परिंदे लौट के जब घर को जाने लगते हैं

जमुना प्रसाद राही

परिंदे लौट के जब घर को जाने लगते हैं

जमुना प्रसाद राही

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    परिंदे लौट के जब घर को जाने लगते हैं

    हमें भी याद दर-ओ-बाम आने लगते हैं

    फ़सील-ए-सरहद-ए-माज़ी धड़कने लगती है

    जो ख़्वाब नींद का दर खटखटाने लगते हैं

    हुबाब धूप की बारिश में फूटते बनते

    सबात-ए-ज़ात का मतलब बताने लगते हैं

    सर-ए-महाज़ तिरे आते ही हरीफ़ मिरे

    ये मेरे हाथ मुझे आज़माने लगते हैं

    तिरे ख़याल की महफ़िल जो सजने लगती है

    क़रीब-ए-हाल गुज़िश्ता ज़माने लगते हैं

    जो आसमान को ज़िद है तो कम नहीं हम भी

    कि बाद-ए-बर्क़ नए घर बनाने लगते हैं

    जो सुनते हैं कि तिरे शहर में दसहरा है

    हम अपने घर में दिवाली सजाने लगते हैं

    सुनी-सुनाई सी हर इक कहानी लगती है

    नए हैं लफ़्ज़ मआनी पुराने लगते हैं

    स्रोत :
    • पुस्तक : Safarguzar (पृष्ठ 121)

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