अशोक कुमार

सआदत हसन मंटो

अशोक कुमार

सआदत हसन मंटो

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    नज्मुल हसन जब देविका रानी को ले उड़ा। तो बंबई टॉकीज़ में अफ़रातफ़री फैल गई। फ़िल्म का आग़ाज़ हो चुका था। चंद मनाज़िर की शूटिंग पाया-ए-तकमील को पहुँच चुकी थी कि नज्मुल हसन अपनी हीरोइन को स्लोलाइड की दुनिया से खींच कर हक़ीक़त की दुनिया में ले गया। बम्बे टॉकीज़ में सबसे ज़्यादा परेशान और मुतफ़क्किर शख़्स हिमानशू राय था। देविकारानी का शौहर और बम्बई टॉकीज़ का “दिल-ओ-दिमाग़ पस-ए-पर्दा।”

    एस मुकर्जी मशहूर जुबली मेकर फ़िल्म साज़ (अशोक कुमार के बहनोई) इन दिनों बंबई टॉकीज़ में मिस्टर साइक वाचा साउण्ड इंजीयर के अस्सिटेंट थे। सिर्फ बंगाली होने की वजह से उन्हें हिमानशू राय से हमदर्दी थी। वो चाहते थे कि किसी किसी तरह देविकारानी वापस जाए। चुनांचे उन्होंने अपने आक़ा हिमानशू राय से मश्वरा किए बग़ैर अपने तौर पर कोशिश की। और अपनी मख़सूस हिक्मत-ए-अमली से देविकारानी को आमादा कर लिया कि वो कलकत्ते में अपने आशिक़ नज्मुल हसन की आग़ौश छोड़ कर वापस बम्बई टॉकीज़ की आग़ौश में चली आए। जिसमें उस के जौहर के पनपने की ज़्यादा गुंजाइश थी।

    देविकारानी वापस गई। एस मुखर्जी ने अपने जज़्बाती आक़ा हिमानशू राय को भी अपनी हिक्मत-ए-अमली से आमादा कर लिया कि वो उसे क़ुबूल कर लीं। और बेचारा नज्मुल हसन इन आशिक़ों की फ़हरिस्त में दाख़िल हो गया। जिनको सियासी, मज़हबी और सरमाया-दाराना हिक्मत-ए-अमलियों ने अपनी महबूबाओं से जुदा कर दिया था।

    ज़ेर-ए-तक्मील फ़िल्म से नज्मुल हसन को क़ैंची से काट कर रद्दी की टोकरी में फेंक तो दिया गया। मगर अब ये सवाल दरपेश था कि इश्क़ आश्ना देविकारानी के लिए सेलोलाइड का हीरो कौन हो।

    हिमानशू राय एक बेहद मेहनती और दूसरों से अलग-थलग रह कर ख़ामोशी से अपने काम में शब-ओ-रोज़ मुनहमिक रहने वाले फ़िल्म-साज़ थे। उन्होंने बम्बई टॉकीज़ की नीव कुछ इस तरह डाली थी कि वो एक बा-वक़ार दर्सगाह मालूम हो। यही वजह है कि उन्होंने बंबई शहर से दूर मुज़ाफ़ात में एक गाँव को जिसका नाम “मलाड” है अपनी फ़िल्म कंपनी के लिए मुंतख़ब किया था... वो बाहर का आदमी नहीं चाहते थे। इस लिए कि बाहर के आदमियों के मुतअल्लिक़ उनकी राय अच्छी नहीं थी (नज्मुल हसन भी बाहर का आदमी था)।

    यहाँ फिर एस. मुखर्जी ने अपने जज़्बाती आक़ा की मदद की। उनका साला अशोक कुमार बी. एस.सी पास कर के एक बरस कलकत्ते में वकालत पढ़ने के बाद बम्बई टॉकीज़ की लेबारेट्री में बग़ैर तनख़्वाह के काम सीख रहा था। नाक नक़्शा अच्छा था। थोड़ा बहुत गा-बजा भी लेता था। मुखर्जी ने चुनांचे बरसबील-ए-तज़्किरा हीरो के लिए उस का नाम लिया। हिमानशू राय की सारी ज़िंदगी तजरबों से दो-चार रही थी। उन्होंने कहा देख लेते हैं। जर्मन कैमरामैन दर्शिंग ने अशोक का टेस्ट लिया। हिमानशू राय ने देखा और पास कर दिया। जर्मन फ़िल्म डायरेक्टर इंज़दस्टन की राय उनके बर-अक्स थी। मगर बम्बई टॉकीज़ में किस की मजाल कि हिमानशू राय की राय के ख़िलाफ़ इज़हार-ए-ख़याल कर सके। चुनांचे अशोक कुमार गांगुली जो उन दिनों ब-मुश्किल बाइस बरस का होगा। देविकारानी का हीरो मुंतख़ब हो गया।

    एक फ़िल्म बना। दो फ़िल्म बने… कई फ़िल्म बने और देविका रानी और अशोक कुमार का जुदा होने वाला फ़िल्मी जोड़ा बन गया। इन फिल्मों से अक्सर बहुत कामियाब हुए। गुड़िया सी देविका रानी। और बड़ा ही बेज़रर अशोक कुमार, दोनों स्लोलाइड पर शीर-ओ-शकर हो कर आते तो बहुत ही प्यारे लगते। मासूम अदाएं। अल्हड़ ग़म्ज़े... बड़ा हंसाई क़िस्म का इशक़... लोगों को जारिहाना इश्क़ करने और देखने के शौक़ थे। ये नर्म-ओ-नाज़ुक और लचकीला इश्क़ बहुत पसंद आया। खासतौर पर इस नए फ़िल्मी जोड़े की गुरवीदा हो गए। स्कूलों और कॉलेजों में तालिबात का (ख़ुसूसन उन दिनों) आईडियल हीरो अशोक कुमार था और कॉलेजों के लड़के लंबी और खुली आस्तीनों वाले बंगाली कुरते पहन कर गाते फिरते थे।

    तू बन की चिड़िया। मैं बन का पंछी बन-बन बोलूँ रे

    मैंने अशोक के चंद फ़िल्म देखे। देविका रानी उस के मुक़ाबले में जहाँ तक किरदार निगारी का तअल्लुक़ है मीलों आगे थी। और हीरो के रूप में अशोक ऐसा मालूम होता था कि चॉकलेट का बना है। मगर आहिस्ता आहिस्ता उसने पर पुर्ज़े निकाले और बंगाल के आदरीश अफ़ीमी इश्क़ की पींक से बेदार होने लगा।

    अशोक जब लेबारेट्री की चिलमन से बाहर निकल कर नुक़रई पर्दे पर आया। तो उस की तनख़्वाह पछत्तर रुपये मुक़र्रर हुई। अशोक बहुत ख़ुश था। उन दिनों अकेली जान के लिए और वो भी शहर से दूर दराज़ गांव “मलाड” में इतने रुपये काफ़ी थे जब उसकी तनख़्वाह एक दम दोगुनी हो गई यानी एक सौ पच्चास रुपये माहवार तो वो और भी ज़्यादा ख़ुश था। लेकिन जब डेढ़ के ढाई मुक़र्रर होते तो वो घबरा गया। उसने मुझे उस वक़्त की कैफ़ियत बयान करते हुए कहा बाई गॉड... मेरी हालत अजीब-ओ-ग़रीब थी। ढाई सौ रुपये... मैंने कैशियर से नोट लिए। तो मेरा हाथ काँपने लगा। समझ में नहीं आता कि इतने रुपये कहाँ रखूँगा... मेरा घर था... एक छोटा सा क्वार्टर। एक चारपाई थी। दो तीन कुर्सियाँ। चारों तरफ़ जंगल... रात को अगर कोई चोर जाए... यानी अगर उस को मालूम हो जाए कि मेरे पास ढाई सौ रुपये हैं तो क्या हो?... मैं एक अजीब चक्कर में पड़ गया। चोरी डकैती से मेरी जान जाती थी। घर कर बहुत सीक में बनाएँ। आख़िर ये क्या कि वो नोट चारपाई के नीचे बिछी हुई दरी में छुपाए... सारी रात बड़े डरावने ख़्वाब आते रहे... सुबह उठ कर मैंने पहला काम ये किया कि वो नोट उठा कर डाकखाने में जमा करा दिए।”

