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मिर्ज़ा जवाँ बख़्त जहाँदार

1749 - 1778

मुग़ल साम्राज्य के युवराज

मुग़ल साम्राज्य के युवराज

ग़ज़ल 28

शेर 8

आख़िर गिल अपनी सर्फ़-ए-दर-ए-मय-कदा हुई

पहुँची वहीं पे ख़ाक जहाँ का ख़मीर था

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तिरे इश्क़ से जब से पाले पड़े हैं

हमें अपने जीने के लाले पड़े हैं

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कहें सो किस से 'जहाँदार' उस की नज़रों में

रक़ीब काम के ठहरे और हम हैं ना-कारे

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पुस्तकें 2

Deewan-e-Jahan Dar

 

1966

दीवान-ए-जहांदार

 

1966