प्रसिद्ध मिसरे पर शेर
ऐसे अशआर भी कसीर तादाद
में हैं जिनका एक ही मिस्रा इतना मशहूर हुआ कि ज़्यादा-तर लोग दूसरे मिसरे से वाक़िफ़ ही नहीं होते। “पहुँची वहीं पे ख़ाक-ए-जहाँ का ख़मीर था” ये मिस्रा सबको याद होगा लेकिन मुकम्मल शेर कम लोग जानते हैं। हमने ऐसे मिस्रों को मुकम्मल शेर की सूरत में जमा किया है। हमें उम्मीद है हमारा ये इंतिख़ाब आपको पसंद आएगा।
मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया
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इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के
Interpretation:
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इस शेर में शायर यह कहना चाहता है कि इश्क़ के चक्कर में पड़कर वह अब किसी काम के नहीं रहे। वह एक दबी हुई आह के साथ याद करते हैं कि प्यार में पड़ने से पहले वो भी एक बहुत हुनरमंद और ज़रूरी इंसान थे, लेकिन अब सिर्फ़ नाम के रह गए हैं।
सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ
ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ
ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने
लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई
बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब'
कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है
Interpretation:
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कवि कहता है कि उसकी स्व-विस्मृति या बेहोशी किसी असली वजह से है। “पर्दा-दारी” उस छुपे हुए सच, दर्द या प्रेम की ओर इशारा करती है जिसे वह खुलकर कह नहीं सकता। इसलिए बाहरी तौर पर जो उलझन दिखती है, वह भीतर की छिपी बात का असर है। यह शेर रहस्य और अंदरूनी बेचैनी का भाव देता है।
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मकतब-ए-इश्क़ का दस्तूर निराला देखा
उस को छुट्टी न मिले जिस को सबक़ याद रहे
दिल के फफूले जल उठे सीने के दाग़ से
इस घर को आग लग गई घर के चराग़ से
राह-ए-दूर-ए-इश्क़ में रोता है क्या
आगे आगे देखिए होता है क्या
Interpretation:
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मीर तक़ी मीर प्रेम को एक लंबी और कठिन यात्रा मानते हैं, जहाँ शुरुआत में ही रो पड़ना जल्दबाज़ी है। वक्ता धैर्य रखने को कहता है और संकेत देता है कि आगे और बड़ी कसौटियाँ आ सकती हैं। भाव यह है कि प्रेम का असली दर्द और सच आगे बढ़ने पर ही खुलता है।
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हुए नामवर बे-निशाँ कैसे कैसे
ज़मीं खा गई आसमाँ कैसे कैसे
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सुर्ख़-रू होता है इंसाँ ठोकरें खाने के बा'द
रंग लाती है हिना पत्थर पे पिस जाने के बा'द
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'उम्र सारी तो कटी 'इश्क़-ए-बुताँ में 'मोमिन'
आख़िरी वक़्त में क्या ख़ाक मुसलमाँ होंगे
Interpretation:
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इस शेर में कवि अपने ही जीवन पर कड़ी आत्म-ग्लानि जताता है और अंत समय का डर दिखता है। “इश्क़-ए-बुताँ” दुनिया की सुंदरता और भटकाने वाली चाहतों का संकेत है, जो ईमान से दूर कर देती हैं। वह कहता है कि जब सारी उम्र गलत लगाव में गई, तो मौत के समय की आख़िरी तौबा किस काम की। भाव का केंद्र पछतावा और आत्म-व्यंग्य है।
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अब तो जाते हैं बुत-कदे से 'मीर'
फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया
Interpretation:
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यह शेर विदाई और मिलने की अनिश्चितता का भाव रखता है। प्रेमी प्रिय के ठिकाने को “बुत-कदा” कहकर उसे पूजा-सा मान देता है, पर साथ ही वहाँ से दूर जाना पड़ रहा है। “अगर ख़ुदा लाया” में उम्मीद भी है और यह बात भी कि फिर मिलना अपने बस में नहीं, किस्मत/ईश्वर की मरज़ी पर है।
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ख़ंजर चले किसी पे तड़पते हैं हम 'अमीर'
सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है
ईद का दिन है गले आज तो मिल ले ज़ालिम
रस्म-ए-दुनिया भी है मौक़ा भी है दस्तूर भी है
शह-ज़ोर अपने ज़ोर में गिरता है मिस्ल-ए-बर्क़
वो तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले
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सदा ऐश दौराँ दिखाता नहीं
गया वक़्त फिर हाथ आता नहीं
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आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे
ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे
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शायर अपने महबूब से कहता है कि तुम बेमिसाल हो और दुनिया में तुम्हारा कोई मुकाबला नहीं है। इसलिए मैं तुम्हें आईना देता हूँ, क्योंकि केवल आईने में तुम्हारी अपनी परछाईं ही है जो तुम्हारे जैसी लग सकती है; यह अपने आप में एक अद्भुत नज़ारा है।
चल साथ कि हसरत दिल-ए-मरहूम से निकले
