पन्ना लाल नूर
ग़ज़ल 22
अशआर 1
देखूँ तो जुर्म और न देखूँ तो कुफ़्र है
अब क्या कहूँ जमाल-ए-रुख़-ए-फ़ित्नागर को मैं
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere