मीर असर

ग़ज़ल 36

अशआर 21

क्या कहूँ किस तरह से जीता हूँ

ग़म को खाता हूँ आँसू पीता हूँ

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बेवफ़ा कुछ नहीं तेरी तक़्सीर

मुझ को मेरी वफ़ा ही रास नहीं

जिस घड़ी घूरते हो ग़ुस्सा से

निकले पड़ता है प्यार आँखों में

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काम तुझ से अभी तो साक़ी है

कि ज़रा हम को होश बाक़ी है

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तेरे आने का एहतिमाल रहा

मरते मरते भी ये ख़याल रहा

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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