    अशोक मुझे ये बात अपने मकान पर सुना रहा था कि कलकत्ते का एक फ़िल्म-साज़ उस से मिलने आया। कंट्रैक्ट तय्यार था मगर अशोक ने इस पर दस्तख़त किए। वो उसे हज़ार रुपये देता था। और अशोक कुमार का मुतालिबा पूरे एक लाख का था... कहाँ ढाई सौ रुपये और कहाँ एक लाख!

    बाम्बे टॉकीज़ में अशोक के साथ साथ उस के बहनोई एस. मुकर्जी ने भी तरक़्क़ी की। आदमी ज़हीन था... गिर्द-ओ-पेश जो कुछ भी होता उस का ब-नज़र-ए-ग़ाइर मुताला करता था। आहिस्ता-आहिस्ता प्रोड्यूसर बन गया... मामूली प्रोड्यूसर नहीं बहुत बड़ा प्रोड्यूसर जिसने बम्बई टॉकीज़ के झंडे तले कई सिलवर और गोल्डन जुबली फ़िल्म बनाए और मंज़र-निगारी में एक ख़ास स्कूल की बुनियाद डाली... राक़िम-उल-हुरूफ़ इस सिन्फ़ में उस को अपना उस्ताद मानता है।

    अशोक की हर दिल-अज़ीज़ी दिन-ब-दिन बढ़ती चली गई। चूँकि वो बाहर बहुत ही कम निकलता था और अलग-थलग रहता था। इस लिए जब लोग कहीं उस की झलक देख पाते तो एक हंगामा बरपा हो जाता। चलती ट्रैफ़िक बंद हो जाती। उस के चाहने वालों के ठठ लग जाते और अक्सर औक़ात पुलिस के डंडे के ज़ोर से उसे हुजूम की बेपनाह अक़ीदत से नजात दिलाना पड़ती।

    अशोक अपने अक़ीदत मंदों के वालिहाना इज़हार को वुसूल और बर्दाश्त करने के मुआमले में बहुत ही ज़लील वाक़े हुआ है। फ़ौरन ही चिड़ जाता है। जैसे किसी ने गाली दी है। मैंने उस से कई दफ़ा कहा। दादा मनी। तुम्हारी ये हरकत बड़ी वाहियात है... ख़ुश होने के बजाय तुम नाराज़ होते हो। क्या तुम इतना भी नहीं समझते कि ये लोग तुमसे मोहब्बत करते हैं। लेकिन ये बात समझने के लिए शायद उस के दिमाग़ में कोई ऐसा ख़ाना ही नहीं है।

    मोहब्बत से वो क़तअन ना-आशना है (ये तक़्सीम से पहले की बात है इस अर्से में उस के अंदर क्या तब्दीलियाँ पैदा हुई हैं। उनके मुतअल्लिक़ मैं कुछ नहीं कह सकता) सैंकड़ों हसीन लड़कियाँ उस की ज़िंदगी में आएं। मगर वो निहायत ही रूखे अंदाज़ में उनके साथ पेश आता। तबन वो एक ठीट जाट है। उस के खाने पीने और रहने सहने में एक अजीब क़िस्म का गँवारपन है।

    देविकारानी ने उस से इश्क़ करना चाहा। मगर उसने बहुत ही ग़ैरसिनाआना अंदाज़ में उस की हौसला शिकनी की। एक और ऐक्ट्रस ने जुर्रत से काम ले कर उस को अपने घर बुलाया। और बड़े ही नर्म-ओ-नाज़ुक तरीक़े से उस पर अपनी मोहब्बत का इज़हार किया। मगर जब अशोक ने बड़े भेंडे पन से उस का दिल तोड़ा। तो उस ग़रीब को पैंतरा बदल कर ये कहना पड़ा। “मैं आप का इम्तिहान ले रही थी। आप तो मेरे भाई हैं।”

    अशोक को उस ऐक्ट्रस का जिस्म पसंद था। हर वक़्त धुली धुली। निखरी निखरी रहती थी। उस की ये चीज़ भी अशोक को बहुत भाती थी। चुनांचे जब उसने कलाबाज़ी लगा कर उस को अपना भाई बना लिया। तो अशोक को काफ़ी कोफ़्त हुई।

    अशोक इश्क़-पेशा नहीं। लेकिन ताक झांक का मर्ज़ उस को आम मर्दों का सा है। औरतों की दावत तलब चीज़ों को बाक़ायदा ग़ौर से देखता है और उनके मुतअल्लिक़ अपने दोस्तों से बातें भी करता है। कभी-कभार किसी औरत की जिस्मानी क़ुरबत की ख़्वाहिश भी महसूस करता है। मगर बक़ौल उस के मंटो यार... हिम्मत नहीं पड़ती।

    हिम्मत के मुआमले में वो वाक़ई बहुत बोदा है लेकिन ये बोदा-पन उस की इज़दिवाजी ज़िंदगी के लिए बहुत ही मुबारक है। उस की बीवी शोभा से अगर उस की इस कमज़ोरी का ज़िक्र किया जाए। तो यक़ीनन वो यही कहेगी। “ख़ुदा का शुक्र है कि गांगुली में ऐसी हिम्मत नहीं और ख़ुदा करे इसमें नया हिम्मत कभी पैदा हो।”

    मुझे हैरत है कि उस में ये हिम्मत और जुर्रत क्यूँ पैदा हुई। जब कि सैंकड़ों लड़कियों ने जुरअत-ए-रिंदाना से काम ले कर उस को इश्क़ की आग में कूदने की तरग़ीब दी। उस की ज़ाती डाक में बिला-मुबालिग़ा हज़ारों औरतों के इश्क़-ओ-मोहब्बत से लबरेज़ ख़ुतूत आए होंगे। मगर जहाँ तक मैं जानता हूँ। ख़ुतूत के इस अंबार में से उसने शायद एक सौ भी ख़ुद नहीं पढ़े... ख़त आते हैं उस का मरियल सेक्रेट्री डिसोज़ा उन्हें मज़े ले-ले कर पढ़ता है। और दिन-ब-दिन मरियल होता जाता है।

    तक़्सीम से चंद माह पहले अशोक फ़िल्म चन्द्र शेखर के सिलसिले में कलकत्ते में था। शहीद सुहरवर्दी (उस वक़्त वज़ीर-ए-आज़म बंगाल) के हाँ से सोला मिलीमीटर फ़िल्म देखने के बाद अपने डेरे लौट रहा था कि रास्ते में दो ख़ूबसूरत ऐंग्लो इंडियन लड़कियों ने उस की मोटर रोकी और लिफ़्ट चाही। अशोक ने चंद मिनट की ये अय्याशी तो करली। मगर उसे अपने नए सिग्रेट केस से हाथ धोने पड़े। एक लड़की जो शोख़-ओ-शंग थी। सिग्रेट के साथ सिग्रेट केस भी ले उड़ी। उस वाक़ए के बाद अशोक ने कई बार सोचा कि उनसे रस्म-ओ-राह पैदा की जाए। बात मामूली थी मगर उस की हिम्मत पड़ी।

