उस को ख़िज़ाँ के दौर में बाग़ी समझ के चूम
जो भी शजर पे आख़िरी पत्ता दिखाई दे
एक ज़िंदानी की हल्की सी बग़ावत से तिरा
सारा ज़िंदान ही झंकार हुआ जाता है
जो भी मिलता है बग़ावत पे उतर आता है
कुछ कजी शहर की दीवार में रक्खी हुई है
ले के मैं तन्हा ही निकलूँगा बग़ावत का 'अलम
मस्लहत की गोद में जब फ़लसफ़ी सो जाएँगे