शायर लखनवी
ग़ज़ल 21
अशआर 26
बहार में भी नहीं कोई शाख़-ए-गुल महफ़ूज़
चमन का हसन है मुफ़्लिस की आबरू की तरह
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
तू फ़क़त जाम का मफ़्हूम समझ ऐ साक़ी
तिश्नगी क्या है ये मय-ख़्वार समझ लेते हैं
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
नफ़स नफ़स पे ये होता है क्यूँ मुझे महसूस
हयात तुझ से अलग रह के ख़ुद-कुशी तो नहीं
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
एक एक नफ़स में रौशनी है
यादों के चराग़ जल रहे हैं
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए