मशवरा शायरी

यहाँ हम इन अशआर का इन्तिख़ाब पेश कर रहे हैं जो ज़िंदगी करने की अलग अलग सूरतों में आपकी रहनुमाई करेंगे। ये मशवरे आम क़िस्म के मश्वरे नहीं हैं बल्कि ज़िंदगी की बुनियादी हक़ीक़तों और सच्चाइयों का शुऊर हासिल करने के बाद सामने आने वाले तजुर्बात हैं। आप इन्हें पढ़िए और ज़िंदगी के एक सबक़ के तौर पर इन्हें अख़ज़ कीजिए।


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अदब को जिंस-ए-बाज़ारी करना


ग़ज़ल के साथ बदकारी करना

'ज़ौक़' तकल्लुफ़ में है तकलीफ़ सरासर


आराम में है वो जो तकल्लुफ़ नहीं करता

अपने मन में डूब कर पा जा सुराग़-ए-ज़ि़ंदगी


तू अगर मेरा नहीं बनता बन अपना तो बन

इस से पहले कि लोग पहचानें


ख़ुद को पहचान लो तो बेहतर है

इतना अपने जामे से बाहर निकल के चल


दुनिया है चल-चलाव का रस्ता सँभल के चल

इतनी काविश भी कर मेरी असीरी के लिए


तू कहीं मेरा गिरफ़्तार समझा जाए

कभी भूल कर किसी से करो सुलूक ऐसा


कि जो तुम से कोई करता तुम्हें नागवार होता

कहाँ के रुकने थे रास्ते कहाँ मोड़ था उसे भूल जा


वो जो मिल गया उसे याद रख जो नहीं मिला उसे भूल जा

खींचो कमानों को तलवार निकालो


जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो

ख़ुदा ने नेक सूरत दी तो सीखो नेक बातें भी


बुरे होते हो अच्छे हो के ये क्या बद-ज़बानी है

ज़ख़्म जो तू ने दिए तुझ को दिखा तो दूँ मगर


पास तेरे भी नसीहत के सिवा है और क्या

ज़िंदगी यूँही बहुत कम है मोहब्बत के लिए


रूठ कर वक़्त गँवाने की ज़रूरत क्या है

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