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नज़्म
धरती की सुलगती छाती से बेचैन शरारे पूछते हैं
इंसान की इस ज़िल्लत से परे शैतान की ज़िल्लत क्या होगी
ये वेद हटा क़ुरआन उठा
साहिर लुधियानवी
नज़्म
रिश्वत
ये है मिल वाला वो बनिया है ये साहूकार है
ये है दूकाँ-दार वो है वेद ये अत्तार है
जोश मलीहाबादी
नज़्म
शाम-ए-अयादत
अभी तो पूंजी-वाद को जहान से मिटाना है
अभी तो सामराजों को सज़ा-ए-मौत पाना है
फ़िराक़ गोरखपुरी
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ग़ज़ल
वेद उपनिषद पुर्ज़े पुर्ज़े गीता क़ुरआँ वरक़ वरक़
राम-ओ-कृष्न-ओ-गौतम-ओ-यज़्दाँ ज़ख़्म-रसीदा सब के सब
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
कहानी
धूप पड़ी, तो खुल गई आँखें, खुल गया सारा भेद
ग़श खाया, तो दौड़े आए मुंशी, पंडित, वेद
मुस्तफ़ा ज़ैदी
नअत
सलाम उस पर कि आया रहमतुल्लिलआलमीं बन कर
पयाम-ए-दोस्त ले कर सादिक़-उल'-वा'द-ओ-अमीं बन कर


