aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "zaaviye"
जहाँ-ज़ादवो हल्ब की कारवाँ-सरा का हौज़, रात वो सुकूतजिस में एक दूसरे से हम-किनार तैरते रहेमुहीत जिस तरह हो दाएरे के गिर्द हल्क़ा-ज़नतमाम रात तैरते रहे थे हमहम एक दूसरे के जिस्म ओ जाँ से लग केतैरते रहे थे एक शाद-काम ख़ौफ़ सेकि जैसे पानी आँसुओं में तैरता रहेहम एक दूसरे से मुतमइन ज़वाल-ए-उम्र के ख़िलाफ़तैरते रहेतू कह उठी 'हसन यहाँ भी खींच लाईजाँ की तिश्नगी तुझे!'(लो अपनी जाँ की तिश्नगी को याद कर रहा था मैंकि मेरा हल्क़ आँसुओं की बे-बहा सख़ावतोंसे शाद-काम हो गया!)मगर ये वहम दिल में तैरने लगा कि हो न होमिरा बदन कहीं हलब के हौज़ ही में रह गयानहीं, मुझे दुई का वाहिमा नहींकि अब भी रब्त-ए-जिस्म-ओ-जाँ का ए'तिबार है मुझेयही वो ए'तिबार थाकि जिस ने मुझ को आप में समो दियामैं सब से पहले 'आप' हूँअगर हमीं हों तू हो और मैं हूँ फिर भी मैंहर एक शय से पहले आप हों!अगर मैं ज़िंदा हूँ तो कैसे आप से दग़ा करूँ?कि तेरे जैसी औरतें, जहाँ-ज़ाद,ऐसी उलझनें हैंजिन को आज तक कोई नहीं 'सुलझ' सकाजो मैं कहूँ के मैं 'सुलझ' सका तो सर-ब-सरफ़रेब अपने आप से!कि औरतों की साख़्त है वो तंज़ अपने-आप परजवाब जिस का हम नहीं(लबीब कौन है? तमाम रात जिस का ज़िक्रतेरे लब पे थावो कौन तेरे गेसुओं को खींचता रहालबों को नोचता रहाजो मैं कभी न कर सकानहीं ये सच है मैं हूँ या लबीब होरक़ीब हो तो किस लिए तिरी ख़ुद-आगही की बे-रिया नशात-ऐ-नाब काजो सद-नवा ओ यक-नवा खिराम-ऐ-सुब्ह की तरहलबीब हर नवा-ऐ-साज़-गार की नफ़ी सही!)मगर हमारा राब्ता विसाल-ए-आब-ओ-गिल नहीं, न था कभीवजूद-ए-आदमी से आब-ओ-गिल सदा बरूँ रहेन हर विसाल-ए-आब-ओ-गिल से कोई जाम या सुबू ही बन सकाजो इन का एक वाहिमा ही बन सके तो बन सके!
मेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजयारे वतनहर आँख के तारे वतनगुल-पोश तेरी वादियाँफ़रहत-निशाँ राहत-रसाँतेरे चमन-ज़ारों पे हैगुलज़ार-ए-जन्नत का गुमाँहर शाख़ फूलों की छड़ीहर नख़्ल-ए-तूबा है यहाँकौसर के चश्मे जा-ब-जातसनीम हर आब-ए-रवाँहर बर्ग रूह-ए-ताज़गीहर फूल जान-ए-गुल्सिताँहर बाग़ बाग़-ए-दिल-कशीहर बाग़ बाग़-ए-बे-ख़िज़ाँदिलकश चरागाहें तिरीढोरों के जिन में कारवाँअंजुम-सिफ़त गुलहा-ए-नौहर तख़्ता-ए-गुल आसमाँनक़्श-ए-सुरय्या जा-ब-जाहर हर रविश इक कहकशाँतेरी बहारें दाइमीतेरी बहारें जावेदाँतुझ में है रूह-ए-ज़िंदगीपैहम रवाँ पैहम दवाँदरिया वो तेरे तुंद-ख़ूझीलें वो तेरी बे-कराँशाम-ए-अवध के लब पे हैहुस्न-ए-अज़ल की दास्ताँकहती है राज़-ए-सरमदीसुब्ह-ए-बनारस की ज़बाँउड़ता है हफ़्त-अफ़्लाक