इंसान शायरी

इंसान को सृष्टि की रचना का केंद्र बिंदु कहा गया है । साहित्य और शाइरी में भी इंसान को अहमियत हासिल है । अब उस का तौर-तरीक़ा हो, व्यवहार हो, उस की कमज़ोरियाँ हों, अच्छाई हो बुराई हो उर्दू शाइरी में इंसान का पूरा अस्तित्व विषय के तौर पर मौजूद है । यहाँ प्रस्तुत शाइरी में इंसान और उस के अस्तित्व के कई हवाले पेश किए गए हैं । आप इस संकलन को पढ़िए और उर्दू शाइरी के रंग-ओ-रूप में इंसान की कहानी से लुत्फ़ हासिल कीजिए ।

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी

जिस को भी देखना हो कई बार देखना

निदा फ़ाज़ली

सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं

जिस को देखा ही नहीं उस को ख़ुदा कहते हैं

सुदर्शन फ़ाख़िर

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना

आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना

Tis difficult that every goal be easily complete

For a man, too, to be human, is no easy feat

Tis difficult that every goal be easily complete

For a man, too, to be human, is no easy feat

मिर्ज़ा ग़ालिब

ख़ुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते हैं

फिर भी लोग ख़ुदाओं जैसी बातें करते हैं

इफ़्तिख़ार आरिफ़

बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमाँ जो बस गए

इंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए

कैफ़ी आज़मी

घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे

बहुत तलाश किया कोई आदमी मिला

बशीर बद्र

कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है

सब ने इंसान बनने की क़सम खाई है

निदा फ़ाज़ली

इसी लिए तो यहाँ अब भी अजनबी हूँ मैं

तमाम लोग फ़रिश्ते हैं आदमी हूँ मैं

बशीर बद्र

मिरी ज़बान के मौसम बदलते रहते हैं

मैं आदमी हूँ मिरा ए'तिबार मत करना

आसिम वास्ती

आसमान तेरे ख़ुदा का नहीं है ख़ौफ़

डरते हैं ज़मीन तिरे आदमी से हम

O heavens I do not fear your God above you know

I am afraid O Earth, of your human beings below

O heavens I do not fear your God above you know

I am afraid O Earth, of your human beings below

अज्ञात

फ़रिश्ते से बढ़ कर है इंसान बनना

मगर इस में लगती है मेहनत ज़ियादा

अल्ताफ़ हुसैन हाली

उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा

वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा

निदा फ़ाज़ली

आदमी आदमी से मिलता है

दिल मगर कम किसी से मिलता है

जिगर मुरादाबादी

गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया

होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया

निदा फ़ाज़ली

'ज़फ़र' आदमी उस को जानिएगा वो हो कैसा ही साहब-ए-फ़हम-ओ-ज़का

जिसे ऐश में याद-ए-ख़ुदा रही जिसे तैश में ख़ौफ़-ए-ख़ुदा रहा

बहादुर शाह ज़फ़र

सब से पुर-अम्न वाक़िआ ये है

आदमी आदमी को भूल गया

जौन एलिया

आदमिय्यत और शय है इल्म है कुछ और शय

कितना तोते को पढ़ाया पर वो हैवाँ ही रहा

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

जानवर आदमी फ़रिश्ता ख़ुदा

आदमी की हैं सैकड़ों क़िस्में

अल्ताफ़ हुसैन हाली

साया है कम खजूर के ऊँचे दरख़्त का

उम्मीद बाँधिए बड़े आदमी के साथ