    कोल्हापुर में गरज़, तलवार और ढाल क़िस्म का भारी भरकम हवनक़ फ़िल्म बन रहा था अशोक का थोड़ा सा काम उस में बाक़ी रह गया था। वहाँ से कई बुलावे आए मगर वो गया। उस की तबीअत उस रोल से बहुत मुतनफ़्फ़िर थी। जो उसे अदा करने के लिए दिया गया था। मगर कंट्रैक्ट था। आख़िर एक रोज़ उसे जाना ही पड़ा। साथ मुझे ले गया। उन दिनों मैं फिल्मिस्तान के लिए आठ दिन नामी फ़िल्म लिख रहा था। चूँकि ये फ़िल्म उसे प्रोड्यूस और डायरेक्ट करना थी। इस लिए उसने कहा। चलो यार.... वहाँ आराम से काम करेंगे।

    मगर आराम कहाँ... लोगों को फ़ौरन मालूम हो गया कि अशोक कुमार कोल्हापुर आया है चुनांचे उस होटल के इर्दगिर्द जहाँ हम ठहरे थे। ज़ाइरीन जमा होने शुरू हो गए होटल का मालिक होशियार था। किसी किसी बहाने वो उन लोगों को मुंतशिर कर देता। लेकिन फिर भी बअज़ चिपकू क़िस्म के लोग होटल का तवाफ़ करते रहते। और अपने महबूब ऐक्टर की ज़ियारत कर ही लेते। अपने अक़ीदत मंदों के साथ अशोक जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ बहुत ही अक्खड़ क़िस्म का सुलूक करता रहा। मुझे मालूम नहीं उनका रद्द-ए-अमल क्या। मगर बहैसियत एक नाज़िर के मुझे सख़्त कोफ़्त होती थी।

    एक शाम हम दोनों सैर को निकले। अशोक कीमोफ़लाज़ किए था। आँखों पर चौड़ा चकला गहरे रंग का चशमा... एक हाथ में छड़ी दूसरे हाथ में मेरा कंधा। ताकि हस्ब-ए-ज़रूरत मुझे आगे पीछे कर सके। इसी तरह एक स्टोर में पहुंचे। अशोक को कोल्हापुर के स्टूडियो के गर्द-ओ-ग़ुबार के असरात से महफ़ूज़ रहने के लिए कोई दवा ख़रीदना थी। उसने स्टोर वाले से ये तलब की तो उसने सरसरी नज़र से अपने गाहक की तरफ़ देखा और अलमारी की तरफ़ बढ़ा। लेकिन फ़ौरन ही डी लीड ऐक्शन बिंब की तरह फटा। और मुड़ कर अशोक से मुख़ातब हुआ। “आप... आप कौन हैं?”

    अशोक ने जवाब दिया। “मैं कौन हूँ?... मैं वही हूँ जो कि मैं हूँ?”

    स्टोर वाले ने ग़ौर से अशोक के चश्मा ओढ़े चेहरे की तरफ़ देखा “आप अशोक कुमार हैं?”

    अशोक ने बड़े दिल-शिकन लहजे में कहा। “अशोक कुमार कोई और होगा। चलो मंटो।”

    ये कह कर उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा और दवा ख़रीदे बग़ैर ही हम दोनों स्टोर से बाहर थे। होटल का मोड़ मुड़ने लगे तो सामने तीन मरहट्टी लड़कियाँ नुमूदार हुईं। बहुत साफ़ सुथरी। गोरी चिट्टी। माथों पर कुमकुम। बालों में दीनियाँ (फूलों के गजरे) पैरों में हल्के फुल्के चप्पल। उनमें से एक जिसके हाथों में मौसंबियाँ थीं, अशोक को देख कर ज़ोर से काँपी। भिंची हुई आवाज़ में उसने अपनी सहेलियों से कहा। अशोक! और उस के हाथों की सारी मौसंबियाँ सड़क पर गिर पड़ीं। अशोक ने मेरा कंधा छोड़ा और भाग गया।

    अशोक से मेरी पहली मुलाक़ात फिल्मिस्तान में हुई। जब एस. मुकर्जी की पूरी टीम ने बम्बई टॉकीज़ छोड़ कर अपना नया फ़िल्मी इदारा क़ायम कर लिया था। यूँ तो मैंने कई बार उस की झलकियाँ देखी थीं। मगर उस से मुफ़स्सिल मुलाक़ात फिल्मिस्तान में ही हुई। जब मैं वहाँ मुलाज़िम हो गया।

    फ़िल्मी दुनिया की हर शख़्सियत पर्दे पर कुछ और पर्दे से दूर कुछ और ही होती है। अशोक को चुनांचे जब मैंने पहली मर्तबा क़रीब से देखा तो पर्दे के अशोक से बहुत मुख़्तलिफ़ था। गहरा साँवला रंग। मोटे और खुरदुरे हाथ। मज़बूत कसरती जिस्म। नीम गँवार लब-ओ-लहजे। उखड़ा उखड़ा ग़ैर फ़ित्री तकल्लुफ़। तआरुफ़ कराया गया तो मैंने उस से कहा। आप से मिल कर बड़ी मसर्रत हुई है।”

    अशोक ने इस के जवाब में जो कुछ कहा वो मोटे मोटे अलफ़ाज़ पर मुश्तमिल था। ऐसा लगता था जैसे उसने ये लफ़्ज़ रटे हुए हैं।

    एक मर्तबा फिल्मिस्तान में एक साहब सैर-ओ-तफ़रीह के लिए आए। आपने बड़े पुर-तकल्लुफ़ अंदाज़ में अशोक से कहा। “मुझे ऐसा महसूस होता है कि ख़ाकसार को इस से पहले भी जनाब से शर्फ़-ए-मुलाक़ात हासिल हो चुका है।”

    अशोक ने गड-मड लहजे में जवाब दिया। “जी... जी मुझे कभी मुक़ाबला नहीं हुआ।” मुक़ाबले का क़ाफ़ उस ने हलक़ से निकाला... लेकिन फ़ौरन ही उस को एहसास हुआ कि उसने ये लफ़्ज़ ग़लत इस्तेमाल किया है। मगर वो गोल कर गया।

    अशोक को उर्दू बहुत अच्छी लगती है। शुरू शुरू में उसने इस ज़बान में लिखना पढ़ना शुरू किया। मगर क़ायदे से आगे बढ़ सका। फिर भी उस को थोड़ी सी शुदबुद है। एक दो सतर उर्दू में लिख लेता। तक़्सीम के बाद जब मैं उसे छोड़ कर बम्बई टॉकीज़ से चला आया। तो उसने मुझे उर्दू में ख़त लिखा कि वापस जाओ। मगर अफ़सोस है कि मैं चंद दर चंद वुजूह के बाइस उस का जवाब दे सका।

    मेरी बीवी भी दूसरी औरतों की तरह अशोक कुमार की बहुत मद्दाह थी।

    एक दिन मैं अशोक को अपने घर ले आया। कमरे में दाख़िल होते ही मैंने ज़ोर से आवाज़ दी। “सफ़िया... आओ अशोक कुमार आया है।”

    सफ़िया अंदर रोटी पका रही थी। जब मैंने पै-दर-पै आवाज़ दीं। तो वो बाहर निकली। मैंने अशोक से उस का तआरुफ़ कराया। “ये मेरी बीवी है। दादा मनी... हाथ मिलाओ इस से।”

