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पीर शेर मोहम्मद आजिज़

ग़ज़ल 8

शेर 9

तो मैं हूर का मफ़्तूँ परी का आशिक़

ख़ाक के पुतले का है ख़ाक का पुतला आशिक़

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जब उस ने मिरा ख़त छुआ हाथ से अपने

क़ासिद ने भी चिपका दिया दीवार से काग़ज़

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किसी की ज़ुल्फ़ के सौदे में रात की है बसर

किसी के रुख़ के तसव्वुर में दिन तमाम किया

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पुस्तकें 4

दीवान-ए-करिश्मा-ए-इश्क़

तनवीर-उल-ख़याल

1922

करिश्मा-ए-इश्क

तनवीर-उल-ख़याल

1922

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1922

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1914