए-लुक़्माँ किया है याँईसा भी हो तो कोई नहीं पूछता मियाँहिकमत हकीम की भी ढुबाती है मुफ़्लिसीजो अहल-ए-फ़ज़्ल आलिम ओ फ़ाज़िल कहाते हैंमुफ़्लिस हुए तो कलमा तलक भूल जाते हैंवो जो ग़रीब-ग़ुरबा के लड़के पढ़ाते हैंउन की तो उम्र भर नहीं जाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस करे जो आन के महफ़िल के बीच हालसब जानें रोटियों का ये डाला है इस ने जालगिर गिर पड़े तो कोई न लिए उसे सँभालमुफ़्लिस में होवें लाख अगर इल्म और कमालसब ख़ाक बेच आ के मिलाती है मुफ़्लिसीजब रोटियों के बटने का आ कर पड़े शुमारमुफ़्लिस को देवें एक तवंगर को चार चारगर और माँगे वो तो उसे झिड़कें बार बारमुफ़्लिस का हाल आह बयाँ क्या करूँ मैं यारमुफ़्लिस को इस जगह भी चबाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस की कुछ नज़र नहीं रहती है आन परदेता है अपनी जान वो एक एक नान परहर आन टूट पड़ता है रोटी के ख़्वान परजिस तरह कुत्ते लड़ते हैं इक उस्तुख़्वान परवैसा ही मुफ़लिसों को लड़ाती है मुफ़्लिसीकरता नहीं हया से जो कोई वो काम आहमुफ़्लिस करे है उस के तईं इंसिराम आहसमझे न कुछ हलाल न जाने हराम आहकहते हैं जिस को शर्म-ओ-हया नंग-ओ-नाम आहवो सब हया-ओ-शर्म उड़ाती है मुफ़्लिसीये मुफ़्लिसी वो शय है कि जिस घर में भर गईफिर जितने घर थे सब में उसी घर के दर गईज़न बच्चे रोते हैं गोया नानी गुज़र गईहम-साया पूछते हैं कि क्या दादी मर गईबिन मुर्दे घर में शोर मचाती है मुफ़्लिसीलाज़िम है गर ग़मी में कोई शोर-ग़ुल मचाएमुफ़्लिस बग़ैर ग़म के ही करता है हाए हाएमर जावे गर कोई तो कहाँ से उसे उठाएइस मुफ़्लिसी की ख़्वारियाँ क्या क्या कहूँ मैं हाएमुर्दे को बे कफ़न के गड़ाती है मुफ़्लिसीक्या क्या मुफ़्लिसी की कहूँ ख़्वारी फकड़ियाँझाड़ू बग़ैर घर में बिखरती हैं झकड़ियाँकोने में जाले लपटे हैं छप्पर में मकड़ियाँपैसा न होवे जिन के जलाने को लकड़ियाँदरिया में उन के मुर्दे बहाती है मुफ़्लिसीबीबी की नथ न लड़कों के हाथों कड़े रहेकपड़े मियाँ के बनिए के घर में पड़े रहेजब कड़ियाँ बिक गईं तो खंडर में पड़े रहेज़ंजीर ने किवाड़ न पत्थर गड़े रहेआख़िर को ईंट ईंट खुदाती है मुफ़्लिसीनक़्क़ाश पर भी ज़ोर जब आ मुफ़्लिसी करेसब रंग दम में कर दे मुसव्विर के किर्किरेसूरत भी उस की देख के मुँह खिंच रहे परेतस्वीर और नक़्श में क्या रंग वो भरेउस के तो मुँह का रंग उड़ाती है मुफ़्लिसीजब ख़ूब-रू पे आन के पड़ता है दिन सियाहफिरता है बोसे देता है हर इक को ख़्वाह-मख़ाहहरगिज़ किसी के दिल को नहीं होती उस की चाहगर हुस्न हो हज़ार रूपे का तो उस को आहक्या कौड़ियों के मोल बिकाती है मुफ़्लिसीउस ख़ूब-रू को कौन दे अब दाम और दिरमजो कौड़ी