    सफ़िया और अशोक दोनों झेंप गए। मैंने अशोक का हाथ पकड़ लिया। “हाथ मिलाओ दादा मनी... शरमाते क्या हो।”

    मजबूरन उसे हाथ मिलाना पड़ा। इत्तिफ़ाक़ से उस रोज़ क़ीमे की रोटियाँ तैयार की जा रही थीं। अशोक खा के आया था। मगर जब खाने पर बैठा तो तीन हड़प कर गया।

    ये अजीब बात है कि बम्बई में उस के बाद जब कभी हमारे यहाँ क़ीमे की रोटियाँ तय्यार होतीं। अशोक किसी किसी तरह आन मौजूद होता। इस की तवज्जोह में कर सकता हूँ अशोक। दाने दाने पर महर वाला ही क़िस्सा मालूम होता है।

    मैंने अभी अभी अशोक को दादा मनी कहा है। बंग्ला में इस का मतलब है बड़ा भाई... अशोक से जब मेरे मरासिम बढ़ गए। तो उसने मुझे मजबूर किया कि मैं उसे दादा मनी कहा करूँ। मैंने उस से कहा। “तुम बड़े कैसे हुए। हिसाब कर लो। मैं उम्र में तुमसे बड़ा हूँ।”

    हिसाब किया गया तो वो मुझसे उम्र में दो माह और कुछ दिन बड़ा निकला। चुनांचे अशोक और मिस्टर गांगुली के बजाए मुझे दादा मनी कहना पड़ा। ये मुझे पसंद भी था। क्यूँ कि इस में बंगालियों की महबूब मिठाई “रसगुल्ले” की मिठास और गोलाई थी। वो मुझे पहले मिस्टर मंटो कहता था। जब उस से दादा मनी कहने का मुआहदा हुआ। तो वो मुझे सिर्फ मंटो कहने लगा। हालाँ कि मुझे ये नापसंद था।

    पर्दे पर वो मुझे चाकलेट हीरो मालूम होता था। मगर जब मैंने उस को स्लोलाइड के ख़ौल से बाहर देखा तो वो एक कसरती आदमी था। उस के मक्के में इतनी क़ुव्वत थी कि दरवाज़े की लक्ड़ी में शिगाफ़ पड़ जाता था। हर-रोज़ घर पर बॉक्सिंग की मश्क़ करता था। शिकार खेलने का शौक़ीन था। सख़्त से सख़्त काम कर सकता था। अफ़सोस मुझे सिर्फ इस बात का हुआ है कि उसे आराइश का क़तअन ज़ौक़ नहीं था। वो अगर चाहता तो उस का घर दिलकश से दिलकश साज़-ओ-सामान से आरास्ता होता। मगर इस तरफ़ वो कभी तवज्जो देता ही नहीं था। और अगर देता था। तो उस के नताइज ग़ैर सनाआना होते थे। बरश उठा कर ख़ुद ही सारे फ़र्नीचर पर गहरा नीला पेंट थोप देता। या किसी सोफ़े की पुश्त तोड़ कर उसे दीवान की भोंडी शक्ल में तब्दील कर दिया।

    मकान समुंद्र के एक ग़लीज़ किनारे पर है। नमकीन पानी के छींटे बाहर खिड़कियों की सलाख़ों को चाट रहे हैं। जगह जगह लोहे के काम पर ज़ंग की पपड़ियाँ जमा हैं। उनसे बड़ी उदासी फैलाने वाली बू रही है। मगर अशोक इस से क़तअन ग़ाफ़िल है। रेफ्रिजरेटर बाहर कॉरीडोर में पड़ा झक मार रहा है। उस के साथ लग कर उस का ग्रांडील अलेशीन कुत्ता सो रहा है। पास कमरे में बच्चे उधम मचा रहे हैं। और अशोक ग़ुस्ल-ख़ाने के अंदर पाट पर बैठा दीवारों पर हिसाब लगा कर देख रहा है कि रेस में कौन सा घोड़ा वन आएगा या मुकालमों का पर्चा हाथ में लिए उनकी अदायगी सोच रहा है अशोक को फ़िरासत-उल-यद यानी पामिस्ट्री और इल्म-ए-नुजूम से ख़ास शग़फ़ है। मुअख़्ख़िर-उज़-ज़िक्र इल्म उसने अपने बाप से सीखा है मुतअद्दिद किताबें भी पढ़ी हैं। फ़ुर्सत के औक़ात में वो शुग़्ल के तौर पर अपने दोस्तों की जन्म पत्रियाँ देखा करता है।

    मेरे सितारों का मुताला कर के उसने एक दिन मुझसे सरसरी तौर पर पूछा। “तुम शादी-शुदा हो?”

    मैंने उस से कहा। “तुम्हें मालूम नहीं?”

    उसने कुछ देर ख़ामोश रहने के बाद। “जानता हूँ... लेकिन देखो मंटो, एक बात बताओ... नहीं... तुम्हारे तो अभी औलाद नहीं हुई।”

    मैंने उस से पूछा। “बात क्या है... बताओ तो सही।”

    उसने हिचकिचाते हुए कहा। “कुछ नहीं... जिन लोगों के सितारों की पोज़ीशन ऐसी होती है उस की पहली औलाद लड़का होती है... मगर वो ज़िंदा नहीं रहती।”

    अशोक को ये मालूम नहीं था कि मेरा लड़का एक साल का हो कर मर गया था।

    अशोक ने मुझे बाद में बताया कि उस का पहला जो कि लड़का था मुर्दा पैदा हुआ था।

    उसने मुझसे कहा। तुम्हारे और मेरे सितारों की पोज़ीशन क़रीब क़रीब एक जैसी है। और ये कभी हो ही नहीं सकता कि जिन लोगों के सितारों की पोज़ीशन ऐसी हो। उनके हाँ पहली औलाद लड़का हो और वो मरे।

    अशोक को इल्म-ए-नुजूम की सेहत पर पूरा पूरा यक़ीन है कि बशर्त ये कि हिसाब दुरुस्त हो। वो कहा करता है। जिस तरह एक पाई की कमी बेशी हिसाब में बहुत बड़ी गड़-बड़ पैदा कर देती है। इस तरह सितारों के हिसाब में मामूली सी ग़लती हमें कहीं की कहीं ले जाती है यही वजह है कि वसूक़ के साथ कोई नतीजा क़ायम नहीं करना चाहिए। क्यूँ कि हो सकता है हमसे सहू हो गया हो।

    रेस के घोड़ों के टप हासिल करने में भी आम तौर पर अशोक उसी इल्म से मदद लेता है। घंटों बाथरूम में बैठा हिसाब लगाता रहता है। मगर पूरी रेस में सौ रुपये से ज़्यादा उसने कभी नहीं खेला। और ये अजीब इत्तिफ़ाक़ है कि वो हमेशा जीता है सौ के एक सौ दस हो गए। सौ के सौ ही रहे। मगर ऐसा कभी हुआ। कि उस के सौ में से एक पाई कम हुई हो... वो रेस जीतने के लिए नहीं महज़ तफ़रीह के लिए खेलता है। उस की हसीन-ओ-जमील बीवी शोभा तीन बच्चों की माँ हमेशा उस के साथ होती है। मेम्बर्ज़ इन्लोसीज़ीर में दाख़िल होते ही वो एक कोने में अलग थलग बैठ जाता है। रेस शुरू होने से चंद मिनट पहले अपनी बीवी को रुपये देता है कि फ़ुलाँ फ़ुलाँ नंबर के टिकट ले आओ। जब रेस ख़त्म होती है। तो उस की बीवी ही खिड़की पर जा कर जीतने वाले टिक्टों के रुपये वसूल करती है।

