हिंदी शायरी में जज़्बात की वैज्ञानिक तक़सीम: 'नवरस' का कमाल
हिंदी इल्म-ए-बदीअ (अलंकार शास्त्र) में इंसानी जज़्बात और एहसासात को नौ (9) क़िस्मों में बाँटा गया है, जिसे अल्लामा शिबली अरबी और फ़ारसी के मुक़ाबले में ज़्यादा वैज्ञानिक मानते हैं।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
हिंदी इल्म-ए-बदीअ (अलंकार शास्त्र) में इंसानी जज़्बात और एहसासात को नौ (9) क़िस्मों में बाँटा गया है, जिसे अल्लामा शिबली अरबी और फ़ारसी के मुक़ाबले में ज़्यादा वैज्ञानिक मानते हैं।
शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी उन आलोचकों का सख़्ती से खंडन करते हैं जो मीर की ग़ज़लों को उनकी आत्मकथा या अठारहवीं सदी के सामाजिक हालात का सीधा-सीधा अक्स मानते हैं।
जोश मलीहाबादी जैसे आधुनिक शायरों ने क्लासिकी (शास्त्रीय) शायरी के उसूलों से अनजान होने के कारण अपनी शायरी में शब्दों के बेमेलपन और बेवजह तकरार (दोहराव) जैसी कमियाँ पैदा कीं।
नई तनक़ीद (आलोचना) ने ईहाम और रियायत को अक्सर 'लफ़्ज़ी बाज़ीगरी' कह कर ख़ारिज किया है, लेकिन अस्ल में यह ज़बान की संभावनाओं और अर्थ की गहराइयों को खोजने की एक महान कला है।
मिर्ज़ा ग़ालिब की याददाश्त और सुख़न-फ़हमी बेमिसाल थी। वह बिना किसी निजी कुतुब-ख़ाने (पुस्तकालय) के, सिर्फ़ अपनी तेज़ याददाश्त और आलोचनात्मक सूझ-बूझ के बल-बूते पर इल्म और अदब (ज्ञान और साहित्य) के मोती बिखेरते थे।
मीर तक़ी मीर को 'ख़ुदा-ए-सुख़न' क्यों कहा जाता है? यह ख़िताब महज़ एक तारीफ़ नहीं है, बल्कि शायरी की तमाम अस्नाफ़ (विधाओं ) पर मीर की मुकम्मल महारत का सुबूत है।
ग़ालिब की शायरी को आमतौर पर 'मुश्किल' कहा जाता है, लेकिन आलोचनात्मक नज़र से देखें तो यह इश्काल (कठिनाई) नहीं बल्कि 'इबहाम' (अस्पष्टता) है, जो शेर की कमी नहीं बल्कि उसकी सबसे बड़ी ख़ूबी है।