राकेश उलफ़त
ग़ज़ल 25
अशआर 3
मिरा फ़ख़्र-ए-हयाती आज भी किरदार है मेरा
इसी नग से मुज़य्यन तुर्रा-ए-दस्तार है मेरा
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere