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तुराब काकोरवी

1768

शेर 3

शहर में अपने ये लैला ने मुनादी कर दी

कोई पत्थर से मारे मिरे दीवाने को

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उड़ के आया है लगन में तिरे जल जाने को

शौक़ से फूँक दे शम्अ तू परवाने को

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हदफ़ जिस का फ़क़त दिल हो मैं ऐसे तीर के क़ुर्बां

बदन जिस से घाएल हो मैं उस शमशीर के क़ुर्बां

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पुस्तकें 5

Bu Turab-o-Butshikan

 

1969

Deewan-e-Turab

 

1892

Kulliyat-e-Turab

 

1889

Maqalat-e-Soofia

 

1893