Prostitute

हर औरत वेश्या नहीं होती लेकिन हर वेश्या औरत होती है। इस बात को हमेशा याद रखना चाहीए।

Saadat Hasan Manto

वेश्या पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। या ख़ुद बनती है। जिस चीज़ की मांग होगी मंडी में ज़रूर आएगी। मर्द की नफ़सानी ख़्वाहिशात की मांग औरत है। ख़्वाह वो किसी शक्ल में हो। चुनांचे इस मांग का असर ये है कि हर शहर में कोई ना कोई चकला मौजूद है। अगर आज ये मांग दूर हो जाये तो ये चकले ख़ुद बख़ुद ग़ायब हो जाऐंगे।

Saadat Hasan Manto

मैं तहज़ीब-ओ-तमद्दुन और सोसाइटी की चोली क्या उतारुंगा जो है ही नंगी... मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश भी नहीं करता, इस लिए कि ये मेरा काम नहीं दर्ज़ियों का है। लोग मुझे सियाह क़लम कहते हैं, मैं तख़्ता-ए-सियाह पर काली चाक से नहीं लिखता, सफ़ेद चाक इस्तिमाल करता हूँ कि तख़्ता-ए-सियाह की सियाही और भी ज़्यादा नुमायां हो जाए। ये मेरा ख़ास अंदाज़, मेरा ख़ास तर्ज़ है जिसे फ़ोह्श निगारी, तरक़्क़ी पसंदी और ख़ुदा मालूम क्या कुछ कहा जाता है। लानत हो सआदत हसन मंटो पर, कमबख़्त को गाली भी सलीक़े से नहीं दी जाती।

Saadat Hasan Manto

आप शहर में ख़ूबसूरत और नफ़ीस गाड़ियाँ देखते हैं... ये ख़ूबसूरत और नफ़ीस गाड़ियाँ कूड़ा क्रिकेट उठाने के काम नहीं सकतीं। गंदगी और ग़लाज़त उठा कर बाहर फेंकने के लिए और गाड़ियाँ मौजूद हैं जिन्हें आप कम देखते हैं और अगर देखते हैं तो फ़ौरन अपनी नाक पर रूमाल रख लेते हैं... इन गाड़ियों का वुजूद ज़रूरी है और उन औरतों का वुजूद भी ज़रूरी है जो आपकी ग़लाज़त उठाती हैं। अगर ये औरतें ना होतीं तो हमारे सब गली कूचे मर्दों की ग़लीज़ हरकात से भरे होते।

Saadat Hasan Manto

चक्की पीसने वाली औरत जो दिन-भर काम करती है और रात को इत्मीनान से सो जाती है, मेरे अफ़्सानों की हीरोइन नहीं हो सकती। मेरी हीरोइन चकले की एक टखयाई रंडी हो सकती है जो रात को जागती है और दिन को सोते में कभी कभी डरावना ख़्वाब देखकर उठ बैठती है कि बुढ़ापा उस के दरवाज़े पर दस्तक देने रहा है... उस के भारी भारी पपोटे जिन पर बरसों की उचटी हुई नींदें मुंजमिद हो गई हैं, मेरे अफ़्सानों का मौज़ू बन सकते हैं। उस की ग़लाज़त, उस की बीमारियाँ, उस का चिड़चिड़ापन, उस की गालियाँ ये सब मुझे भाती हैं... मैं उनके मुताल्लिक़ लिखता हूँ और घरेलू औरतों की शुस्ता कलामियों, उनकी सेहत और उनकी नफ़ासतपसंदी को नज़र-अंदाज़ कर जाता हूँ।

Saadat Hasan Manto

जब तक समाज अपने क़वानीन पर अज़ सर-ए-नौ ग़ौर ना करेगा वो ''नजासत'' दूर ना होगी जो तहज़ीब-ओ-तमद्दुन के इस ज़माने में हर शहर और हर बस्ती के अंदर मौजूद है।

Saadat Hasan Manto

ज़माने के जिस दौर से हम इस वक़्त गुज़र रहे हैं अगर आप इस से नावाक़िफ़ हैं तो मेरे अफ़साने पढ़ीये। अगर आप इन अफ़्सानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इस का मतलब है कि ये ज़माना नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त है... मुझ में जो बुराईयाँ हैं, वो इस अह्द की बुराईयां हैं... मेरी तहरीर में कोई नक़्स नहीं। जिस नक़्स को मेरे नाम से मंसूब किया जाता है, दर असल मौजूदा निज़ाम का नक़्स है।