कौड़ी बोसे को राज़ी हो दम-ब-दमटोपी पुरानी दो तो वो जाने कुलाह-ए-जिस्मक्यूँकर न जी को उस चमन-ए-हुस्न के हो ग़मजिस की बहार मुफ़्त लुटाती है मुफ़्लिसीआशिक़ के हाल पर भी जब आ मुफ़्लिसी पड़ेमाशूक़ अपने पास न दे उस को बैठनेआवे जो रात को तो निकाले वहीं उसेइस डर से या'नी रात ओ धन्ना कहीं न देतोहमत ये आशिक़ों को लगाती है मुफ़्लिसीकैसे ही धूम-धाम की रंडी हो ख़ुश-जमालजब मुफ़्लिसी हो कान पड़े सर पे उस के जालदेते हैं उस के नाच को ढट्ढे के बीच डालनाचे है वो तो फ़र्श के ऊपर क़दम सँभालऔर उस को उँगलियों पे नचाती है मुफ़्लिसीउस का तो दिल ठिकाने नहीं भाव क्या बताएजब हो फटा दुपट्टा तो काहे से मुँह छुपाएले शाम से वो सुब्ह तलक गो कि नाचे गाएऔरों को आठ सात तो वो दो टके ही पाएइस लाज से इसे भी लजाती है मुफ़्लिसीजिस कसबी रंडी का हो हलाकत से दिल हज़ींरखता है उस को जब कोई आ कर तमाश-बींइक पौन पैसे तक भी वो करती नहीं नहींये दुख उसी से पूछिए अब आह जिस के तईंसोहबत में सारी रात जगाती है मुफ़्लिसीवो तो ये समझे दिल में कि ढेला जो पाऊँगीदमड़ी के पान दमड़ी के मिस्सी मँगाऊँगीबाक़ी रही छदाम सो पानी भराऊँगीफिर दिल में सोचती है कि क्या ख़ाक खाऊँगीआख़िर चबीना उस का भुनाती है मुफ़्लिसीजब मुफ़्लिसी से होवे कलावंत का दिल उदासफिरता है ले तम्बूरे को हर घर के आस-पासइक पाव सेर आने की दिल में लगा के आसगोरी का वक़्त होवे तो गाता है वो बभासयाँ तक हवास उस के उड़ाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस बियाह बेटी का करता है बोल बोलपैसा कहाँ जो जा के वो लावे जहेज़ मोलजोरू का वो गला कि फूटा हो जैसे ढोलघर की हलाल-ख़ोरी तलक करती है ढिढोलहैबत तमाम उस की उठाती है मुफ़्लिसीबेटे का बियाह हो तो न ब्याही न साथी हैने रौशनी न बाजे की आवाज़ आती हैमाँ पीछे एक मैली चदर ओढ़े जाती हैबेटा बना है दूल्हा तो बावा बराती हैमुफ़्लिस की ये बरात चढ़ाती है मुफ़्लिसीगर ब्याह कर चला है सहर को तो ये बलाशहदार नाना हीजड़ा और भाट मंड-चढ़ाखींचे हुए उसे चले जाते हैं जा-ब-जावो आगे आगे लड़ता हुआ जाता है चलाऔर पीछे थपड़ियों को बजाती है मुफ़्लिसीदरवाज़े पर ज़नाने बजाते हैं तालियाँऔर घर में बैठी डोमनी देती हैं गालियाँमालन गले की हार हो दौड़ी ले डालियाँसक़्क़ा खड़ा सुनाता है बातें रज़ालियाँये ख़्वारी ये ख़राबी दिखाती है मुफ़्लिसीकोई शूम बे-हया कोई बोला निखट्टू हैबेटी ने जाना बाप तो मेरा निखट्टू हैबेटे पुकारते हैं कि बाबा निखट्टू हैबीबी ये दिल मैं कहती है अच्छा निखट्टू हैआख़िर निखट्टू नाम धराती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस का दर्द दिल में कोई ढानता नहींमुफ़्लिस की बात को भी कोई