    शोभा घरेलू औरत है। तालीम वाजिबी है। अशोक कहा करता है कि अन-पढ़ है मगर सिर्फ़ अज़ाराह-ए-मज़ाक़ उस की इज़्दिवाजी ज़िंदगी बहुत कामियाब है। शोभा इतनी दौलत होने के बावजूद घर के काम काज में मश्ग़ूल रहती है। ठेठ बंगालियों की तरह सूती धोती पहने और उस के पल्लू के एक कोने में चाबियों का ये बड़ा गुच्छा उड़ेसे वो मुझे हमेशा अपने घर में मसरूफ़-ए-कार नज़र आई। शाम को जब कभी विसकी का एक दौर चलता तो गज़क की चीज़ें शोभा अपने हाथ से तय्यार करती थी। कभी नमकीन पारे कभी भुनी हुई दाल। कभी आलुओं के क़त्ले।

    मैं ज़रा ज़्यादा पीने का आदी था। इस लिए शोभा अशोक से कहती थी। “देखो गांगुली! मिस्टर मंटो को ज़्यादती मत देना। मिसिज़ मंटो हमको बोलेंगी।”

    मिसिज़ मंटो और मिसिज़ गांगुली दोनों सहेलियाँ थीं। उनसे हम दोनों बहुत काम निकालते थे। जंग के बाइस बड़े अच्छे सिग्रेट क़रीब क़रीब नापैद थे। जितने भी बाहर से आते थे। सब के सब ब्लैक मार्केट में चले जाते थे। यूँ तो हम आम तौर पर उस ब्लैक मार्केट ही से अपने लिए सिग्रेट हासिल करते थे मगर जब किसी वसीले सही क़ीमत पर कोई हीज़ मिल जाती तो हम अजीब-ओ-ग़रीब मसर्रत महसूस करते।

    मिसिज़ गांगूली जब शॉपिंग करने निकलती तो मेरी बीवी सफिया को कभी कभी अपने साथ ले जाती। क़रीब क़रीब हर बड़े दुकानदार को मालूम था कि मिसिज़ गांगुली मशहूर ऐक्टर अशोक कुमार की बीवी है। चुनांचे उस के तलब करने पर ब्लैक मार्केट की तारीक तहों में छुपाई हुई चीज़ें बाहर निकल आती थीं। यूँ भी बम्बई के मर्द औरतों के मुआमले में काफ़ी नर्म-दिल वाक़े हुए हैं।

    बैंक से रुपये निकलवाना हो। कोई रजिस्ट्री कराना हो। सिनेमा या रेल-गाड़ी के टिकट लेने हों। मर्द पड़ा डेढ़ घंटा सूखता रहेगा। लेकिन उस के मुक़ाबले में औरत को एक मिनट भी इंतिज़ार करना नहीं पड़ेगा।

    अशोक ने अपनी शोहरत और हर-दिल-अज़ीज़ी से शायद ही फ़ायदा उठाया। मगर दूसरे बाज़-औक़ात उस के इल्म के बग़ैर उस के ज़रिये से अपना उल्लू सीधा कर लेते थे। राजा मेहदी अली ख़ाँ ने एक दफ़ा बड़े ही दिल चस्प तरीक़े से अपना उल्लू सीधा किया।

    राजा फिल्मिस्तान में मुलाज़िम था। मैं फिल्मिस्तान छोड़ कर वली साहब के लिए एक कहानी लिख रहा था। एक रोज़ मुझे टेलीफ़ोन पर अशोक के सेक्रेट्री ने बताया कि राजा मेहदी अली ख़ाँ बीमार हैं। मैं वहाँ पहुंचा तो देखा कि जनाब की बहुत बुरी हालत है। गला इस क़दर ख़राब है कि आवाज़ ही नहीं निकलती। नक़ाहत का ये आलम है कि सहारा ले कर भी उठा नहीं जाता। और आप नमकीन पानी के ग़रारों और ओरिएण्टल जाम की मालिश से अपना मर्ज़ दूर करने की कोशिश फ़र्मा रहे हैं।

    मुझे शुबा सा हुआ। कहीं डिप्थीरिया हो चुनांचे मैंने उन्हें फ़ौरन मोटर में लादा और अशोक को टेलीफ़ोन किया। उसने मुझे अपने एक वाक़िफ़ डॉक्टर का नाम बताया कि वहां ले जाओ। मैं राजा साहब को वहाँ ले गया। तश्ख़ीस के बाद मालूम हुआ कि वाक़ई वही मूज़ी मर्ज़ है। डाक्टर साहब के मश्वरे के मुताबिक़ मैंने फ़ौरन ही मुतअद्दिद अमराज़ के हस्पताल में उनको दाख़िल करा दिया। टीके वग़ैरा दिए गए दूसरे रोज़ सुबह मैंने अशोक को टेलीफ़ोन पर राजा के मर्ज़ की नौइयत बताई। जब उसने कोई तश्वीश ज़ाहिर की। तो मुझे ग़ुस्सा गया। कि तुम कैसे इन्सान हो। एक आदमी ऐसे ख़ौफ़नाक मर्ज़ में मुब्तला है। बेचारे का यहाँ कोई पुरसान-ए-हाल भी नहीं और तुम कोई दिल-चस्पी ही नहीं ले रहे।

    अशोक ने जवाबन सिर्फ़ इस क़द्र कहा। “आज शाम को चलेंगे उस के पास।” टेलीफ़ोन बंद कर के मैं हस्पताल पहुँचा और देखा कि राजा की हालत पहले की निस्बत किसी क़द्र बेहतर है। डॉक्टर ने जो टीके कहे थे वो मैं ले आया था। ये उस के हवाले कर के और दम दिलासा देकर मैं अपने काम पर चला गया।

    शाम को अशोक ने मुझे वली के दफ़्तर में पकड़ लिया। मैं नाराज़ था मगर उसने मुझे मना लिया। मोटर में हस्पताल पहुँचे। अशोक ने राजा से मआज़रत तलब की कि वो हद-ए-मसरूफ़ था। इधर उधर की बातें हुईं। उस के बाद अशोक मुझे घर छोड़ कर चला गया।

    दूसरे रोज़ हस्पताल पहुँचा तो क्या देखता हूँ। राजा, राजा बना बैठा है। बिस्तर की चादर उजली, तकिए का ग़िलाफ़ उजला। सिग्रेट की डिबिया, पान, सिरहाने की विंडो सेल पर फूलदान टांग पर टांग रखे। हस्पताल का साफ़सुथरा जोड़ा पहने बड़े अय्याशाना तौर पर अख़बार का मुताला कर रहा था। मैंने हैरत भरे लहजा में उस से पूछा। “क्यूँ राजा। ये सब क्या।”

    राजा मुस्कुराया। उस की ये बड़ी बड़ी मूँछें थर्राईं। “ये तो कुछ भी नहीं... अभी और देखना।

    मैंने पूछा क्या?”

    “अय्याशी के सामान... कुछ रोज़ और मैं यहाँ रहा तो तुम देखोगे कि पास वाले कमरे में मेरी हरम-सराय होगी। ख़ुदा जीता रखे मेरे अशोक कुमार को... बताओ वो क्यूँ नहीं आया।”

    थोड़ी देर के बाद राजा ने बताया कि वो सब कुछ अशोक का नूर ज़ुहूर है... हस्पताल वालों को पता चल गया कि अशोक उस की बीमार-पुर्सी के लिए आया था। चुनांचे हर छोटा बड़ा राजा के पास आया। हर एक ने उस से एक ही क़िस्म के मुतअद्दिद सवाल किए।

    “क्या अशोक वाक़ई उस की बीमार-पुर्सी के लिए आया था?”

