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मीर मुस्तहसन ख़लीक़

1766 - 1844 | लखनऊ, भारत

ग़ज़ल 2

 

शेर 4

मिस्ल-ए-आईना है उस रश्क-ए-क़मर का पहलू

साफ़ इधर से नज़र आता है उधर का पहलू

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सर झुका लेता है लाला शर्म से

जब जिगर के दाग़ दिखलाते हैं हम

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ग़फ़लत में फ़र्क़ अपनी तुझ बिन कभू आया

हम आप के आए जब तक कि तू आया

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मर्सिया 1

 

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