परउन कार-ख़ानों का धुआँजिन में हैं लाखों मेहनतीसनअत-गरी के पासबाँतेरी बनारस की ज़रीरश्क-ए-हरीर-ओ-परनियाँबीदर की फ़नकारी में हैंसनअत की सब बारीकियाँअज़्मत तिरे इक़बाल कीतेरे पहाड़ों से अयाँदरियाओं का पानी, तरीतक़्दीस का अंदाज़ा-दाँक्या 'भारतेंदु' ने कियागंगा की लहरों का बयाँ'इक़बाल' और चकबस्त हैंअज़्मत के तेरी नग़्मा-ख़्वाँ'जोश' ओ 'फ़िराक़' ओ 'पंत' हैंतेरे अदब के तर्जुमाँ'तुलसी' ओ 'ख़ुसरव' हैं तेरीतारीफ़ में रत्ब-उल-लिसाँगाते हैं नग़्मा मिल के सबऊँचा रहे तेरा निशाँमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजियारे वतनहर आँख के तारे वतनतेरे नज़ारों के नगींदुनिया की ख़ातम में नहींसारे जहाँ में मुंतख़बकश्मीर की अर्ज़-ए-हसींफ़ितरत का रंगीं मोजज़ाफ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मींफ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मींहाँ हाँ हमीं अस्त ओ हमींसरसब्ज़ जिस के दश्त हैंजिस के जबल हैं सुर्मगींमेवे ब-कसरत हैं जहाँशीरीं मिसाल-ए-अंग्बींहर ज़ाफ़राँ के फूल मेंअक्स-ए-जमाल-ए-हूरईंवो मालवे की चाँदनीगुम जिस में हों दुनिया-ओ-दींइस ख़ित्ता-ए-नैरंग मेंहर इक फ़ज़ा हुस्न-आफ़रींहर शय में हुस्न-ए-ज़िंदगीदिलकश मकाँ दिलकश ज़मींहर मर्द मर्द-ए-ख़ूब-रूहर एक औरत नाज़नींवो ताज की ख़ुश-पैकरीहर ज़ाविए से दिल-नशींसनअत-गरों के दौर कीइक यादगार-ए-मरमरींहोती है जो हर शाम कोफ़ैज़-ए-शफ़क़ से अहमरींदरिया की मौजों से अलगया इक बत-ए-नज़्ज़ारा-बींया ताएर-ए-नूरी कोईपर्वाज़ करने के क़रींया अहल-ए-दुनिया से अलगइक आबिद-ए-उज़्लत-गुज़ीनक़्श-ए-अजंता की क़समजचता नहीं अर्ज़ंग-ए-चींशान-ए-एलोरा देख करझुकती है आज़र की जबींचित्तौड़ हो या आगराऐसे नहीं क़िलए कहींबुत-गर हो या नक़्क़ाश होतू सब की अज़्मत का अमींमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनदिलकश तिरे दश्त ओ चमनरंगीं तिरे शहर ओ चमनतेरे जवाँ राना जवाँतेरे हसीं गुल पैरहनइक अंजुमन दुनिया है येतू इस में सद्र-ए-अंजुमनतेरे मुग़न्नी ख़ुश-नवाशाएर तिरे शीरीं-सुख़नहर ज़र्रा इक माह-ए-मुबींहर ख़ार रश्क-ए-नस्तरींग़ुंचा तिरे सहरा का हैइक नाफ़ा-ए-मुश्क-ए-ख़ुतनकंकर हैं तेरे बे-बहापत्थर तिरे लाल-ए-यमनबस्ती से जंगल ख़ूब-तरबाग़ों से हुस्न अफ़रोज़ बनवो मोर वो कब्क-ए-दरीवो चौकड़ी भरते हिरनरंगीं-अदा वो तितलियाँबाँबी में वो नागों के फनवो शेर जिन के नाम सेलरज़े में आए अहरमनखेतों की बरकत से अयाँफ़ैज़ान-ए-रब्ब-ए-ज़ुल-मिननचश्मों के शीरीं आब सेलज़्ज़त-कशाँ काम-ओ-दहनताबिंदा तेरा अहद-ए-नौरौशन तिरा अहद-ए-कुहनकितनों ने तुझ पर कर दियाक़ुर्बान