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अफ़ज़ल ख़ान

1975 - | बहावलपुर, पाकिस्तान

ग़ज़ल 13

शेर 34

इक वडेरा कुछ मवेशी ले के बैठा है यहाँ

गाँव की जितनी भी आबादी है आबादी नहीं

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ज़रा ये दूसरा मिस्रा दुरुस्त फ़रमाएँ

मिरे मकान पे लिक्खा है घर बराए-फ़रोख़्त

छोड़ कर मुझ को तिरे सहन मैं जा बैठा है

पड़ गई जैसे तिरे साया-ए-दीवार मैं जान

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