    “अशोक से उस के क्या तअल्लुक़ात हैं?”

    “क्या वो फिर आएगा?”

    “कब और किस वक़्त आएगा?”

    राजा ने उनको बताया कि अशोक उस का बहुत ही गहरा दोस्त है। उस के लिए अपनी जान तक देने को तय्यार है वो हस्पताल में उस के साथ ही रहने को तय्यार था। मगर डाक्टर माने। सुब्ह शाम आता मगर कंट्रैक्ट कुछ ऐसे हैं कि मजबूर है। आज शाम को ज़रूर आएगा... इस का नतीजा ये हुआ कि ख़ैराती हस्पताल के ख़ैराती कमरे में उस को हर क़िस्म की सहूलत मयस्सर थी।

    वक़्त ख़त्म होने पर मैं जाने ही वाला था कि मेडिकल स्टूडैंट लड़कियों का एक गिरोह कमरे में दाख़िल हुआ... राजा मुस्कुराया।

    “ख़्वाजा... हरम-सराय के लिए ये साथ वाला कमरा मेरे ख़याल है छोटा रहेगा।”

    अशोक बहुत अच्छा ऐक्टर है। मगर वो सिर्फ़ अपनी जान पहचान के बे-तकल्लुफ़ लोगों के साथ मिलकर ही पूरी दिल-जमई से काम कर सकता है। यही वजह है कि इन फिल्मों में उस का काम इत्मिनान बख़्श नहीं है जो उस की टीम ने नहीं बनाए। अपने लोगों में हो तो वो खुल कर काम करता है। टेक्नीशनों को मश्वरे देता है, उस के मश्वरे क़ुबूल करता है। अपनी ऐक्टिंग के मुतअल्लिक़ लोगों से इस्तिफ़सार करता है। एक सीन को मुख़्तलिफ़ शक्लों में अदा करके ख़ुद परखता है और दूसरों की राय लेता है। इस फ़िज़ा से अगर कोई उसे बाहर ले जाता है तो वो बहुत उलझन महसूस करता है।

    तालीम-याफ़्ता होने और बंबई टॉकीज़ जैसे बा-ज़ौक़ फ़िल्मी इदारे के साथ कई बरसों तक मुंसलिक रहने की वजह से अशोक को फ़िल्मी सनअत के क़रीब क़रीब हर शोबे से वाक़फ़ियत हासिल हो गई थी। वो कैमरे की बारीकियाँ जानता था। लेबारेट्री के तमाम पेचीदा मसाइल समझता था। एडिटिंग का अमली तजुर्बा रखता था और डावर किशन की गहराइयों का भी मुताला कर चुका था। चुनांचे फिल्मिस्तान में जब उस से राय बहादुर चवन्नी लाल ने एक फ़िल्म प्रोड्यूस करने के लिए कहा तो वो फ़ौरन तय्यार हो गया।

    उन दिनों फिल्मिस्तान का प्रोपेगंडा फ़िल्म “शिकारी” मुकम्मल हो चुका था। इस लिए मैं कई महीनों की लगातार मेहनत के बाद घर में छुट्टियों के मज़े उड़ा रहा था। एक दिन साविक वाचा आए। इधर उधर की बातें करने के बाद कहने लगे। सआदत... एक कहानी लिख दो गांगुली के लिए। मेरी समझ में आया कि साविक का क्या मतलब है। मैं फिल्मिस्तान का मुलाज़िम था और मेरा काम ही कहानियाँ लिखना था। गांगुली के लिए कहानी लिखवाने के लिए साविक की सिफ़ारिश की क्या ज़रूरत थी। मुझसे वहां फिल्मिस्तान का कोई ज़िम्मेदार रुक्न भी कहता, मैं कहानी लिखना शुरू कर देता, लेकिन बाद में मुझे मालूम हुआ कि अशोक चूँकि फ़िल्म ख़ुद प्रोड्यूस करना चाहता है। इस लिए उस की ख़्वाहिश है कि मैं उस की ख़्वाहिश के मुताबिक़ कोई निहायत ही अछूती कहानी लिखूँ। वो ख़ुद मेरे पास इस लिए आया कि वो दूसरों से कई कहानियाँ सुन चुका था।

    बहर-हाल साविक के साथ वक़्त मुक़र्रर हुआ और हम सब साविक ही के साफ़ सुथरे फ़्लैट में जमा हुए। अशोक को कैसी कहानी चाहिए थी। ये ख़ुद उस को मालूम नहीं था। “बस मंटो ऐसी कहानी हो कि मज़ा जाए... इतना ख़याल रखो कि ये मेरा पहला फ़िल्म होगा।”

    हम सबने मिलकर घंटों मग़ज़ पाशी की। मगर कुछ समझ में आया। उन दिनों आग़ा ख़ाँ की डाइमंड जुबली होने वाली थी जिसके लिए साविक के फ़्लैट की परली तरफ़ ब्रेबोर्न स्टेडियम में एक बहुत बड़ा पिंडाल तामीर किया जा रहा था। मैंने इन्सप्रेशन हासिल करने की कोशिश की... साविक के स्टिंग रुम में सनम-तराशी का एक निहायत ही उम्दा नमूना था। उस को भी दिमाग़ में घुमाया फिराया। अपने पुराने कारनामों पर नज़र डाली मगर कोई नतीजा बरामद हुआ।

    दिन-भर की सई-ए-नाकाम की कोफ़्त दूर करने के लिए शाम को बाहर टियर्स पर ब्रांडी का दौर शुरू हुआ। शराब के इंतिख़ाब में साविक वाचा बहुत ही उम्दा ज़ौक़ का मालिक है। ब्रांडी चुनांचे ज़ायक़ा और क़वाम की बहुत ही अच्छी थी। हलक़ से उतरते ही लुत्फ़ गया। सामने चर्चगेट स्टेशन था। नीचे बाज़ार में ख़ूब चहल चहल थी। उधर बाज़ार के इख़्तिताम पर समुंद्र औंधे मुँह लेटा सस्ता रहा था। बड़ी बड़ी क़ीमती कारें सड़क की चमकीली सतह पर तैर रही थीं... थोड़ी देर के बाद एक हाँफ्ता हुआ सड़कें कूटने वाला इंजन नुमूदार हुआ मैं ने ऐसे ही सोचा... ख़ुदा मालूम कहाँ से ये ख़याल मेरे दिमाग़ में आन टपका कि अगर इस टियर्स से कोई ख़ूबसूरत लड़की एक रुक़ा गिराए इस निय्यत से कि वो जिसके हाथ लगेगा वो उस से शादी करेगी तो क्या हो?... हो सकता है कि रुक़्क़ा किसी पेकार्ड मोटर में जा गिरे... और ये भी हो सकता है कि उड़ता उड़ता सड़कें कूटने वाले इंजन के ड्राईवर के पास जा पहुंचे.... हो सकने का ये तसलसुल कितना दराज़ था और कितना दिल-चस्प!