Saadat Hasan Manto

वेश्या पैदा नहीं होती, बनाई जाती है, या ख़ुद बनती है।

Saadat Hasan Manto

वेश्या और बा-इस्मत औरत का मुक़ाबला हर्गिज़ हर्गिज़ नहीं करना चाहिए। इन दोनों का मुक़ाबला हो ही नहीं सकता। वेश्या ख़ुद कमाती है और बा-इस्मत औरत के पास कमा कर लाने वाले कई मौजूद होते हैं।

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वेश्या को सिर्फ़ बाहर से देखा जाता है। इस के रंग-रूप, उस की भड़कीली पोशाक, आराइश-ओ-ज़ेबाइश देखकर यही नतीजा निकाला जाता है कि वो ख़ुशहाल है। लेकिन ये दरुस्त नहीं।

Saadat Hasan Manto

अगर हम साबुन और लैविन्डर का ज़िक्र कर सकते हैं तो उन मौर्यों और बदरुओं का ज़िक्र क्यों नहीं कर सकते जो हमारे बदन का मैल पीती हैं। अगर हम मंदिरों और मस्जिदों का ज़िक्र कर सकते हैं तो उन क़हबा-ख़ानों का ज़िक्र क्यों नहीं कर सकते जहाँ से लौट कर कई इन्सान मंदिरों और मस्जिदों का रुख करते हैं... अगर हम अफ़्यून, चरस, भंग और शराब के ठेकों का ज़िक्र कर सकते हैं तो उन कोठों का ज़िक्र क्यों नहीं कर सकते जहाँ हर क़िस्म का नशा इस्तिमाल किया जाता है।

Saadat Hasan Manto

जिस औरत के दरवाज़े शहर के हर उस शख़्स के लिए खुले हैं जो अपनी जेबों में चाँदी के चंद सिक्के रखता हो। ख़्वाह वो मोची हो या भंगी, लंगड़ा हो या लूला, ख़ूबसूरत हो या करीहत उल-मंज़र, उस की ज़िंदगी का अंदाज़ा बख़ूबी लगाया जा सकता है।

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बग़ावत फ़्रांस में पहली गोली पैरिस की एक वेश्या ने अपने सीने पर खाई थी। अमृतसर में जलियांवाला बाग़ के ख़ूनीं हादिसे की इब्तिदा उस नौजवान के ख़ून से हुई थी जो एक वेश्या के बत्न से था।

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चोर उचक्के रहज़न और वेश्याएं बग़ैर शराब के ज़िंदा नहीं रह सकतीं।

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एक बा-इस्मत औरत के सीने में मुहब्बत से आरी दिल हो सकता है और इस के बरअक्स चकले की एक अदना तरीन वेश्या मुहब्बत से भरपूर दिल की मालिक हो सकती है।

Saadat Hasan Manto

मैं तहज़ीब-ओ-तमद्दुन और सोसाइटी की चोली क्या उतारुंगा जो है ही नंगी।

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वेश्याओं के इशक़ में एक ख़ास बात काबिल-ए-ज़िक्र है। उनका इशक़ उनके रोज़मर्रा के मामूल पर बहुत कम असर डालता है।

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जिस तरह बा-इस्मत औरतें वेश्याओं की तरफ़ हैरत और तअज्जुब से देखती हैं, ठीक उसी तरह वो भी उनकी तरफ़ उसी नज़र से देखती हैं।

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बाज़ारी औरतें समाज की पैदावार हैं और समाज के वज़अ कर्दा क़वानीन की खाद उनकी परवरिश करती है। अगर उनको अच्छा बनाना दरकार है तो सारे जिस्म के निज़ाम को दरुस्त करने की ज़रूरत है। जब तक समाज अपने क़वानीन पर अज़ सर-ए-नौ ग़ौर ना करेगा, वो ''नजासत'' दूर ना होगी जो तहज़ीब-ओ-तमद्दुन के इस ज़माने में हर शहर और हर बस्ती के अंदर मौजूद है?