मानता नहींज़ात और हसब-नसब को कोई जानता नहींसूरत भी उस की फिर कोई पहचानता नहींयाँ तक नज़र से उस को गिराती है मुफ़्लिसीजिस वक़्त मुफ़्लिसी से ये आ कर हुआ तबाहफिर कोई इस के हाल प करता नहीं निगाहदालीदरी कहे कोई ठहरा दे रू-सियाहजो बातें उम्र भर न सुनी होवें उस ने आहवो बातें उस को आ के सुनाती हैं मुफ़्लिसीचूल्हा तवाना पानी के मटके में आबी हैपीने को कुछ न खाने को और ने रकाबी हैमुफ़्लिस के साथ सब के तईं बे-हिजाबी हैमुफ़्लिस की जोरू सच है कि याँ सब की भाबी हैइज़्ज़त सब उस के दिल की गंवाती है मुफ़्लिसीकैसा ही आदमी हो पर इफ़्लास के तुफ़ैलकोई गधा कहे उसे ठहरा दे कोई बैलकपड़े फटे तमाम बढ़े बाल फैल फैलमुँह ख़ुश्क दाँत ज़र्द बदन पर जमा है मैलसब शक्ल क़ैदियों की बनाती है मुफ़्लिसीहर आन दोस्तों की मोहब्बत घटाती हैजो आश्ना हैं उन की तो उल्फ़त घटाती हैअपने की मेहर ग़ैर की चाहत घटाती हैशर्म-ओ-हया ओ इज़्ज़त-ओ-हुर्मत घटाती हैहाँ नाख़ुन और बाल बढ़ाती है मुफ़्लिसीजब मुफ़्लिसी हुई तो शराफ़त कहाँ रहीवो क़द्र ज़ात की वो नजाबत कहाँ रहीकपड़े फटे तो लोगों में इज़्ज़त कहाँ रहीतअ'ज़ीम और तवाज़ो' की बाबत कहाँ रहीमज्लिस की जूतियों पे बिड़ाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस किसी का लड़का जो ले प्यार से उठाबाप उस का देखे हाथ का और पाँव का कड़ाकहता है कोई जूती न लेवे कहीं चुरानट-खट उचक्का चोर दग़ाबाज़ गठ-कटासौ सौ तरह के ऐब लगाती है मुफ़्लिसीरखती नहीं किसी की ये ग़ैरत की आन कोसब ख़ाक में मिलाती है हुर्मत की शान कोसौ मेहनतों में उस की खपाती है जान कोचोरी पे आ के डाले ही मुफ़्लिस के ध्यान कोआख़िर नदान भीक मंगाती है मुफ़्लिसीदुनिया में ले के शाह से ऐ यार ता-फ़क़ीरख़ालिक़ न मुफ़्लिसी में किसी को करे असीरअशराफ़ को बनाती है इक आन में फ़क़ीरक्या क्या मैं मुफ़्लिसी की ख़राबी कहूँ 'नज़ीर'वो जाने जिस के दिल को जलाती है मुफ़्लिसी
तेरे होंटों से बहती हुई ये हँसीदो-जहानों पे नाफ़िज़ न होने का बाइसतिरे हाथ हैंजिन को तू ने हमेशा लबों पर रखा मुस्कुराते हुएतू नहीं जानतीनींद की गोलियाँ क्यों बनाई गईंलोग क्यों रात को उठ के रोते हैं सोते नहींतू ने अब तक कोई शब अगर जागते भी गुज़ारीतो वो बार्बी नाईट थीतुझ को कैसे बताऊँकि तेरी सदा के त'आक़ुब मेंमैं कैसे दरियाओं सहराओं और जंगलों से गुज़रता हुआएक ऐसी जगह जा गिरा थाजहाँ पेड़ का सूखना 'आम सी बात थीजहाँ उन चराग़ों को जलने की उजरत नहीं मिल रही थीजहाँ लड़कियों के बदन सिर्फ़ ख़ुशबू बनाने के काम आते थेजहाँ एक मा'सूम बच्चा परिंदे पकड़ने के सारे हुनर जानता थामुझ को मा'लूम थातेरा ऐसे जहाँ ऐसी दुनिया से कोई त'अल्लुक़ नहींतू नहीं