कैफ़ भोपाली

हज़ार चेहरे हैं मौजूद आदमी ग़ाएब

ये किस ख़राबे में दुनिया ने ला के छोड़ दिया

शहज़ाद अहमद

देवताओं का ख़ुदा से होगा काम

आदमी को आदमी दरकार है

फ़िराक़ गोरखपुरी

फूल कर ले निबाह काँटों से

आदमी ही आदमी से मिले

ख़ुमार बाराबंकवी

आदमी के पास सब कुछ है मगर

एक तन्हा आदमिय्यत ही नहीं

जिगर मुरादाबादी

भीड़ तन्हाइयों का मेला है

आदमी आदमी अकेला है

सबा अकबराबादी

बुरा बुरे के अलावा भला भी होता है

हर आदमी में कोई दूसरा भी होता है

अनवर शऊर

ज़मीं ने ख़ून उगला आसमाँ ने आग बरसाई

जब इंसानों के दिल बदले तो इंसानों पे क्या गुज़री

साहिर लुधियानवी

इस दौर में इंसान का चेहरा नहीं मिलता

कब से मैं नक़ाबों की तहें खोल रहा हूँ

मुग़ीसुद्दीन फ़रीदी

मेरी रुस्वाई के अस्बाब हैं मेरे अंदर

आदमी हूँ सो बहुत ख़्वाब हैं मेरे अंदर

असअ'द बदायुनी

फ़रिश्ता है तो तक़द्दुस तुझे मुबारक हो

हम आदमी हैं तो ऐब-ओ-हुनर भी रखते हैं

दिल अय्यूबी

वो जंगलों में दरख़्तों पे कूदते फिरना

बुरा बहुत था मगर आज से तो बेहतर था

मोहम्मद अल्वी

बहुत हैं सज्दा-गाहें पर दर-ए-जानाँ नहीं मिलता

हज़ारों देवता हैं हर तरफ़ इंसाँ नहीं मिलता

ख़ालिद हसन क़ादिरी

आदमी का आदमी हर हाल में हमदर्द हो

इक तवज्जोह चाहिए इंसाँ को इंसाँ की तरफ़

हफ़ीज़ जौनपुरी

देवता बनने की हसरत में मुअल्लक़ हो गए

अब ज़रा नीचे उतरिए आदमी बन जाइए

सलीम अहमद

कुफ़्र इस्लाम की कुछ क़ैद नहीं 'आतिश'

शैख़ हो या कि बरहमन हो पर इंसाँ होवे

हैदर अली आतिश

आदमी क्या वो समझे जो सुख़न की क़द्र को

नुत्क़ ने हैवाँ से मुश्त-ए-ख़ाक को इंसाँ किया

हैदर अली आतिश

बनाया 'ज़फ़र' ख़ालिक़ ने कब इंसान से बेहतर

मलक को देव को जिन को परी को हूर ग़िल्माँ को

बहादुर शाह ज़फ़र

क्या तिरे शहर के इंसान हैं पत्थर की तरह

कोई नग़्मा कोई पायल कोई झंकार नहीं

कामिल बहज़ादी

तो मैं हूर का मफ़्तूँ परी का आशिक़

ख़ाक के पुतले का है ख़ाक का पुतला आशिक़

पीर शेर मोहम्मद आजिज़

रूप रंग मिलता है ख़द्द-ओ-ख़ाल मिलते हैं

आदमी नहीं मिलता आदमी के पैकर में

ख़ुशबीर सिंह शाद

आदमी से आदमी की जब हाजत हो रवा

क्यूँ ख़ुदा ही की करे इतनी फिर याद आदमी

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

अहल-ए-म'अनी जुज़ बूझेगा कोई इस रम्ज़ को

हम ने पाया है ख़ुदा को सूरत-ए-इंसाँ के बीच

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

आख़िर इंसान हूँ पत्थर का तो रखता नहीं दिल

बुतो इतना सताओ ख़ुदा-रा मुझ को

अरशद अली ख़ान क़लक़

इधर तेरी मशिय्यत है उधर हिकमत रसूलों की

इलाही आदमी के बाब में क्या हुक्म होता है

जोश मलीहाबादी

इंसान की बुलंदी पस्ती को देख कर

इंसाँ कहाँ खड़ा है हमें सोचना पड़ा

हबीब हैदराबादी

जिस की अदा अदा पे हो इंसानियत को नाज़

मिल जाए काश ऐसा बशर ढूँडते हैं हम

आजिज़ मातवी

आलम के मुरक़्क़े को किया सैर मैं लेकिन

इस में भी कोई सूरत-ए-इंसान निकली

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

शैख़ आदमी के भी दर्जे हैं मुख़्तलिफ़

इंसान हैं ज़रूर मगर वाजिबी से आप

बेख़ुद देहलवी

ग़ैब का ऐसा परिंदा है ज़मीं पर इंसाँ

आसमानों को जो शह-पर पे उठाए हुए है

खुर्शीद अकबर