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नज़्म
आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो
सुब्ह-ए-नाशाद भी रोज़-ए-नाकाम भी
उन का दम-साज़ अपने सिवा कौन है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
आवारा
शहर की रात और मैं नाशाद ओ नाकारा फिरूँ
जगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
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नज़्म
आख़िरी ख़त
शायद मिरी उल्फ़त को बहुत याद करोगी
अपने दिल-ए-मा'सूम को नाशाद करोगी
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
नौ-गिरफ़्तार-ए-बला तर्ज़-ए-वफ़ा क्या जानें
कोई ना-शाद सिखा दे उन्हें नालाँ होना
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
इक गुल के मुरझाने पर क्या गुलशन में कोहराम मचा
इक चेहरा कुम्हला जाने से कितने दिल नाशाद हुए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
वो अपने गाँव की गलियाँ थीं दिल जिन में नाचता गाता था
अब इस से फ़र्क़ नहीं पड़ता नाशाद हुआ या शाद हुआ
नोशी गिलानी
नज़्म
शिकस्त
अपने सीने से लगाए हुए उम्मीद की लाश
मुद्दतों ज़ीस्त को नाशाद किया है मैं ने
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
मिरे नाशाद रहने से अगर तुझ को मसर्रत है
तो मैं नाशाद ही अच्छा मुझे नाशाद रहने दे
बेदम शाह वारसी
नज़्म
रामायण का एक सीन
सोचा यही कि जान से बेकस गुज़र न जाए
नाशाद हम को देख के माँ और मर न जाए