    मैंने उस का ज़िक्र अशोक और साविक से किया। उनको मज़ा गया। और मज़ा लेने की ख़ातिर हमने ब्रांडी का एक और दौर चलाया और बे-लगाम ख़याल-आराइयाँ शुरू कर दीं। जब महफ़िल बरख़ास्त हुई तो तय पाया कि कहानी की बुनियादें इसी ख़याल पर उस्तुवार की जाएँ।

    कहानी तैयार हो गई मगर उस की शक्ल कुछ और ही थी। हसीना का लिखा हुआ रुक़्क़ा रहा ना सड़कें कूटने वाला इंजन। पहले पहले ख़याल था कि ट्रेजडी होनी चाहिए। मगर अशोक चाहता था कि कामेडी हो और वो भी बहुत ही तेज़-रफ़्तार, चुनांचे दिमाग़ की सारी क़ुव्वतें उसी तरफ़ सर्फ़ होने लगीं। कहानी मुकम्मल हो गई तो अशोक को पसंद आई शूटिंग शुरू हो गई। अब फ़िल्म का एक एक फ़्रेम अशोक की हिदायत के मातहत तय्यार होने लगा। बहुत कम लोग जानते हैं कि आठ दिन तमाम कमाल अशोक के डायरेक्शन का नतीजा थी कि पर्दे पर डायरेक्टर का नाम डी. एन पाई था, जिसने उस फ़िल्म का एक इंच भी डायरेक्ट नहीं किया था। बंबई टॉकीज़ में फ़िल्म डायरेक्टर को बहुत कम अहमियत दी जाती थी। सब मिलकर काम करते थे। जब फ़िल्म नुमाइश के लिए पेश होता तो एक कारकुन का नाम बतौर डायरेक्टर के पेश कर दिया जाता था। ये तरीक़ा-ए-कार फिल्मिस्तान में भी राइज था। डी, एन, पाई फ़िल्म एडिटर था और अपने काम में बहुत होशियार। चुनांचे मुत्तफ़िक़ा तौर पर यही फ़ैसला हुआ था कि ब-हैसियत डायरेक्टर के उस का नाम फ़िल्म के क्रेडिट टाइटल्ज़ में पेश किया जाए।

    अशोक जितना अच्छा किरदार कार है उतना ही अच्छा हिदायत-कार भी है। उस का इल्म मुझे आठ दिन की शूटिंग के दौरान में हुआ। मामूली से मामूली मंज़र पर भी वो बहुत मेहनत करता था। शूटिंग से एक रोज़ पहले वो मुझसे नज़र-ए-सानी किया हुआ सीन लेता और ग़ुस्ल-ख़ाने में बैठ कर घंटों उस की नोक पलक पर ग़ौर करता रहता... ये अजीब बात है कि बाथरूम के अलावा और किसी जगह वो पूरी तवज्जो से फ़िक्र-तलब उमूर पर ग़ौर नहीं कर सकता।

    इस फ़िल्म में चार नए आदमी बतौर ऐक्टर पेश हुए। राजा मेहदी अली ख़ाँ, ओपेन्द्र नाथ अश्क, मोहसिन अबदुल्लाह (पुर-असरार नैना के साबिक़ शौहर) और राक़िम-उल-हरूफ़... तय ये हुआ कि एस. मुकर्जी को एक रोल दिया जाएगा। मगर वक़्त आने पर वो अपनी बात से फिर गए। इस लिए कि उनके फ़िल्म “चल चल रे नौजवान” में कैमरे की दहश्त के बाइस मैंने काम करने से इनकार कर दिया था। मुकर्जी को बहाना हाथ आया। अस्ल में वो ख़ुद कैमरे से ख़ौफ़-ज़दा थे।

    उनका रोल एक “शल शौक्ड” फ़ौजी का था। उस के लिए लिबास वग़ैरा सब तय्यार थे। जब मुकर्जी ने इनकार किया तो अशोक बहुत सटपटाया कि उनकी जगह और किसे मुंतख़ब करे। कई दिन शूटिंग बंद रही। राय बहादुर चवन्नी लाल जब लाल पीले होने लगे तो अशोक मेरे पास आया। मैं चंद मनाज़िर दोबारा लिख रहा था। उसने मेज़ पर से मेरे काग़ज़ उठा कर एक तरफ़ रखे और कहा। “चलो मंटो।”

    मैं उस के साथ चल पड़ा। मेरा ख़याल था कि वो मुझे नए गीत की धुन सुनवाने ले जा रहा है। मगर वो मुझे सीट पर ले गया है और कहने लगा। “पागल का पार्ट तुम करोगे।”

    मुझे मालूम था कि मकर्जी इनकार कर चुका है। और अशोक को इस ख़ास किरदार के लिए कोई आदमी नहीं मिल रहा। लेकिन ये मालूम नहीं था कि वो मुझसे कहेगा कि मैं ये रोल अदा करूँ। चुनांचे मैंने उस से कहा। “पागल हुए हो।” अशोक संजीदा हो गया और कहने लगा कि नहीं मंटो तुम्हें ये रोल लेना ही पड़ेगा। राजा मेहदी अली ख़ाँ और उपेन्द्रनाथ अश्क ने भी इसरार किया। राजा ने कहा। “तुमने मुझको अशोक का बहनोई बना दिया। हालाँ कि मैं शरीफ़ आदमी हरगिज़ उस के लिए तय्यार था, क्यूँ कि मैं अशोक की इज़्ज़त करता हूँ। तुम पागल बन जाओगे तो कौन सी आफ़त जाएगी।”

    इस पर मज़ाक़ शुरू हो गया और मज़ाक़ मज़ाक़ में सआदत हसन मंटो, पागल फ़्लाइट लैफ़्टीनेंट कर पाराम बन गया... कैमरे के सामने मेरी जो हालत हुई उस को अल्लाह बेहतर जानता है।

    फ़िल्म तय्यार हो कर नुमाइश के लिए पेश हुआ तो कामियाब साबित हुआ। नाक़िदीन ने उसे बेहतरीन कामेडी क़रार दिया... मैं और अशोक खासतौर पर बहुत ही मसरूर थे और हमारा इरादा था कि अब की कोई बिलकुल नए टाइप का फ़िल्म बनाएंगे। मगर क़ुदरत को ये मंज़ूर नहीं था।

    साविक वाचा “आठ दिन” की शूटिंग के आग़ाज़ ही में अपनी वालिदा के इलाज के सिलसिले में लंदन चला गया था। वो जब वापस आया तो फ़िल्मी सनअत में एक इन्क़िलाब बर्पा हो चुका था। कई इदारों के दिवाले पिट गए थे। बंबई टॉकीज़ की निहायत अबतर हालत थी। हिमांशूराय आँजहानी के बाद देविका रानी चंद बरसों की इद्दत के बाद रूस के एक जिला-वतन नवाब के आर्टिस्ट लड़के रूर्क से रिश्ता-ए-इज़्दवाज क़ायम कर के फ़िल्मी दुनिया त्याग चुकी थी। देविकारानी के बाद बंबई टॉकीज़ पर कई बेरूनी हमला आवरों ने क़ब्ज़ा किया मगर उस की हालत सुधार सके। आख़िर साविक वाचा लंडन से वापस आए और जुरात रिंदाना से काम लेकर बंबई टॉकीज़ की इनान-ए-हुकूमत अशोक की मदद से अपने हाथ में ले ली।

    अशोक को फिल्मिस्तान छोड़ना पड़ा। इस दौरान में लाहौर से मिस्टर मोती बी गढ़वानी ने तार के ज़रिये से एक हज़ार रुपये माहवार की ऑफ़र दी। मैं चला गया होता। मगर मुझे साविक का इंतिज़ार था। जब अशोक और वो दोनों बंबई टॉकीज़ में इकट्ठे हुए तो मैं उनके साथ था। ये वो ज़माना था कि हिन्दोस्तान की तक़्सीम के लिए अंग्रेज़ रफ़ कापियों पर नक़्शे बना रहा था। हब्स में चुंगी डाल ये बी जमालो अलग खड़ी हो कर नुमाइश देखने के लिए जगह बना रही थी।

