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सय्यदा अरशिया हक़

1990 | सिडनी, ऑस्ट्रेलिया

ग़ज़ल 3

 

शेर 16

औरत हो तुम तो तुम पे मुनासिब है चुप रहो

ये बोल ख़ानदान की इज़्ज़त पे हर्फ़ है

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तुम भी आख़िर हो मर्द क्या जानो

एक औरत का दर्द क्या जानो

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यही दुआ है वो मेरी दुआ नहीं सुनता

ख़ुदा जो होता अगर क्या ख़ुदा नहीं सुनता

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क़ितआ 5

 

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