जानतीकितनी आँखें तुझे देखते देखते बुझ गईंकितने कुर्ते तिरे हाथ से इस्त्री हो के जलने की ख़्वाहिश में खूँटी से लटके रहेकितने लब तेरे माथे को तरसेकितनी शहराहें इस शौक़ में फट गई हैंकि तू उन के सीने पे पाँव धरेमैं तुझे ढूँडते ढूँढते थक गया हूँअब मुझे तेरी मौजूदगी चाहिएअपने साटन में सहमे हुए सुर्ख़ पैरों को अब मेरे हाथों पे रखमैं ने चखना है इन का नमक
आओ ये सोचें भी क़ातिल हैं तो बेहतर है यहीफिर से हम अपने पुराने ज़हर को अमृत कहेंतू अगर चाहे तो हम इक दूसरे को छोड़ करअपने अपने बे-वफ़ाओं के लिए रोते रहें
अपनी दीवानगी-ए-शौक़ पे हँसता भी हूँ मैंऔर फिर अपने ख़यालात में खो जाता हूँतुझ को अपनाने की हिम्मत है न खो देने का ज़र्फ़कभी हँसते कभी रोते हुए सो जाता हूँ मैं
कभी कभी कोई यादकोई बहुत पुरानी याददिल के दरवाज़े परऐसे दस्तक देती हैशाम को जैसे तारा निकलेसुब्ह को जैसे फूलजैसे धीरे धीरे ज़मीं पररौशनियों का नुज़ूलजैसे रूह की प्यास बुझानेउतरे कोई रसूलजैसे रोते रोते अचानकहँस दे कोई मलूलकभी कभी कोई याद कोई बहुत पुरानी याददिल के दरवाज़े पर ऐसे दस्तक देती है
ज़ियादा पास मत आनामैं वो तह-ख़ाना हूँ जिस मेंशिकस्ता ख़्वाहिशों के अन-गिनत आसेब बस्ते हैंजो आधी शब तो रोते हैं फिर आधी रात हँसते हैंमिरी तारीकियों मेंगुम-शुदा सदियों के गर्द-आलूद ना-आसूदा ख़्वाबों केकई इफ़रीत बस्ते हैंमिरी ख़ुशियों पे रोते हैं मिरे अश्कों पे हँसते हैंमिरे वीरान दिल में रेंगती हैं मकड़ियाँ ग़म कीतमन्नाओं के काले नाग शब-भर सरसराते हैंगुनाहों के जने बिच्छूदमों पर अपने अपने डंक लादेअपने अपने ज़हर के शो'लों में जलते हैंये बिच्छू दुख निगलते और पछतावे उगलते हैं
किसी के ब'अदअपने हाथों की बद-सूरती में खो गई है वोमुझे कहती है 'ताबिश'! तुम ने देखा मेरे हाथों कोबुरे हैं नाँ?अगर ये ख़ूबसूरत थे तो इन में कोई बोसा क्यूँ नहीं ठहरा''अजब लड़की हैपूरे जिस्म से कट कर फ़क़त हाथों में ज़िंदा हैसुराही-दार गर्दन नर्म होंटों तेज़ नज़रों से वो बद-ज़न हैकि इन अपनों ने ही उस को सर-ए-बाज़ार फेंका थाकभी आँखों में डूबीऔर कभी बिस्तर पे सिलवट की तरह उभरीअजब लड़की हैख़ुद को ढूँडती हैअपने हाथों की लकीरों मेंजहाँ वो थी न है, आइंदा भी शायद नहीं होगीवो जब उँगली घुमा कर'फ़ैज़' की नज़्में सुनाती हैतो इस के हाथ से पूरे बदन का दुख झलकता हैवो हँसती है तो उस के हाथ रोते हैंअजब लड़की हैपूरे जिस्म से कट कर फ़क़त हाथों में ज़िंदा हैमुझे कहती है '''ताबिश'! तुम ने देखा मेरे हाथों कोबुरे हैं नाँ''?मैं शायद गिर चुका हूँ अपनी नज़रों सेमैं छुपना चाहता हूँ उस के थैले मेंजहाँ सिगरेट हैं माचिस हैजो उस का हाल माज़ी और मुस्तक़बिल!