आशिक़ का जनाज़ा है ज़रा धूम से निकले
क़ैस जंगल में अकेला है मुझे जाने दो
ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो
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भाँप ही लेंगे इशारा सर-ए-महफ़िल जो किया
ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं
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ख़बर सुन कर मिरे मरने की वो बोले रक़ीबों से
ख़ुदा बख़्शे बहुत सी ख़ूबियाँ थीं मरने वाले में
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यह दोहा-सा शेर देर से मिली कद्र की कटुता दिखाता है: प्रेमिका जीवन में महत्व नहीं देती, पर मृत्यु के बाद औपचारिक ढंग से तारीफ़ कर देती है, वह भी प्रतिद्वंद्वियों के सामने। यह बात संवेदना जैसी लगती है, पर इसमें व्यंग्य और चुभन है क्योंकि अब प्रशंसा का कोई अर्थ नहीं। भाव का केंद्र पछतावा और बेबस प्रेम है।
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ऐ सनम वस्ल की तदबीरों से क्या होता है
वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है
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आख़िर गिल अपनी सर्फ़-ए-दर-ए-मय-कदा हुई
पहुँचे वहाँ ही ख़ाक जहाँ का ख़मीर हो
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न जाना कि दुनिया से जाता है कोई
बहुत देर की मेहरबाँ आते आते
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यह दोहा-सा भाव जीवन की अनिश्चितता और देर से पहुँची ममता का दुख दिखाता है। कहने वाला मानकर बैठा था कि सब ठीक रहेगा, पर किसी का चला जाना अचानक हो गया। प्रिय का आना बहुत देर से हुआ, इसलिए सहारा देने वाली बात भी अब केवल पछतावा बन जाती है।
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'मीर' अमदन भी कोई मरता है
जान है तो जहान है प्यारे
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यह दोहा उदासी और टूटन के सामने जीवन को बचाने की बात करता है। “जान” यहाँ सबसे बड़ा सहारा है और “जहान” उसका अर्थ—यानी मौके, रिश्ते और आगे का रास्ता। कवि प्रेम से समझाता है कि जीते रहोगे तो सब कुछ फिर से संभव हो सकता है।
ऐ 'ज़ौक़' देख दुख़्तर-ए-रज़ को न मुँह लगा
छुटती नहीं है मुँह से ये काफ़र लगी हुई
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इस शेर में शायर ने शराब की लत से बचने की सलाह दी है। शराब को 'दुख़्तर-ए-रज़' और 'काफ़िर' कहकर पुकारा गया है, जिसका मतलब है कि यह एक ऐसी जालिम चीज़ है जो अगर एक बार आदत बन जाए तो छूटती नहीं है। इसमें नशे की बुराई और उसकी मज़बूत पकड़ को दर्शाया गया है।
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सुन तो सही जहाँ में है तेरा फ़साना क्या
कहती है तुझ को ख़ल्क़-ए-ख़ुदा ग़ाएबाना क्या
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अगर बख़्शे ज़हे क़िस्मत न बख़्शे तो शिकायत क्या
सर-ए-तस्लीम ख़म है जो मिज़ाज-ए-यार में आए
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हज़रत-ए-दाग़ जहाँ बैठ गए बैठ गए
और होंगे तिरी महफ़िल से उभरने वाले
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इस शेर में शायर अपने रुतबे का भरोसा दिखाता है कि उसके बैठने से मानो बात तय हो जाती है। साथ ही वह यह भी मानता है कि महबूब की महफ़िल इतनी चमकदार है कि वहाँ से नए लोग भी आगे आकर प्रसिद्ध हो सकते हैं। भाव में आत्मविश्वास, हल्की प्रतिस्पर्धा और महफ़िल की ताक़त का स्वीकार साथ-साथ है।
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बजा कहे जिसे आलम उसे बजा समझो
ज़बान-ए-ख़ल्क़ को नक़्क़ारा-ए-ख़ुदा समझो
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इस शेर में जनमत या 'पब्लिक ओपिनियन' की ताकत को बताया गया है। शायर का मानना है कि जब सारी दुनिया किसी बात को सही मानती है, तो वह ईश्वरीय संकेत के समान होता है। लोगों की सामूहिक आवाज़ को ईश्वर का आदेश मानकर स्वीकार करना चाहिए।
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नाला-ए-बुलबुल-ए-शैदा तो सुना हँस हँस कर
अब जिगर थाम के बैठो मिरी बारी आई
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शहर में अपने ये लैला ने मुनादी कर दी
कोई पत्थर से न मारे मिरे दीवाने को
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बहुत जी ख़ुश हुआ 'हाली' से मिल कर
अभी कुछ लोग बाक़ी हैं जहाँ में
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लगे मुँह भी चिढ़ाने देते देते गालियाँ साहब
ज़बाँ बिगड़ी तो बिगड़ी थी ख़बर लीजे दहन बिगड़ा
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बंदिश-ए-अल्फ़ाज़ जड़ने से नगों के कम नहीं
शाइ'री भी काम है 'आतिश' मुरस्सा-साज़ का
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लगा रहा हूँ मज़ामीन-ऐ-नौ के फिर अम्बार
ख़बर करो मेरे ख़िरमन के ख़ोशा-चीनों को
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पीरी में वलवले वो कहाँ हैं शबाब के
इक धूप थी कि साथ गई आफ़्ताब के