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लईक़ अकबर सहाब

ग़ज़ल 3

 

शेर 2

ज़ख़्म कारी बहुत लगा दिल पर

तीर अपनों ने इक चलाया था

आईना दिल का तोड़ के कहता है संग-ज़न

दिल तेरा तोड़ कर मुझे अच्छा नहीं लगा