मैं जब भी तेरे फ़िराक़ का नौहा लिख के लाऊँसुख़न-शनासों को मेरा तर्ज़-ए-अमल न भाएतिरी मोहब्बत का दर्द हो जिस ग़ज़ल में शामिलकिसी को ऐसी ग़ज़ल न भाएजवाब आएकि जाने वालों को याद करने से कोई भी फ़ाएदा नहीं हैमैं तेरी यादों को गूँध कर अपनी हसरतों मेंतराशता हूँ अगर तिरा दिल-नवाज़ पैकरवो लोग देते हैं मुझ को बुत-परस्ती का ता'नाजुड़े हैं जिन के दिलों में पत्थरवही सनम-गरकरें नसीहत बुतों पे मरने से कोई भी फ़ाएदा नहीं हैमैं ज़िक्र करता हूँ जब वस्ल की रुतों कातो शहर के सारे पारसा मुझ को टोकते हैंख़िलाफ़-ए-अख़्लाक़ जिन के नज़दीक है मोहब्बतवफ़ाओं से मुझ को रोकते हैंकचोकते हैंकि अपनी इज़्ज़त पे नाम धरने से कोई भी फ़ाएदा नहीं हैअगर कभी मैं जुदाइयों का सबब बताऊँतो मेरी नज़्मों से ख़ौफ़ खाने लगें जरीदेसमाज पर एहतिजाज करने का हक़ जो मांगोंकोई ये कह कर ज़बान सी देलिखो क़सीदेकि ख़ुद को यूँ बे-लगाम करने से कोई भी फ़ाएदा नहीं हैइसी लिए तो हबीब मेरेये मेरी ग़ज़लें ये मेरी नज़्मेंजो मैं ने तुझ से बिछड़ के लिखींउन्हें कोई छापता नहीं है
मगर ये ईद का दिन भी तो इक हक़ीक़त हैकि वज्ह-ए-ईद समझना भी इक इबादत हैचलो कि रोते हुओं को हँसा के ईद मनाएँकिसी के दर्द को अपना बना के ईद मनाएँदिलों से अपने अदावत मिटा के ईद मनाएँकिसी के लब पे तबस्सुम सजा के ईद मनाएँ
शिद्दत-ए-फ़ाक़ा से रोते हुए नन्हे बच्चेएक रोटी के निवाले से बहल जाते हैंया सर-ए-शाम ही सो जाते हैं भूके प्यासेमाँ की सूखी हुई छाती को दबा कर मुँह में
जीवन-खेल में हारे लोगोबिछड़े लोगो पियारे लोगोबरखा की लम्बी रातों मेंकमरे की ख़ामोश फ़ज़ा मेंपिछले पहर के सन्नाटे मेंरोते रोते जागने वालेहम लोगों को सो लेने दोऔर सवेरा हो लेने दो
फोड़े फुंसियाँ फूटेंगे तो खुजलाओगेरोते-धोते टें टें करते घर आओगेऊपर से फिर कड़वे तेल की मालिश होगीबारिश बारिश बारिश होगी
कोई अपना मरामेरा अपना मरामेरे आँगन में मातम की सफ़ बिछ गई'औरतें बैन करती रहींबच्चे रोते रहेमैं नहीं रो सका
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