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मशवरा पर शेर

यहाँ हम इन अशआर का इन्तिख़ाब

पेश कर रहे हैं जो ज़िंदगी करने की अलग अलग सूरतों में आपकी रहनुमाई करेंगे। ये मशवरे आम क़िस्म के मश्वरे नहीं हैं बल्कि ज़िंदगी की बुनियादी हक़ीक़तों और सच्चाइयों का शुऊर हासिल करने के बाद सामने आने वाले तजुर्बात हैं। आप इन्हें पढ़िए और ज़िंदगी के एक सबक़ के तौर पर इन्हें अख़ज़ कीजिए।

वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना हो मुमकिन

उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा

साहिर लुधियानवी

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर

लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया

मजरूह सुल्तानपुरी

अपने मन में डूब कर पा जा सुराग़-ए-ज़ि़ंदगी

तू अगर मेरा नहीं बनता बन अपना तो बन

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर कहता है कि जीवन का अर्थ बाहर नहीं, अपने भीतर झाँकने से मिलता है। “डूबना” अपने मन की गहराई में उतरने का रूपक है, जहाँ असली पहचान और दिशा मिलती है। दूसरे मिसरे में संदेश है कि किसी के पीछे चलने से बेहतर है खुद का होना—स्वतंत्र और जागरूक। भाव आत्मजागरण और स्वत्व का है।

अल्लामा इक़बाल

तिरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन

तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था

EXPLANATION #1

यह शे’र इसरार-उल-हक़ मजाज़ के मशहूर अशआर में से एक है। माथे पे आँचल होने के कई मायने हैं। उदाहरण के लिए शर्म लाज का होना, मूल्यों का रख रखाव होना आदि और भारतीय समाज में इन चीज़ों को नारी का शृंगार समझा जाता है। मगर जब नारी के इस शृंगार को पुरुष सत्तात्मक समाज में नारी की कमज़ोरी समझा जाता है तो नारी का व्यक्तित्व संकट में पड़ जाता है। इसी तथ्य को शायर ने अपने शे’र का विषय बनाया है। शायर नारी को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि यद्यपि तुम्हारे माथे पर शर्म हया का आँचल ख़ूब लगता है मगर उसे अपनी कमज़ोरी मत बना। वक़्त का तक़ाज़ा है कि आप अपने इस आँचल से क्रांति का झंडा बनाएं और इस ध्वज को अपने अधिकारों के लिए उठाएं।

शफ़क़ सुपुरी

असरार-उल-हक़ मजाज़

वतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली है

तिरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में

Interpretation: Rekhta AI

अल्लामा इक़बाल इस शेर में लापरवाह व्यक्ति/कौम को चेताते हैं कि देश के बारे में जागरूक हुए तो बड़ा संकट पास है। “आसमानों में मशवरे” का अर्थ है कि बड़े हालात, ताक़तें या किस्मत की चाल पहले से खिलाफ़ दिशा ले चुकी है। भाव का केंद्र तात्कालिक चेतावनी और जिम्मेदारी का अहसास है।

अल्लामा इक़बाल

तमन्ना दर्द-ए-दिल की हो तो कर ख़िदमत फ़क़ीरों की

नहीं मिलता ये गौहर बादशाहों के ख़ज़ीनों में

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ इक़बाल कहते हैं कि असली संपदा बाहर नहीं, भीतर बनती है। “हृदय-पीड़ा” का अर्थ केवल दुख नहीं, बल्कि वह गहरी संवेदना है जो दूसरों की तकलीफ़ से जुड़कर जन्म लेती है। गरीबों की सेवा से यह संवेदना एक “रत्न” की तरह मिलती है, जबकि राजसी धन इसे खरीद नहीं सकता।

अल्लामा इक़बाल

दुश्मनी लाख सही ख़त्म कीजे रिश्ता

दिल मिले या मिले हाथ मिलाते रहिए

निदा फ़ाज़ली

हयात ले के चलो काएनात ले के चलो

चलो तो सारे ज़माने को साथ ले के चलो

मख़दूम मुहिउद्दीन

खींचो कमानों को तलवार निकालो

जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो

अकबर इलाहाबादी

बारे दुनिया में रहो ग़म-ज़दा या शाद रहो

ऐसा कुछ कर के चलो याँ कि बहुत याद रहो

Interpretation: Rekhta AI

मीर तक़ी मीर कहते हैं कि जीवन में दुख और सुख दोनों आते-जाते रहते हैं, पर असली बात यह है कि इंसान ऐसा काम करे जो उसे यादगार बना दे। “यहाँ से चलो” जीवन-यात्रा के अंत का संकेत है। भाव यह है कि क्षणिक भावनाओं से ऊपर उठकर अर्थपूर्ण कर्म करो, ताकि तुम्हारी छाप बनी रहे।

मीर तक़ी मीर

ज़िंदगी यूँही बहुत कम है मोहब्बत के लिए

रूठ कर वक़्त गँवाने की ज़रूरत क्या है

अज्ञात

'ज़ौक़' तकल्लुफ़ में है तकलीफ़ सरासर

आराम में है वो जो तकल्लुफ़ नहीं करता

Interpretation: Rekhta AI

शायर का कहना है कि दुनियादारी और बनावटी शिष्टाचार निभाने में इंसान को सिवाय परेशानी के कुछ हासिल नहीं होता। सच्चा सुख उसी व्यक्ति को मिलता है जो सादगी से जीता है और झूठे दिखावे या औपचारिकताओं के बोझ से खुद को आज़ाद रखता है।

