सामाजिक समस्याएं पर कहानियाँ

हड्डियाँ और फूल

"हासिल की उपेक्षा और ला-हासिल के लिए गिले-शिकवे की इंसानी प्रवृति को इस कहानी में उजागर किया गया है। इस कहानी में मियाँ-बीवी के बीच शक-ओ-संदेह के नतीजे में पैदा होने वाली तल्ख़ी को बयान किया गया है। मुलम एक चिड़चिड़ा मोची है, गौरी उसकी ख़ूबसूरत बीवी है, मुलम के ज़ुल्म-ओ-ज़्यादती से आजिज़ आकर गौरी अपने मायके चली जाती है तो मुलम को अपनी ज़्यादतियों का एहसास होता है और वो बदहवासी की हालत में अजीब-अजीब हरकतें करता है, लेकिन जब वही गौरी वापस आती है तो स्टेशन पर भीड़ की वजह से एक अजनबी से टकरा जाती है और मुलम ग़ुस्से से हकलाते हुए कहता है, ये नए ढंग सीख आई हो... फिर आ गईं मेरी जान को दुख देने।"

राजिंदर सिंह बेदी

नामुराद

सफ़दर एक मज़हबी घराने का रौशन ख़याल फ़र्द है, राबिया उसकी मंगेतर है जिसका अचानक इंतिक़ाल हो जाता है। राबिया की माँ सफ़दर को आख़िरी दीदार के लिए बुलवा भेजती है। सफ़दर रास्ते भर बुरे ख़यालात के नुक़्सानात के बारे में ग़ौर करता रहता है। उसे इस बात पर हैरत होती है कि रिश्ता तय करते वक़्त न उससे कोई मश्वरा किया गया न राबिया को होने वाला शौहर दिखाया गया तो फिर इस तकल्लुफ़ की क्या ज़रूरत। वो राबिया के घर पहुँचता है तो राबिया की माँ हाय वावेला करती है और बार-बार राबिया को नामुराद कहती रहती है। राबिया का चेहरा देखने के बाद सफ़दर फ़ैसला नहीं कर पाता है कि राबिया नामुराद है या सफ़दर या राबिया की माँ जो दोनों से वाक़िफ़ थी।

राजिंदर सिंह बेदी

एवलांश

"दहेज़ की लानत पर लिखी गई कहानी है। कहानी का रावी एक वाश लाइन इंस्पेक्टर है। आर्थिक परेशानी के कारण उसकी दो बेटियों के रिश्ते तय नहीं हो पा रहे हैं। रावी के कुन्बे में छः लोग हैं, जिनकी ज़िम्मेदारियों का बोझ उसके काँधे पर है। दहेज़ पूरा करने के लिए वो रिश्वतें भी लेता है लेकिन फिर भी लड़के वालों की फ़रमाइशें पूरी होने का कोई इम्कान नज़र नहीं आता। रावी दुख से मुक्ति पाने के लिए अख़बार में पनाह लेता है। एक दिन उसने पढ़ा कि एवालांश आ जाने की वजह से एक पार्टी दब कर रह गई। इसी बीच रिश्वत के इल्ज़ाम में रावी नौकरी से निकाल दिया जाता है। उसी दिन उसकी छोटी बेटी दौड़ती हुई आती है और बताती है एक रेस्क्यू पार्टी ने सब लोगों को बचा लिया। रावी अपनी बेटी से पूछता है, क्या कोई रेस्क्यू पार्टी आएगी... रुकू़... क्या वो हमेशा आती है?"

राजिंदर सिंह बेदी
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