अपना माल धनकितने शहीदों को मिलेतेरे लिए दार-ओ-रसनकितनों को तेरा इश्क़ थाकितनों को थी तेरी लगनतेरे जफ़ा-कश मेहनतीरखते हैं अज़्म-ए-कोहकनतेरे सिपाही सूरमाबे-मिस्ल यक्ता-ए-ज़मन'भीषम' सा जिन में हौसला'अर्जुन' सा जिन में बाँकपनआलिम जो फ़ख़्र-ए-इल्म हैंफ़नकार नाज़ाँ जिन पे फ़न'राय' ओ 'बोस' ओ 'शेरगिल''दिनकर', 'जिगर' 'मैथली-शरण''वलाठोल', 'माहिर', भारती'बच्चन', 'महादेवी', 'सुमन''कृष्णन', 'निराला', 'प्रेम-चंद''टैगोर' ओ 'आज़ाद' ओ 'रमन'मेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनखेती तिरी हर इक हरीदिलकश तिरी ख़ुश-मंज़रीतेरी बिसात-ए-ख़ाक केज़र्रे हैं महर-ओ-मुश्तरीझेलम कावेरी नाग वोगंगा की वो गंगोत्रीवो नर्बदा की तमकनतवो शौकत-ए-गोदावरीपाकीज़गी सरजू की वोजमुना की वो ख़ुश-गाैहरीदुल्लर्बा आब-ए-नील-गूँकश्मीर की नीलम-परीदिलकश पपीहे की सदाकोयल की तानें मद-भरीतीतर का वो हक़ सिर्रहुतूती का वो विर्द-ए-हरीसूफ़ी तिरे हर दौर मेंकरते रहे पैग़म्बरी'चिश्ती' ओ 'नानक' से मिलीफ़क़्र-ओ-ग़िना को बरतरीअदल-ए-जहाँगीरी में थीमुज़्मर रेआया-पर्वरीवो नव-रतन जिन से हुईतहज़ीब-ए-दौर-ए-अकबरीरखते थे अफ़्ग़ान-ओ-मुग़लइक सौलत-ए-अस्कंदरीरानाओं के इक़बाल कीहोती है किस से हम-सरीसावंत वो योद्धा तिरेतेरे जियाले वो जरीनीती विदुर की आज तककरती है तेरी रहबरीअब तक है मशहूर-ए-ज़माँ'चाणक्य' की दानिश-वरीवयास और विश्वामित्र सेमुनियों की शान-ए-क़ैसरीपातंजलि ओ साँख सेऋषियों की हिकमत-पर्वरीबख़्शे तुझे इनआम-ए-नौहर दौर चर्ख़-ए-चम्बरीख़ुश-गाैहरी दे आब कोऔर ख़ाक को ख़ुश-जौहरीज़र्रों को महर-अफ़्शानियाँक़तरों को दरिया-गुस्तरीमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के अजियारे वतनहर आँख के तारे वतनतू रहबर-ए-नौ-ए-बशरतू अम्न का पैग़ाम-बरपाले हैं तू ने गोद मेंसाहिब-ख़िरद साहिब-ए-नज़रअफ़ज़ल-तरीं इन सब में हैबापू का नाम-ए-मो'तबरहर लफ़्ज़ जिस का दिल-नशींहर बात जिस की पुर-असरजिस ने लगाया दहर मेंनारा ये बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तरबे-कार हैं तीर-ओ-सिनाँबे-सूद हैं तेग़-ओ-तबरहिंसा का रस्ता झूट हैहक़ है अहिंसा की डगरदरमाँ है ये हर दर्द काये हर मरज़ का चारा-गरजंगाह-ए-आलम में कोईइस से नहीं बेहतर सिपरकरता हूँ मैं तेरे लिएअब ये दुआ-ए-मुख़्तसररौनक़ पे हों तेरे चमनसरसब्ज़ हों तेरे शजरनख़्ल-ए-उमीद-ए-बेहतरीहर फ़स्ल में हो बारवरकोशिश हो दुनिया में कोईख़ित्ता न हो ज़ेर-ओ-ज़बरतेरा हर इक बासी रहेनेको-सिफ़त नेको-सियरहर ज़न सलीक़ा-मंद होहर मर्द हो साहिब-हुनरजब तक हैं ये अर्ज़ ओ फ़लकजब तक हैं ये शम्स ओ क़मरमेरे वतन, प्यारे वतनराहत के गहवारे वतनहर दिल के उजयारे वतनहर आँख के तारे वतन
