पिएँ साक़ी के हाथों से मय-ए-उल्फ़त पिएँ जब भी
मिरे नासेह बस इतनी पारसाई चाहते हैं हम
ये है मय-ख़ाना-ओ-सनम-ख़ाना
राह के इंतिख़ाब के दिन हैं
तौबा भी कर ली थी ये भी नश्शा की थी इक तरंग
आप समझे थे कि 'बेख़ुद' पारसा हो जाएगा
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
पिएँ साक़ी के हाथों से मय-ए-उल्फ़त पिएँ जब भी
मिरे नासेह बस इतनी पारसाई चाहते हैं हम
ये है मय-ख़ाना-ओ-सनम-ख़ाना
राह के इंतिख़ाब के दिन हैं
तौबा भी कर ली थी ये भी नश्शा की थी इक तरंग
आप समझे थे कि 'बेख़ुद' पारसा हो जाएगा