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बुढ़ापा पर शेर

बुढ़ापा उम्र का वह हिस्सा

है जब पुराने पत्ते नई कोंपलों को रास्ता देने की तैयारी शुरू कर देते हैं। माज़ी या अतीत के बहुत सारे पल अच्छे बुरे तजुर्बों की धूप-छाँव की तरह याद आते हैं और शायरी ऐसे ही जज़्बों की तर्जुमानी में करामात दिखाती है। उम्र के आख़िरी लम्हों में जिस्म और उस से जुड़ी दुनिया में सूरज के ढलने जैसा समाँ होता है जिसे शायरों ने अपने-अपने नज़रिये से देखा और महसूस किया है। पेश है एक झलक बुढ़ापा शायरी कीः

कहते हैं उम्र-ए-रफ़्ता कभी लौटती नहीं

जा मय-कदे से मेरी जवानी उठा के ला

अब्दुल हमीद अदम

सफ़र पीछे की जानिब है क़दम आगे है मेरा

मैं बूढ़ा होता जाता हूँ जवाँ होने की ख़ातिर

ज़फ़र इक़बाल

मैं तो 'मुनीर' आईने में ख़ुद को तक कर हैरान हुआ

ये चेहरा कुछ और तरह था पहले किसी ज़माने में

मुनीर नियाज़ी

दिल फ़सुर्दा तो हुआ देख के उस को लेकिन

उम्र भर कौन जवाँ कौन हसीं रहता है

अहमद मुश्ताक़

अब जो इक हसरत-ए-जवानी है

उम्र-ए-रफ़्ता की ये निशानी है

अब मन में जो चाह उठती है, वह युवावस्था की चाह है।

यह चाह ही बताती है कि बीती उम्र पीछे रह गई है।

मीर तक़ी मीर ने युवावस्था की चाह को समय के निकल जाने का संकेत बनाया है। जब जवानी चली जाती है, तब उसकी कमी अंदर से कसक बनकर उठती है। यही कसक बताती है कि जीवन का अच्छा हिस्सा बीत चुका है। भाव में स्मृति, पछतावा और ढलती उम्र की उदासी है।

मीर तक़ी मीर

गुदाज़-ए-इश्क़ नहीं कम जो मैं जवाँ रहा

वही है आग मगर आग में धुआँ रहा

जिगर मुरादाबादी

मौत के साथ हुई है मिरी शादी सो 'ज़फ़र'

उम्र के आख़िरी लम्हात में दूल्हा हुआ मैं

ज़फ़र इक़बाल

वक़्त-ए-पीरी शबाब की बातें

ऐसी हैं जैसे ख़्वाब की बातें

बुढ़ापे के समय में जवानी के दिनों की बातें करना,

बिल्कुल ऐसा लगता है जैसे कोई सपने की बातें कर रहा हो।

शायर कहता है कि जब इंसान बूढ़ा हो जाता है, तो उसे अपनी जवानी के किस्से हकीकत नहीं लगते। बीते हुए दिन और पुरानी ताकत अब इतनी दूर महसूस होती है कि उन्हें याद करना किसी सपने को याद करने जैसा लगता है, जिसका वर्तमान से कोई वास्ता नहीं।

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

पीरी में वलवले वो कहाँ हैं शबाब के

इक धूप थी कि साथ गई आफ़्ताब के

मुंशी ख़ुशवक़्त अली ख़ुर्शीद

तलातुम आरज़ू में है तूफ़ाँ जुस्तुजू में है

जवानी का गुज़र जाना है दरिया का उतर जाना

तिलोकचंद महरूम

ख़ामोश हो गईं जो उमंगें शबाब की

फिर जुरअत-ए-गुनाह की हम भी चुप रहे

हफ़ीज़ जालंधरी

रुख़्सत हुआ शबाब तो अब आप आए हैं

अब आप ही बताइए सरकार क्या करें

अमीर चंद बहार

अब वो पीरी में कहाँ अहद-ए-जवानी की उमंग

रंग मौजों का बदल जाता है साहिल के क़रीब

हादी मछलीशहरी

पीरी में शौक़ हौसला-फ़रसा नहीं रहा

वो दिल नहीं रहा वो ज़माना नहीं रहा

अब्दुल ग़फ़ूर नस्साख़
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