लब बयाबाँ, बोसे बे-जाँकौन सी उलझन को सुलझाते हैं हम?जिस्म की ये कार-गाहेंजिन का हैज़म आप बन जाते हैं हम!नीम-शब और शहर-ए-ख़्वाब-आलूदा, हम-साएकि जैसे दुज़्द-ए-शब-गर्दां कोई!शाम से थे हसरतों के बंदा-ए-बे-दाम हमपी रहे थे जाम पर हर जाम हमये समझ कर जुरआ-ए-पिन्हाँ कोईशायद आख़िर इब्तिदा-ए-राज़ का ईमा बने!मतलब आसाँ हर्फ़ बे-मअ'नीतबस्सुम के हिसाबी ज़ाविएमत्न के सब हाशिएजिन से ऐश-ख़ाम के नक़्श-ए-रिया बनते रहे!और आख़िर बोद जिस्मों में सर-ए-मू भी न थाजब दिलों के दरमियाँ हाइल थे संगीं फ़ासलेक़ुर्ब-ए-चश्म-ओ-गोश से हम कौन सी उलझन को सुलझाते रहे!कौन सी उलझन को सुलझाते हैं हम?शाम को जब अपनी ग़म-गाहों से दुज़्दाना निकल आते हैं हम?या ज़वाल-ए-उम्र का देव-ए-सुबुक-पा रू-ब-रूया अना के दस्त ओ पा को वुसअतों की आरज़ूकौन सी उलझन को सुलझाते हैं हम?
छुटपुटे के ग़ुर्फ़े मेंलम्हे अब भी मिलते हैंसुब्ह के धुँदलके मेंफूल अब भी खिलते हैंअब भी कोहसारों परसर-कशीदा हरियालीपत्थरों की दीवारेंतोड़ कर निकलती हैअब भी आब-ज़ारों परकश्तियों की सूरत मेंज़ीस्त की तवानाईज़ाविए बदलती हैअब भी घास के मैदाँशबनमी सितारों सेमेरे ख़ाक-दाँ पर भीआसमाँ सजाते हैंअब भी खेत गंदुम केतेज़ धूप में तप करइस ग़रीब धरती कोज़र-फ़िशाँ बनाते हैंसाए अब भी चलते हैंसूरज अब भी ढलता हैसुब्हें अब भी रौशन हैंरातें अब भी काली हैंज़ेहन अब भी चटयल हैंरूहें अब भी बंजर हैंजिस्म अब भी नंगे हैंहाथ अब भी ख़ाली हैंअब भी सब्ज़ फ़सलों मेंज़िंदगी के रखवालेज़र्द ज़र्द चेहरों परख़ाक ओढ़े रहते हैंअब भी उन की तक़दीरेंमुंक़लिब नहीं होतींमुंक़लिब नहीं होंगीकहने वाले कहते हैंगर्दिशों की रानाईआम ही नहीं होतीअपने रोज़-ए-अव्वल कीशाम ही नहीं होती
हुजूम-ए-नुक़ूश-ए-फ़रावाँ का हंगाममैं याद करता हूँआवाज़ चेहरा हसीं जिस्मसब ज़ाविए दाएरे और क़ौसेंशब-ओ-रोज़रफ़्तार की आग मेंमौज-दर-मौज बहती हुई रागनीदौर की वादियों मेंसर-ए-शामदम तोड़ती रौशनीनग़्मगी रौशनी नग़्मगीतीरगी बेबसी ख़ामुशीरंग-ओ-ख़ुशबू से सरशारसदियों पुरानी ज़मींदूर जाता हुआ कारवाँजिस्म-ए-आवाज़ का वहशी बे-ज़बाँइक जुनूँ एक माकूस बरहम सकूँज़ेर-ओ-बम ज़ेर-ओ-बमइज़्तिराब इज़्तिराबअजनबी मौसमों का जहाँफ़ासलों सरहदों से परेवुसअ'तों में पुर-अफ़्शाँपरिंदों भरा नीलगूँ बे-कराँ नीलगूँ आसमाँ
