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नवाब अली असग़र

1860 | लखनऊ, भारत

शेर 1

अगर बख़्शे ज़हे क़िस्मत बख़्शे तो शिकायत क्या

सर-ए-तस्लीम ख़म है जो मिज़ाज-ए-यार में आए

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