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आसिफ़ुद्दौला

1748 - 1797 | लखनऊ, भारत

अवध के नवाब

अवध के नवाब

आसिफ़ुद्दौला

ग़ज़ल 27

अशआर 7

इस अदा से मुझे सलाम किया

एक ही आन में ग़ुलाम किया

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मिलते ही नज़र दिल को मिलाया नहीं जाता

आग़ाज़ को अंजाम बनाया नहीं जाता

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हम इश्क़ के बंदे हैं मज़हब से नहीं वाक़िफ़

गर का'बा हुआ तो क्या बुत-ख़ाना हुआ तो क्या

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ये आने के बहाने हैं सभी वर्ना मियाँ

इतना तो घर से मिरे कुछ नहीं घर दूर तिरा

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कहता है बहुत कुछ वो मुझे चुपके ही चुपके

ज़ाहिर में ये कहता है कि मैं कुछ नहीं कहता

पुस्तकें 2

 

ऑडियो 3

ये अश्क चश्मों में हमदम रहे रहे न रहे

या डर मुझे तेरा है कि मैं कुछ नहीं कहता

शक्ल उस की किसी सूरत से जो दिखलाए हमें

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

 

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