    मैंने जब बंबई टॉकीज़ में क़दम रखा तो हिंदू मुस्लिम फ़सादाद शुरू थे। जिस तरह क्रिकेट के मैचों में विकटें उड़ती हैं बाव निडरियाँ लगती हैं। इस तरह उन फसादों में लोगों के सर उड़ते थे और बड़ी बड़ी आगें लगती थीं।

    साविक वाचा ने बंबई टॉकीज़ की अबतर हालत का अच्छी तरह जायज़ा लेने के बाद जब इंतिज़ाम संभाला तो उसे बहुत सी मुश्किलें दरपेश आईं। ग़ैर ज़रूरी उन्सिर को जो मज़हब के लिहाज़ से हिंदू था, निकाल बाहर किया तो काफ़ी गड़बड़ हुई। मगर जब उस की जगह पर की गई, तो मुझे महसूस हुआ कि कलीदी आसामियाँ सब मुस्लमानों के पास हैं। मैं था, शाहिद लतीफ़ था, इस्मत चुग़्ताई थी, कमाल अमरोही था, हसरत लखनवी था, नज़ीर अजेरी, नाज़िम पानी पति और म्यूज़िक डायरेक्टर ग़ुलाम हैदर थे। ये सब जमा हुए तो हिंदू कारकुनों में साविक वाचा और अशोक के ख़िलाफ़ नफ़रत के जज़्बात पैदा हो गए। मैंने अशोक से इस का ज़िक्र किया तो हँसने लगा। “मैं वाचा से कह दूँगा कि वो एक डाँट पिला दे।”

    डाँट पिलाई गई तो इस का असर उल्टा हुआ। वाचा को गुमनाम ख़त मौसूल होने लगे कि अगर उसने अपने स्टूडियो से मुसलमानों को बाहर निकाला तो उस को आग लगा दी जाएगी ये ख़त वाचा पढ़ता तो आग बगूला हो जाता। “साले मुझसे कहते हैं कि मैं ग़लती पर हूँ... मैं ग़लती पर हूँ... मैं ग़लती पर हूँ तो उन के बावा का किया जाता है... आग लगाएँ तो मैं उन सबको इस में झोंक दूँगा।”

    अशोक का दिल-ओ-दिमाग़ फ़िर्का-वाराना तअस्सुब से बिलकुल पाक है। वो कभी उन ख़ुतूत पर सोच ही नहीं सकता था। जिन पर आग लगाने की धमकियाँ देने वाले सोचते थे। वो मुझसे हमेशा कहता। “मंटो ये सब दीवानगी है... आहिस्ता-आहिस्ता दूर हो जाएगी।”

    मगर आहिस्ता-आहिस्ता दूर होने के बजाय ये दीवानगी बढ़ती ही चली जा रही थी... और मैं ख़ुद को मुजरिम महसूस कर रहा था, इस लिए कि अशोक और वाचा मेरे दोस्त थे। वो मुझसे मश्वरे लेते थे, इस लिए कि उनको मेरे ख़ुलूस पर भरोसा था। लेकिन मेरा ये ख़ुलूस मेरे अंदर सिकुड़ रहा था... मैं सोचता था, अगर बम्बई टॉकीज़ को कुछ हो गया तो मैं अशोक और वाचा को क्या मुँह दिखाऊँगा।

    फ़सादाद ज़ोरों पर थे। एक दिन मैं और अशोक बंबई टॉकीज़ से वापस रहे थे। रास्ते में उस के घर देर तक बैठे रहे। शाम को उसने कहा। चलो मैं तुम्हें छोड़ आऊँ... शॉर्ट कट की ख़ातिर वो मोटर को एक ख़ालिस इस्लामी मोहल्ले में ले गया... सामने से एक बरात रही थी। जब मैंने बैंड की आवाज़ सुनी, तो मेरे औसान ख़ता हो गए। एक दम अशोक का हाथ पकड़ कर मैं चलाया। “दादा मनी। ये तुम किधर निकले।”

    अशोक मेरा मतलब समझ गया। मुस्कुरा कर उसने कहा। “कोई फ़िक्र करो।”

    मैं क्यूँ कर फ़िक्र करता। मोटर ऐसे इस्लामी मोहल्ले में थी जहाँ किसी हिंदू का गुज़र ही नहीं हो सकता था। और अशोक को कौन नहीं पहचानता था। कौन नहीं जानता था कि वो हिंदू है... एक बहुत बड़ा हिंदू जिसका क़त्ल मार्का-ख़ेज़ होता... मुझे अरबी ज़बान में कोई दुआ याद नहीं थी। क़ुरआन की कोई मौज़ू-ओ-मुनासिब आयत भी नहीं आती थी। दिल ही में अपने ऊपर लानतें भेज रहा था और धड़कते हुए दिल से अपनी ज़बान में बेजोड़ सी दुआ मांग रहा था कि ख़ुदा मुझे सुर्ख़-रु रखियो... ऐसा हो कोई मुसलमान अशोक को मार दे। और मैं सारी उम्र उस का ख़ून अपनी गर्दन पर महसूस करता रहूँ। ये गर्दन क़ौम की नहीं मेरी अपनी गर्दन थी। मगर ये ऐसी ज़लील हरकत के लिए दूसरी क़ौम के सामने नदामत की वजह से झुकना नहीं चाहती।

    जब मोटर बरात के जुलूस के पास पहुँची तो लोगों ने चिल्लाना शुरू कर दिया। “अशोक कुमार... अशोक कुमार...” मैं बिलकुल याख़ हो गया। अशोक स्टेरिंग पर हाथ रखे ख़ामोश था। मैं ख़ौफ़-ओ-हिरास की यख़-बस्तगी से निकल कर हुजूम से ये कहने वाला था कि देखो होश करो। मैं मुसलमान हूँ। ये मुझे मेरे घर छोड़ने जा रहा है... कि दो नौजवानों ने आगे बढ़कर बड़े आराम से कहा। अशोक भाई अगला रास्ता नहीं मिलेगा। उधर बाजू की गली से चले जाओ।

    अशोक भाई? अशोक उनका भाई था। और मैं कौन था?... मैंने दफ़अतन अपने लिबास की तरफ़ देखा जो खादी का था... मालूम नहीं उन्होंने मुझे क्या समझा होगा। मगर हो सकता है कि उन्होंने अशोक की मौजूदगी में मुझे देखा ही हो।

    मोटर जब उस इस्लामी मोहल्ले से निकली। तो मेरी जान में जान आई। मैंने अल्लाह का शुक्र अदा किया तो अशोक हंसा। तुम ख़्वाह-मख़्वाह घबरा गए... आर्टिस्टों को ये लोग कुछ नहीं कहा करते।

    चंद रोज़ बाद बम्बई टॉकीज़ में नज़ीर अजमेरी की कहानी (जो मजबूर के नाम से फ़िल्म बंद हुई) पर मैंने जब कड़ी नुक्ता-चीनी और उस में कुछ तब्दीलियाँ करना चाहें, तो नज़ीर अजमेरी ने अशोक और वाचा से कहा। “मंटो को आप ऐसे मुबाहसों के दौरान में बिठाया करें। वो चूँकि ख़ुद अफ़्साना नवीस है इस लिए मुतअस्सिब है।”

    मैंने बहुत ग़ौर किया। कुछ समझ में आया। आख़िर मैंने अपने आपसे कहा। “मंटो भाई... आगे रास्ता नहीं मिलेगा... मोटर रोक लो... उधर बाजू की गली से चले जाओ।”

    और मैं चुप-चाप बाजू की गली से पाकिस्तान चला आया जहाँ मेरे अफ़साने “ठंडा गोश्त” पर मुक़द्दमा चलाया गया।

    स्रोत:

    • Book: گنجے فرشتے

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