कल शब अजीब अदा से था इक हुस्न मेहरबाँवो शबनमी गुलाब सी रंगत धुली धुलीशानों पे बे-क़रार वो ज़ुल्फ़ें खुली खुलीहर खत्त-ए-जिस्म पैरहन-ए-चुस्त से अयाँठहरे भी गर निगाह तो ठहरे कहाँ कहाँहर ज़ाविए में हुस्न का इक ताज़ा बाँकपनहर दाएरे में खिलते हुए फूल की फबनआँखों में डोलते हुए नश्शे की कैफ़ियतरू-ए-हसीं पे एक शिकस्ता सी तमकनतहोंटों पे अन-कही सी तमन्ना की लरज़िशेंबाँहों में लम्हा लम्हा सिमटने की काविशेंसीने के जज़्र-ओ-मद में समुंदर सा इज़्तिराबउमडा हुआ सा जज़्बा-ए-बेदार का अज़ाबख़ुश्बू तवाफ़-ए-क़ामत-ए-ज़ेबा किए हुएशीशा बदन का अज़्म-ए-ज़ुलेख़ा लिए हुएफिर यूँ हुआ कि छिड़ गई यूसुफ़ की दास्ताँफिर मैं था और पाकीए-दामन का इम्तिहाँइक साँप भी था आदम ओ हव्वा के दरमियाँ
जाने क्या है मौत, क्या है ज़िंदगीचलते चलते कैसे थम जाती हैं तस्वीरें तमामख़ाक हो जाती है फिर से मुश्त-ए-ख़ाकगाहे गाहे संग हो जाते हैं चेहरों के नुक़ूशअपने अपने ज़ाविए पर मुंजमिददम-ब-ख़ुद रहते हैं महव-ए-इंतिज़ार
मुख़्तलिफ़ हैं आईनों के ज़ाविएएक लेकिन अक्स-ए-ज़ात;इक इकाई पर उसी की ज़र्ब सेकसरत-ए-वहदत का पैदा है तिलिस्मख़ल्वत-ए-आईना-ख़ाना में कहीं कोई नहींसिर्फ़ मैं!मैं ही बुतऔर मैं ही बुत-परस्त!मैं ही बज़्म-ए-ज़ात में रौनक़-अफ़रोज़जल्वा-हा-ए-ज़ात को देता हूँ दाद!
इन्ही गलियों से थी वाबस्ता नई फ़िक्र की रहउन्हीं गलियों में मआ'नी के सबक़ मिलते थेवहशत-ए-दौर-ए-सियासत पे हुआ करती थी बहसऔर क़लम हँसते हुए ज़ाविए बन जाते थे
अन-गिनत ज़ाविए अफ़्कार के ले आते हैंइन खिलौनों से वो अज़हान को बहलाते हैंअपने कर्तब पे वो इठलाते हैं इतराते हैंऔर मौहूम सी तस्कीन यूँही पाते हैं
ब-ज़ोम-ए-ख़्वेश अपने दौर के सुक़रात-ए-सानी हैंमुक़द्दस लोग हैं 'अहमद-रज़ा-ख़ाँ’ की निशानी हैंग़ुलामान-ए-रसूलुल्लाह की तकफ़ीर करते हैंहमेशा इंशिराह-ए-सद्र से तक़रीर करते हैंज़बान-आवर हैं लेकिन ज़ाहिदा परवीन की लय हैंकई नादिर किताबों के मुसन्निफ़ हैं बड़ी शय हैंरऊनत से जबीं में ज़ोह्द के असरार घुलते हैंनिगाहों के ग़ज़ब से सैंकड़ों अल्फ़ाज़ खुलते हैंतकब्बुर ज़ाविए बनता हुआ गुफ़्तार की लौ मेंहज़ारों ख़ुसरुओं का दबदबा रफ़्तार की रो मेंज़बान-ए-शुस्ता-ओ-रफ़्ता पे नस्तालीक़ बोली हैमुसल्ले पर मुरादाबाद के पानों की ढोली हैब-ज़ोम-ए-ख़्वेश ज़ोह्द-ओ-इत्तिक़ा के बीज बोते हैंख़ुदा के फ़ज़्ल से हूरों के शौहर ऐसे होते हैं
वो बकरा फिर अकेला पड़ गया हैकि मिरा हाथ भी डोंगे में अच्छी बोटियों को ढूँडता हैवही बकराखड़ा रक्खा गया है जिस को कोने में निगाहों से छुपा करवो जिस की ज़िंदगी है मुनहसिर इस बात परकि हम खाएँगे कितनाऔर कितना छोड़ देंगे बस यूँ ही अपनी पलेटों मेंअभी कुछ देर पहले मैं खड़ा था पास जिस केऔर जिस के ज़ाविए से देख कर महफ़िल कोआँखें डबडबा आई थीं मेरीमगर वो पल कभी का जा चुका थाकि अब हूँ मेज़ पर मैंऔर मेरा हाथ भी डोंगे में अच्छी बोटियों को ढूँडता हैवो बकरा फिर अकेला पड़ गया है
