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कामिल बहज़ादी

1934 - | भोपाल, भारत

ग़ज़ल 5

शेर 6

आप दामन को सितारों से सजाए रखिए

मेरी क़िस्मत में तो पत्थर के सिवा कुछ भी नहीं

लोग भोपाल की तारीफ़ किया करते हैं

इस नगर में तो तिरे घर के सिवा कुछ भी नहीं

तअल्लुक़ है अब तर्क-ए-तअल्लुक़

ख़ुदा जाने ये कैसी दुश्मनी है

ई-पुस्तक 2

Dhanak

 

2015

Tilok Chand Mahroom : Ek Mutala

 

1999

 

ऑडियो 5

आकाश की हसीन फ़ज़ाओं में खो गया

एक भटके हुए लश्कर के सिवा कुछ भी नहीं

ये किस ने दूर से आवाज़ दी है

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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