Saadat Hasan Manto

गदागरी क़ानूनन बंद कर दी जाती है, मगर वो अस्बाब-ओ-एलल दूर करने की कोशिश नहीं की जाती जो इन्सान को इस फे़अल पर मजबूर करते हैं। औरतों को सर-ए-बाज़ार जिस्म-फ़रोशी के कारोबार से रोका जाता है मगर उस के मुहर्रिकात के इस्तीसाल की तरफ़ कोई तवज्जाे नहीं देता।

Saadat Hasan Manto

वेश्या अपनी तारीक तिजारत के बावजूद रौशन रूह की मालिक हो सकती है।

Saadat Hasan Manto

वेश्या का वजूद ख़ुद एक जनाज़ा है जो समाज ख़ुद अपने कंधों पर उठाए हुए है। वो उसे जब तक कहीं दफ़न नहीं करेगा, उस के मुताल्लिक़ बातें होती रहेंगी।

Saadat Hasan Manto

अगर वेश्या का ज़िक्र फ़ोह्श है तो इस का वजूद भी फ़ोह्श है। अगर उस का ज़िक्र मम्नूअ है तो उसका पेशा भी मम्नूअ होना चाहिए। इस का ज़िक्र ख़ुद ब-ख़ुद मिट जाएगा।

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जिस तरह घर के नौकर झटपट अपने आक़ाओं के बिस्तर लगा कर अपने आराम का ख़्याल करते हैं। ठीक उसी तरह वेश्या भी अपने ग्राहकों को निमटा कर अपनी ख़ुशी और राहत की तरफ़ पलट आती है।

Saadat Hasan Manto

वेश्या सिर्फ़ उसी मर्द पर अपने दिल के तमाम दरवाज़े खोलेगी, जिससे उसे मुहब्बत हो। हर आने जाने वाले मर्द के लिए वो ऐसा नहीं कर सकती।

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ऐक्ट्रेस चकले की वेश्या हो या किसी बा-इज़्ज़त और शरीफ़ घराने की औरत, मेरी नज़रों में वो सिर्फ़ ऐक्ट्रेस है। उस की शराफ़त या रज़ालत से मुझे कोई सरोकार नहीं। इस लिए कि फ़न इन ज़ाती उमूर से बहुत बालातर है।

Saadat Hasan Manto

इस्मत फ़रोश औरत एक ज़माने से दुनिया की सबसे ज़लील हस्ती समझी जाती रही है। मगर क्या हमने ग़ौर किया है कि हम में से अक्सर ऐसी ज़लील-ओ-ख़्वार हस्तियों के दर पर ठोकरें खाते हैं, क्या हमारे दिल में ये ख़्याल पैदा नहीं होता कि हम भी ज़लील हैं?

Saadat Hasan Manto

ताज्जुब तो इस बात का है कि जब सदियों से हम ये सुन रहे हैं कि वेश्या का डसा हुआ पानी नहीं मांगता तो हम क्यों अपने आपको इस से डसवाते हैं और फिर क्यों ख़ुद ही रोना पीटना शुरू कर देते हैं। वेश्या इरादतन या किसी इंतिक़ामी जज़्बे के ज़ेर-ए-असर मर्दों के माल-ओ-ज़र पर हाथ नहीं डालती। वो सौदा करती है और कमाती है।

Saadat Hasan Manto

वेश्या या तवाइफ़ अपने तिजारती उसूलों के मातहत हर मर्द से जो उस के पास गाहक के तौर पर आता है, ज़्यादा से ज़्यादा नफ़ा हासिल करने की कोशिश करेगी। अगर वो मुनासिब दामों पर या हैरत-अंगेज़ क़ीमत पर अपना माल बेचती है तो ये उस का पेशा है। बनिया भी तो सौदा तौलते वक़्त डंडी मार जाता है। बाअज़ दुकानें ज़्यादा क़ीमत पर अपना माल बेचती हैं बाअज़ कम क़ीमत पर।

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वेश्या इरादतन या किसी इंतिक़ामी जज़्बे के ज़ेर-ए-असर मर्दों के माल-ओ-ज़र पर हाथ नहीं डालती। वो सौदा करती है और कमाती है।

Saadat Hasan Manto

बेसवाएं अब से नहीं हज़ारहा साल से हमारे दरमयान मौजूद हैं। उनका तज़किरा इल्हामी किताबों में भी मौजूद है। अब चूँकि किसी इल्हामी किताब या किसी पैग़ंबर की गुंजाइश नहीं रही, इस लिए मौजूदा ज़माने में उनका ज़िक्र आप आयात में नहीं बल्कि उन अख़बारों, किताबों या रिसालों में देखते हैं जिन्हें आप ऊद और लोबान जलाए बग़ैर पढ़ सकते हैं और पढ़ने के बाद रद्दी में भी उठवा सकते हैं।

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