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

भँवर से लड़ो तुंद लहरों से उलझो

कहाँ तक चलोगे किनारे किनारे

रज़ा हमदानी

बिछड़ने का इरादा है तो मुझ से मशवरा कर लो

मोहब्बत में कोई भी फ़ैसला ज़ाती नहीं होता

अफ़ज़ल ख़ान

साया है कम खजूर के ऊँचे दरख़्त का

उम्मीद बाँधिए बड़े आदमी के साथ

कैफ़ भोपाली

कहाँ के रुकने थे रास्ते कहाँ मोड़ था उसे भूल जा

वो जो मिल गया उसे याद रख जो नहीं मिला उसे भूल जा

अमजद इस्लाम अमजद

दुनिया तो चाहती है यूँही फ़ासले रहें

दुनिया के मश्वरों पे जा उस गली में चल

हबीब जालिब

दिलों में हुब्ब-ए-वतन है अगर तो एक रहो

निखारना ये चमन है अगर तो एक रहो

जाफ़र मलीहाबादी

पैदा वो बात कर कि तुझे रोएँ दूसरे

रोना ख़ुद अपने हाल पे ये ज़ार ज़ार क्या

मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी

हाँ समुंदर में उतर लेकिन उभरने की भी सोच

डूबने से पहले गहराई का अंदाज़ा लगा

अर्श सिद्दीक़ी

बात का ज़ख़्म है तलवार के ज़ख़्मों से सिवा

कीजिए क़त्ल मगर मुँह से कुछ इरशाद हो

Interpretation: Rekhta AI

दाग़ देहलवी शारीरिक चोट और मन की चोट का अंतर दिखाते हैं। तलवार का घाव दिखाई देता है, पर शब्दों का घाव भीतर तक उतरकर लंबे समय तक दर्द देता रहता है। इसलिए वक्ता कहता है कि अत्याचार कर लो, लेकिन ताने और कठोर वचन बोलो। भावनात्मक केंद्र अपमान का डर और कड़वे शब्दों की गहरी चुभन है।

दाग़ देहलवी

इस से पहले कि लोग पहचानें

ख़ुद को पहचान लो तो बेहतर है

दिवाकर राही

बद-तर है मौत से भी ग़ुलामी की ज़िंदगी

मर जाइयो मगर ये गवारा कीजियो

हफ़ीज़ मेरठी

फ़राग़त से दुनिया में हर दम बैठो

अगर चाहते हो फ़राग़त ज़ियादा

अल्ताफ़ हुसैन हाली

कभी भूल कर किसी से करो सुलूक ऐसा

कि जो तुम से कोई करता तुम्हें नागवार होता

इस्माइल मेरठी

इतना अपने जामे से बाहर निकल के चल

दुनिया है चल-चलाव का रस्ता सँभल के चल

Interpretation: Rekhta AI

बहादुर शाह ज़फ़र इस शेर में संयम और विनम्रता का संदेश देते हैं। “जामे से बाहर” का मतलब है अपनी सीमा और मर्यादा को तोड़कर आगे बढ़ना। दुनिया को “चल-चलाव” की राह कहकर जीवन की नश्वरता और जल्दी बीत जाने का बोध कराया गया है, इसलिए कदम सोच-समझकर रखने की बात है।

बहादुर शाह ज़फ़र

ख़ुदा ने नेक सूरत दी तो सीखो नेक बातें भी

बुरे होते हो अच्छे हो के ये क्या बद-ज़बानी है

अमीर मीनाई

फ़ुर्सत-ए-कार फ़क़त चार घड़ी है यारो

ये सोचो की अभी उम्र पड़ी है यारो

जाँ निसार अख़्तर

इतनी काविश भी कर मेरी असीरी के लिए

तू कहीं मेरा गिरफ़्तार समझा जाए

सलीम अहमद

मेरी ही जान के दुश्मन हैं नसीहत वाले

मुझ को समझाते हैं उन को नहीं समझाते हैं

लाला माधव राम जौहर

ज़ख़्म जो तू ने दिए तुझ को दिखा तो दूँ मगर

पास तेरे भी नसीहत के सिवा है और क्या

इरफ़ान अहमद

मय-कशो आगे बढ़ो तिश्ना-लबो आगे बढ़ो

अपना हक़ माँगा नहीं जाता है छीना जाए है

कैफ़ भोपाली

देख रह जाए तू ख़्वाहिश के गुम्बद में असीर

घर बनाता है तो सब से पहले दरवाज़ा लगा

अर्श सिद्दीक़ी

गिर्द-ओ-पेश से इस दर्जा बे-नियाज़ गुज़र

जो बे-ख़बर से हैं सब की ख़बर भी रखते हैं

दिल अय्यूबी

मज़रा-ए-दुनिया में दाना है तो डर कर हाथ डाल

एक दिन देना है तुझ को दाने दाने का हिसाब

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
बोलिए