दर्द पर नअत
दर्द और तकलीफ़ ज़िन्दगी
ही नहीं शायरी का भी बहुत अहम हिस्सा है। अपनों से मिलने वाले दर्द तो शायरों ने ता-उम्र कलेजे से लगाए रखने की जैसे क़सम खा रखी है यहाँ तक कि कई तो इस दर्द का इलाज कराने तक को तैयार नहीं। दर्द की कायनात इतनी फैली हुई है कि उर्दू शायरी अपनी इब्तिदा से लेकर आज तक इसके बयान में मसरूफ़ है। दर्द शायरी की इसी बे-दर्द दुनिया की सैर करने चलते हैं रेख़्ता के इस इन्तिख़ाब के साथः