aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
शब्दार्थ
मिरी निगाह में वो रिंद ही नहीं साक़ी
जो होशियारी ओ मस्ती में इम्तियाज़ करे
मेरी नज़र में, ऐ साक़ी, वह आदमी असली रंगीन-मिज़ाज नहीं है।
जो होश और मस्ती के बीच साफ़ फर्क करता रहे।
मेरी नज़र में, ऐ साक़ी, वह आदमी असली रंगीन-मिज़ाज नहीं है।
जो होश और मस्ती के बीच साफ़ फर्क करता रहे।
"कुशादा दस्त-ए-करम जब वो बे-नियाज़ करे" ग़ज़ल से की अल्लामा इक़बाल