तुम्हारे हर अमल को हमबड़ी ईमान-दारी से, बड़े इंसाफ़ से रद्द-ए-अमल देंगेतुम्हें ये इल्म होना चाहिएकि आँख के बदले में आँखऔर दिल के बदले दिल हमारा ज़ाबता हैतुम्हारा हुस्न-ए-ज़न हैसोच के हर ज़ाविए से सोचनाकि हम जो पानी पर खड़े हैंकिस पज़ीराई के क़ाबिल हैंमगर कुछ भी करो
मैं गया उस तरफ़जिस तरफ़ नींद थीजिस तरफ़ रात थीबंद मुझ पर हुए सारे दरसारे घरमैं गया उस तरफ़जिस तरफ़ तीर थेजिस तरफ़ घात थीमुझ पे मरकूज़ थी इक निगाह-ए-सियहऔर अजब ज़ाविए सेबनाए हुए थी मुझेसर से पा तक हदफ़मैं गया उस तरफ़जिस तरफ़ रेत की लहर थीमौज-ए-ज़र्रात थीमैं नहीं जानताउस घड़ीतीरगी के तिलिस्मात मेंजो इशारा हुआकिस की उँगली का थाऔर जो खोली गई थी मिरे क़ल्ब परकौन सी बात थीसिर्फ़ इतना मुझे याद हैजब मैं आगे बढ़ाएक ज़ंजीर-ए-गिर्या मिरे साथ थी
बाँस की कोंपलों की तरह रात की रात बढ़ती हुई लड़कियोआइने के हर इक ज़ाविए से उलझती हुई लड़कियोतश्त-ए-सीमाब झलकाती झुकती हुई लड़कियोनित-नए मौसमों की तरह मुझ पे बीती हुई लड़कियोमेरे होने को तस्लीम कर लो तो आगे बढ़ींख़्वाब-दर-ख़्वाब बस एक ही ख़्वाब हैमेरे होने का ख़्वाबभागते रास्तों में कोई संग रफ़्तार-पैमा बता देकि मैं चल रहा थाभीड़ में चलते चलते अचानक कोई मुझ को कहनी से आगे बढ़ा देकि मैं रहनुमा थाकोई फ़न की देवीसुरय्या से उतरेमुझे अपने अंदर समो लेकोई मेरी आँखों में चुभते हुए ज़र्रा-ए-रेग के वास्तेअपने आँचल का कोना भिगो लेमुझे रिश्ता-ए-जिस्म-ओ-जाँ में पिरो लेकोई बस घड़ी-दो-घड़ी साथ हो लेया मुझे क़ुल्ज़ुम-ए-ख़ुद-फ़रामोशी-ए-मावरा में डुबो लेख़्वाब-दर-ख़्वाब बस एक ही ख़्वाब हैमेरे होने का ख़्वाबसाँवली लड़कियो चम्पई लड़कियो नित-नई लड़कियोमेरे होने को तस्लीम कर लो तो आगे बढ़ेंकौन जाने दरख़्तों के पीछे नई ख़ुशबुएँरास्ते भर हमारा स्वागत करेंकौन जाने कि आहट से डरती हुई फड़फड़ाती हुई फ़ाख़ताएँहमारे सुरों पर सिपर तान देंऔर हम सरसराते हुए आँचलों की हुआ ओढ़ कर सो रहेंया मिरी जान-ए-जाँकौन जाने कि आते दिनों में किसी रोज़ अंधी सड़क परकिसी चीख़ते भौंकते काले कुत्ते से डरते हुएहम अचानक कहीं आ मिलेंअजनबी रास्तों की तरफ़ चल पड़ेंज़ेहन में ख़्वाब का सिलसिला फैलता होआँख में नींद का ज़ाइक़ा तैरता हो
हर रंग में ख़ूबसूरतहर ढंग में बे-मिसालतुम मुझे रंग ज़ाविएक़द काठ से मत मापोमेरे दिमाग़ के रू-ब-रू आओमैं तुम्हारे बराबर नहींतुम से बेहतर हूँमैं औरत हूँ
मैं ने दुख नहीं देखामैं ने कुछ नहीं देखामैं ने सुख नहीं देखामैं ने कुछ नहीं देखादुनिया मेरी हथेली से बाहर क्या रही होगी मैं ने देखाज़मीन पर शायद सैलाब आया थामैं ने देखा कि धूप चौंकीऔर भाग कर दरख़्तों की चोटियों पर चढ़ गई उस का रंग फ़क़ थाऔर उस की उम्र तेरह बरस से ज़ियादा न थीसैलाब ने उस के पाँव छू लिए उसे फिर भी यक़ीन नहीं आयाजैसे कह रही होजाओ मुझे अपने यक़ीनी पर कभी यक़ीन नहीं आयाबे-ईमान आदमी की तरहमैं बे-यक़ीन हूँये लोग कहानी सुनाते सुनाते रुक जाते हैंऔर ख़ामोशी को सुनाते सुनाते रुक जाते हैंजैसे तीर-ए-आरज़ू हवा और परिंदा छिदे हुए तिरछे ज़ाविए बना करज़न से गुज़र गए होंऔर जैसे उन सब को एक नज़र में सब ने देख लिया होजिन समुंदरों पर ये परिंदे गिरेंगेवहाँ बहुत शोर होगाऔर लोग कहानियों को अमानत कर के दरिया में बहा देते होंगेये लोग तम्बाकू के पत्तों में अपने दिल लपेट कर बो देते होंगे
और बिसात-ए-ख़याल बे-पायाँऔर मुअय्यन हदूद-ए-शरह-ओ-बयांतेज़-रफ़्तार गर्दिश-ए-हालातऔर आहिस्तगी-ए-उम्र रवाँअज्नबिय्यत का मुस्तक़िल इक बोझऔर शनासाइयों का बार-ए-गिराँअक़्ल की ख़ामी नारसी दिल कीऔर तसव्वुर-शिकन हक़ीक़त-ए-जाँमुख़्तलिफ़ हर वजूद पेश-ए-नज़रऔर इम्कान-ए-वहदत-ए-इम्काँफ़िक्र उक़दा-कुशाइयों पे मुसिरऔर सर-रिश्ते ही का ख़ुद फ़ुक़दाँइंतिहा सिलसिलों की ना-मालूमऔर हर लम्हा सिलसिला-ए-जुम्बाँमुतवातिर मराहिल-ए-तालीमऔर मुसलसल मदारिज-ए-निस्याँशोबा-हाय-ए-ख़्याल बे-तमईज़और बहर-ए-शनाख़्त मोहर-ओ-निशाँचार जानिब सराहतों का हुजूमऔर बहर-ए-रुमूज़ बे-पायाँसैल-ए-बैरूं रवाँ ब-तर्ज़-ए-दिगरऔर जू-ए-अंदरूँ अलग सी रवाँएक खोई हुई फ़ज़ाए-हयातऔर एहसास-ओ-फ़िक्र सब ग़लताँऔर साँसों की रहगुज़र पे हुजूमऔर आँखों की रहगुज़र वीराँ
तुम्हारे बा'द क्या हुआतुम्हें तो कुछ ख़बर नहींग़मों ने ज़िंदगी के सारे ज़ाविए बदल दिएमिरी तमाम ख़्वाहिशों के हौसले कुचल दिएमिरी तो सारी 'उम्र ही इसी में कट के रह गईउदासियों की भीड़ मेंसफ़र की तेज़ धूप मेंख़ुशी की कोई बज़्म हो कि ग़म का सिलसिला कहींमैं हर जगह तुम्हें फ़क़त तुम्हें तलाशता रहामगर न जाने क्या हुआमैं थक गयामैं थक गया तुम्हारे नक़्श-ए-पा तलाशते हुएमैं थक गया हूँ इस बदन में जान डालते हुएये सोचता हूँज़िंदगी के बोझ को मैं अब नहीं उठाऊँगाभले तुम्हें ख़बर न होमैं तुम को भूल जाऊँगा
तेरे हाथों में पैवस्तमेख़ों से बहता लहूकोर आँखों पे छिड़कातो पलकों की चिलमन सेता-हद्द-ए-इम्काँबसारत के हर ज़ाविए परअजब नूर की धारियाँतह-ब-तह तीरगी की रवा चीरतीअन-गिनत मिशअलेंआगही के दरीचों मेंइरफ़ान के आईनों मेंदमकने लगीं
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